ऋषिकांत सिंह का सिल्वर मेडल: परिवार के संघर्ष की कहानी
ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में रविवार को ऋषिकांत सिंह ने कुल 264 किलो वजन उठाकर सिल्वर मेडल जीता। राजस्थान के बाड़मेर में उनके बड़े भाई अमरजीत सिंह टीवी पर हर लिफ्ट देख रहे थे। मेडल पक्का होने पर उनकी आंखें भर आईं।
परिवार का 15-16 साल का संघर्ष
मां और दोनों बहनों ने दूसरे के खेतों में मजदूरी की। बड़े भाई ने दोस्तों से कर्ज लेकर ऋषिकांत की डाइट और प्रतियोगिताओं का खर्च उठाया। पिता को ब्लड कैंसर होने के बाद भी परिवार ने ऋषिकांत से इलाज के लिए पैसे नहीं लिए, ताकि उनकी तैयारी प्रभावित न हो।
शुरुआत: बॉक्सिंग से वेटलिफ्टिंग तक
2007-08 में गांव के एक शिक्षक ने मणिपुर सरकार की स्पोर्ट्स अकादमी के बारे में जानकारी दी। ऋषिकांत बॉक्सिंग करना चाहते थे, लेकिन अकादमी के कोचों ने उनकी क्षमता देखकर वेटलिफ्टिंग के लिए चुन लिया। यहीं से खेल सफर शुरू हुआ।
आर्थिक तंगी के बीच कर्ज और मेहनत
2009 से 2012 तक सबसे कठिन दौर था। परिवार ने दोस्तों से कर्ज लेकर ऋषिकांत को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए पैसे दिए। बाद में भी कई बार उनकी तैयारी और डाइट के लिए उधार लेना पड़ा। ऋषिकांत जब घर पर होते थे, तो वह भी सभी के साथ मजदूरी करने जाते थे।
पिता की बीमारी और परिवार का त्याग
कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी के दौरान मार्च में पिता को ब्लड कैंसर का पता चला। ऋषिकांत ने इलाज के लिए पैसे भेजने की बात कही, लेकिन परिवार ने मना कर दिया। वे चाहते थे कि उनका पूरा ध्यान तैयारी और डाइट पर रहे।
अटूट सपने: दोनों बहनों की शादी में नहीं पहुंच सके
ऋषिकांत परिवार में सबसे छोटे हैं। दोनों बहनों की शादी के समय उनके अहम मुकाबले थे, इसलिए वह किसी भी शादी में शामिल नहीं हो सके। वह बाद में ही घर जा पाए।
भाई का कहना: सिल्वर की खुशी, गोल्ड की कसक
अमरजीत सिंह ने कहा, 'मैं खुद आगे पढ़ना चाहता था, लेकिन 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। छोटी बहन को डॉक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन हालात ऐसे नहीं थे। आज सबसे बड़ी खुशी यह है कि ऋषिकांत ग्रेजुएशन कर चुके हैं और देश का नाम रोशन कर रहे हैं।'
उन्होंने कहा, 'सिल्वर मेडल जीतने की खुशी है, लेकिन मन में कसक है। शायद हमसे ही कहीं कमी रह गई। अगर हम उनकी हर जरूरत समय पर पूरी कर पाते, तो शायद वह गोल्ड मेडल जीतते।'
L. N. Bhargava