एम्स भोपाल में पहली जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी सफल, आठ घंटे में पुरुष से महिला बने मरीज

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एम्स भोपाल में पहली जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी सफल, आठ घंटे में पुरुष से महिला बने मरीज

एम्स भोपाल में पहली बार जेंडर-अफर्मिंग बॉटम सर्जरी संपन्न

एम्स भोपाल में पहली बार जेंडर-अफर्मिंग बॉटम (लिंग परिवर्तन) सर्जरी की गई है। करीब आठ घंटे चले ऑपरेशन में जन्म के समय पुरुष के रूप में पहचाने गए एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति के जननांगों की संरचना में बदलाव किया गया। एम्स का दावा है कि प्रदेश के किसी सरकारी अस्पताल में इस तरह की यह पहली सर्जरी है। ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति संतोषजनक रही और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। मरीज ने सर्जरी के परिणाम पर खुशी जताई। अब पांच अन्य मरीज भी ऐसी सर्जरी के लिए एम्स पहुंच चुके हैं।

सर्जरी में चार विभागों के विशेषज्ञ शामिल

इस ऑपरेशन में पुरुष जननांगों की संरचना बदलकर महिला जननांगों जैसी संरचना का पुनर्निर्माण किया गया। सर्जरी में चार विभागों के विशेषज्ञ शामिल रहे। एम्स में सर्जरी का नेतृत्व बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. मनाल खान और सहायक प्राध्यापक डॉ. अभिनव सिंह ने किया। एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. अनुज जैन, स्त्री रोग विभाग के डॉ. अरुण कुमार डोरा और यूरोलॉजी विभाग के डॉ. देवाशीष कौशल ने सहयोग किया। ऑपरेशन में रेजिडेंट डॉक्टर भी शामिल रहे। डॉक्टरों का कहना है कि जेंडर-अफर्मिंग बॉटम सर्जरी का उद्देश्य व्यक्ति की शारीरिक बनावट को उसकी लैंगिक पहचान के अनुरूप बनाने में मदद करना है। हालांकि, हर ट्रांसजेंडर व्यक्ति के लिए सर्जरी जरूरी नहीं होती। इसका फैसला व्यक्ति की इच्छा, सहमति और चिकित्सकीय आकलन के आधार पर होता है।

ऐसी सर्जरी के बाद संक्रमण, रक्तस्राव, घाव भरने में देरी और पेशाब संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। इसलिए नियमित फॉलोअप और चिकित्सकीय निगरानी जरूरी है। एम्स डायरेक्टर डॉ. नरेंद्र कोतवाल ने कहा कि यह सर्जरी बेहतर इलाज की सुविधाओं और हर व्यक्ति को सम्मान के साथ स्वास्थ्य सेवाएं देने की हमारी सोच को दर्शाती है। प्रदेश के सरकारी अस्पताल में पहली बार ऐसी सर्जरी होना गर्व की बात है।

विशेषज्ञों की राय: हार्मोनल जांच और काउंसलिंग महत्वपूर्ण

गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) के वरिष्ठ एंडोक्रोनोलॉजिस्ट डॉ. मनुज शर्मा के मुताबिक, लैंगिक पहचान जन्म के समय निर्धारित लिंग से अलग हो सकती है। कुछ मामलों में जन्मजात शारीरिक भिन्नता होती है। हार्मोनल और जेनेटिक जांच के आधार पर इलाज तय होता है। सर्जरी के बाद हार्मोन थेरेपी और कुछ मामलों में आईवीएफ विकल्प हो सकता है। वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. जेपी अग्रवाल ने बताया कि ट्रांसजेंडर होना मानसिक बीमारी नहीं है। सामाजिक भेदभाव से तनाव और अवसाद हो सकता है। सर्जरी से पहले काउंसलिंग और बाद में पारिवारिक सहयोग महत्वपूर्ण है।

L. N. Bhargava