कमलनाथ के लिए मोदी या बड़ी चुनौती केजरीवाल..

कमलनाथ के लिए मोदी या बड़ी चुनौती  केजरीवाल..

कांग्रेस के अंदर अपनी स्वीकार्यता बनाकर कमलनाथ भाजपा के शिवराज और नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने में जुट गए.. मलिकार्जुन खडगे के पार्टी की कमान संभालने के बाद नेतृत्व की मध्य प्रदेश से बढ़ती अपेक्षाओं से इतर कमलनाथ 2024 लोकसभा से ज्यादा 2023 विधानसभा चुनाव पर फोकस बनाए हुए… बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अभी तक सपा और बसपा से ज्यादा जयस, पिछड़ा वर्ग मोर्चा, भीम आर्मी की मध्य प्रदेश में बढ़ती सक्रियता के बाद आम आदमी पार्टी अपना चुनावी शंखनाद करने जा रही है.. विधानसभा बजट सत्र के दूसरे चरण के शुरुआती दौर में ही कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस जब डबल इंजन की सरकार के खिलाफ सड़क पर मोर्चा खोलेगी तो दूसरे दिन आम आदमी पार्टी की सभा होगी.. गुजरात चुनाव परिणाम से उत्साहित आम आदमी पार्टी भले ही उपमुख्यमंत्री सिसोदिया की गिरफ्तारी और इस्तीफे से विवादों से बाहर नहीं निकल पा रही ..लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की जोड़ी कर्नाटक राजस्थान, छत्तीसगढ़ के बाद भोपाल से मध्य प्रदेश में अपनी संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए सक्रियता का एहसास कराना चाहेगी..

यानि बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू होने के साथ सदन से ज्यादा सड़क पर जोर आजमाइश देखने को मिलने वाली है.. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में राष्ट्रीय एजेंडे के तहत विरोध प्रदर्शन की लाइन को आगे बढ़ाते हुए कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस नेता कार्यकर्ता रायपुर अधिवेशन की गाइडलाइन को आगे बढ़ाते हुए जवाहर चौक से राजभवन के लिए रवाना होगें.. राष्ट्रीय मुद्दों के साथ प्रदेश की समस्याओं पर ध्यान आकर्षित करने के लिए मोदी के साथ शिवराज सरकार की घेराबंदी के लिए कांग्रेस आक्रामकता के साथ शक्ति प्रदर्शन करेगी.. तो उधर आम आदमी पार्टी मध्य प्रदेश के युवाओं, महिलाओं, पेंशन धारी के साथ गरीब मध्यमवर्ग को लुभाने के लिए को लुभाने के लिए बड़े वादों का ऐलान कर अपने इरादे जताने वाली है.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है शिवराज और कमलनाथ के आरोप-प्रत्यारोप से उपजे सवाल-जवाब के बीच क्या केजरीवाल मतदाताओं से वादों का एजेंडा सेट कर कांग्रेस और भाजपा को नए सिरे से रणनीति बनाने को मजबूर करेंगे.. कमलनाथ और केजरीवाल दोनों के निशाने पर शिवराज और नरेंद्र मोदी सरकार का रहना तय माना जा रहा है.. यानी गुजरात विधानसभा चुनाव की तरह दिल्ली और पंजाब मॉडल के संकेत मिलेंगे.. आम आदमी पार्टी की सरकार में रहते भाजपा को सीधी चुनौती से इनकार नहीं किया जा सकता.. लेकिन सवाल यही पर खड़ा होता है छोटे और क्षेत्रीय दलों के साथ आम आदमी पार्टी की मौजूदगी क्या भाजपा के मुकाबले कॉन्ग्रेस की परेशानी में ज्यादा इजाफा करेगी.. राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस जब गठबंधन के विकल्प खोल चुकी तब कमलनाथ और उनकी कांग्रेस अरविंद केजरीवाल की संभावित चुनौती को आखिर कितनी गंभीरता से लेंगे.. क्योंकि पहले कमलनाथ कांग्रेस तो फिर टीम केजरीवाल के विरोध प्रदर्शन की तुलना की नई बहस भीड़ के मापदंड के साथ मतदाताओं की अपेक्षा से जोड़कर शुरू ना हो जाए.. सवाल क्या नई बहस नए प्रयोग और युवाओं की राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी पर शुरू हो सकती है.. इसे सरकार में रहते भाजपा और विपक्ष की भूमिका में कॉन्ग्रेस दोनों से बढ़ती नाराजगी का क्या विकल्प माना जाएगा.. वह भी तब जब पिछड़ा वर्ग, जयस ,भीम आर्मी जैसे राजनीतिक, कर्मचारी संगठनों के साथ सरकार से नाराज दूसरे संगठन लगातार शिवराज सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं.. मध्यप्रदेश में अभी तक कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला रहा जो एक दूसरे का अल्टरनेट भी साबित होते रहे.. अपवाद स्वरूप कई विधानसभा चित्र को छोड़ दिया जाए तो भाजपा को तीसरे दल की मौजूदगी से सत्ता तक पहुंचने में ज्यादातर फायदा ही होता रहा है.. मध्यप्रदेश में फिलहाल भाजपा के टिकट क्राइटेरिया को लेकर सस्पेंस बरकरार है.. कभी गुजरात पैटर्न सारे घर के बदल डालो तो अब कर्नाटक से आ रही खबरों के मुताबिक पार्टी से बगावत रोकने की कोशिश यानी पुराने विधायकों को टिकट देने का विकल्प खुले रखने की चर्चा के बीच आम आदमी पार्टी की रणनीति गौर करने लायक होगी.. जिसमें पहले ही सभी के लिए अपने दरवाजे खोल दिए.. कांग्रेस और भाजपा के अलावा ज्यादातर छोटे क्षेत्रीय दल … जाति, वर्ग पर फोकस बनाकर गिनी चुनी सीट पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे.. सारे विकल्प खोलकर राज्यों की राजनीति में आगे बढ़ने का मानस बना चुकी आम आदमी पार्टी के नए प्रयोग को नजरअंदाज करना किसी के लिए आसान नहीं होगा.. ऐसे में सवाल भाजपा और शिवराज से ज्यादा बड़ी चुनौती कांग्रेस और कमलनाथ के लिए मध्यप्रदेश में खड़ी हो जाएगी.. कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन राजभवन का घेराव और केजरीवाल की सभा और मतदाताओं के लिए संभावित वादे सूबे की सियासत को एक नई दिशा दे सकती है.. यह सब कुछ उस वक्त हो रहा है जब समूची भाजपा इस चुनाव में शिवराज सरकार से उपकृत हितग्राहियों पर फोकस बनाकर एक बड़ा वोट बैंक बनाने की जुगत में है.. तो सवाल क्या कमलनाथ को शिवराज और मोदी से 23 के चुनाव मैदान में निपटने से पहले केजरीवाल के मध्य प्रदेश में बढ़ते कदम को रोकना होगा .. जो तीसरे विकल्प का दावा और वादा कर मिशन 2023 के लिए मैदान में नजर आने वाला है..


कांग्रेस से ज्यादा ‘कमलनाथ’ की नेतृत्व क्षमता कसौटी पर

रायपुर में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के बाद दूसरे राज्यों के साथ मध्यप्रदेश में कमलनाथ कांग्रेस का सड़क पर उतरना मायने रखता है.. जो भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पोजीशन ले चुके कमलनाथ की अपनी पार्टी कांग्रेस संगठन में पकड़ के साथ कार्यकर्ताओं और नेताओं के भरोसे, जन अपेक्षाओं, लोकप्रियता, मैनेजमेंट को रेखांकित करेगा.. कमलनाथ चुनावी साल में जब पार्टी के अंदर दिल्ली से लेकर भोपाल तक कई दूसरी चुनौतियों से जूझ रहे आखिर तब वह नवागत अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे और सोनिया प्रियंका गांधी तक कौन सा संदेश पहुंचना चाहेगे.. कमलनाथ के लिए यह मौका है कि वो अपने अनुभव के दम पर बुजुर्ग और ढलती उम्र के नेता की कमजोरी के इस सवाल का जवाब देकर अपनी अहमियत और उपयोगिता दोनों साबित करें.. विधानसभा से ज्यादातर दूरी बनाकर चल रहे कमलनाथ क्या गारंटी है सड़क की इस मोर्चाबंदी में औपचारिकताओं से आगे जोश जुनून के साथ मैदान में डटे नजर आएंगे.. यह पहला मौका होगा जब कमलनाथ खुलकर राहुल गांधी की अडानी के खिलाफ लाइन को पुरजोर तरीके से आगे बढ़ाने को मजबूर होंगे.. इस मौके पर कांग्रेस आलाकमान के नुमाइंदे के तौर पर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी जेपी अग्रवाल खुद मौजूद रहेंगे.. सवाल क्या यह विरोध प्रदर्शन दूसरे प्रदेशों की तरह सिर्फ औपचारिकता या चुनावी साल में कांग्रेस के अंदर नजीर पेश कर कमलनाथ की नेतृत्व क्षमता और उनकी स्वीकार्यता पर मुहर लगाएगा.. या फिर विपक्ष की राजनीति कर मध्यप्रदेश में सड़क की लड़ाई में कमलनाथ पहले की तरह सीमित होकर रह जाएंगे.. भारत जोड़ो यात्रा में लंबी पैदल यात्रा से दूरी बनाने वाले कमलनाथ क्या जवाहर चौक से राजभवन तक पहुंच बड़ा संदेश देने की कोई नई रणनीति बनाएंगे.. या फिर जल्द से जल्द पुलिस के बैरिकेड तक पहुंच कर इस विरोध प्रदर्शन में वो खुद को बहुत सीमित कर लेंगे.. क्या गारंटी है कि हर जिले से उनके समर्थक और कार्यकर्ता राजधानी पहुँच कर कमलनाथ के पीछे खड़े नजर आएंगे.. क्योंकि कार्यकारी अध्यक्ष जीतू पटवारी जैसे क्षत्रप भी अपनी ताकत दिखा सकते हैं.. जीतू की नई चिट्ठी ने खुद को कार्यकारी अध्यक्ष बता कर संगठन के नीति निर्धारकों की समस्या पहले ही बढ़ा दी है.. ऐसे में क्या कांग्रेस हाईकमान के एजेंडे पर फोकस बनाकर चल रही प्रदेश कांग्रेस से ज्यादा कमलनाथ का प्रबंधन कसौटी पर होगा.. क्या भावी सीएम का चेहरा कमल नाथ इस प्रदर्शन के जरिए अपनी ब्रांडिंग में दिलचस्पी लेगें.. आधी अधूरी प्रदेश कार्यसमिति सामने आने के बाद एडजस्टमेंट के इंतजार में नेता कार्यकर्ता क्या इस विरोध प्रदर्शन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे.. क्या कांग्रेस संगठन के 56 जिलों से भोपाल पहुंचने वाले कार्यकर्ताओं का यह जमावड़ा एक लाख के दावे को पूरा करेगा.. कार्यकारी अध्यक्ष जीतू पटवारी की पार्टी में भूमिका पर मचे घमासान के बीच आखिर कमलनाथ के इर्द-गिर्द कौन नजर आएगा.. क्या एकजुटता का संदेश देने में कांग्रेस सड़क पर सफल होगी या अपनी डफली अपना राग की कहावत चरितार्थ होती हुई नजर आएगी.. नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह तो कमलनाथ के अगल-बगल ही रहेंगे.. फिर भी सवाल कांग्रेस का यह प्रदर्शन क्या कमलनाथ के व्यक्तिगत शक्ति प्रदर्शन को रेखांकित करेगा.. तो इस विरोध प्रदर्शन में दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, अजय सिंह सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया जैसे पुराने अनुभवी चेहरों की पोजिशनिंग और सक्रियता क्या एकजुटता का संदेश देने में सफल होगी.. या फिर उदयपुर डिक्लेरेशन की लाइन को आगे बढ़ाते हुए कमलनाथ के साथ नया नेतृत्व कदमताल करते हुए नजर आएगा.. चाहे फिर वह जयवर्धन हो या जीतू पटवारी सचिन यादव हो या तरुण भानोट या ओमकार सिंह मरकाम और हीरालाल अलावा जैसे आदिवासी नेता को पार्टी आगे रखकर बड़ा संदेश देगी.. यही नहीं कांग्रेस में महिला नेतृत्व की बढ़ती भागीदारी सुनिश्चित करने की रणनीति इस बार क्या सफल होगी.. या फिर अपने बयानों से विवाद कर सुर्खियां बटोरने वाले सज्जन सिंह वर्मा और जीतू पटवारी के बीच जोर आजमाइश ही नजर आएगी.. राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह विधानसभा चुनाव 2018 की रणनीति के तहत अभी भी कमलनाथ के इस प्रदर्शन में पीछे रहकर उनके साथ आगे बढ़ने का संदेश देंगे.. या फिर संगठन में अपना दबदबा साबित करने के लिए राजा कोई नई रणनीति के साथ सामने आएंगे.. मध्यप्रदेश में कमलनाथ के साइलेंट मूव पर अभी तक जीतू पटवारी की फ्रंट फुट पर आकर आक्रमक सियासत भारी नजर आती रही है.. सदन के अंदर और बाहर जीतू अपनी ही पार्टी के नेतृत्व के लिए अनसुलझी गुत्थी बन कर रह गए.. वह बात और है सत्र के दौरान जीतू का निलंबन और इससे खड़ा हुआ विवाद अब प्रदेश अध्यक्ष के नाते कमलनाथ के पाले में आ चुका है.. कमलनाथ पर दबाव होगा कि वो इस विरोध प्रदर्शन के जरिए सिर्फ आलाकमान ही नहीं प्रदेश की जनता पार्टी कार्यकर्ता और सहयोगी नेताओं सभी की अपेक्षाओं पर खरा उतर कर दिखाएं.