समय बदला.. अखाड़े बदले. पहलवान बदले ..दतिया का मिजाज नहीं बदला.. दंगल ऐसा जहां मुस्कुराहट में छुपे राज, माथे पर चिंता की लकीरें खड़े कर रहे सवाल..(राकेश अग्निहोत्री)( सवाल दरसवाल) पूरी खबर के लिए लिंक क्लिक करें..🙏

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समय बदला.. अखाड़े बदले. पहलवान बदले ..दतिया का मिजाज नहीं बदला..
दंगल ऐसा जहां मुस्कुराहट में छुपे राज, माथे पर चिंता की लकीरें खड़े कर रहे सवाल..(राकेश अग्निहोत्री)( सवाल दरसवाल) पूरी खबर के लिए लिंक क्लिक करें..🙏

✅✅(दतिया का दंगल.. सवाल 'गामा' पहलवान कौन!... (दादा..दांव .. दर्प भी.. और दिग्गजों की दस्तक भी...दमदार कौन..? )✅✅ (सवाल दर सवाल)( राकेश अग्निहोत्री..) दतिया.. यह केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं.. बल्कि दंगलों की धरती है.. वह धरती.. जहां कभी अखाड़ों की मिट्टी में ताकत तौली जाती थी.. जहां दांव-पेच पर दर्शकों की धड़कनें थम जाती थीं.. और जहां विश्वविख्यात गामा पहलवान की गूंज आज भी लोककथाओं की तरह सुनाई देती है.. समय बदला.. अखाड़े बदले.. पहलवान बदले.. लेकिन दतिया का मिजाज नहीं बदला.. यहां हर बड़ा मुकाबला आज भी दंगल ही कहलाता है.. मैनेजमेंट और सोशल मीडिया इस दौर में जमीन पर किसकी धमक और कार्यकर्ता पर पकड़ किसकी यह सवाल अचानक खड़ा हो चुका है..आज लोकतंत्र के इसी अखाड़े में पूरा मध्यप्रदेश नजरें गड़ाए बैठा है.. चुनावी बिसात बिछ चुकी है.. कांग्रेस ने दतिया राजघराने के चेहरे घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा है.. तो भाजपा ने संगठन की नई पसंद आशुतोष तिवारी पर दांव लगाया है.. पहली नजर में मुकाबला सीधा दिखता है.. लेकिन दतिया की राजनीति कभी उतनी सीधी नहीं रही.. जितनी दिखाई देती है.. यहीं से यह चुनाव दिलचस्प हो जाता है.. अखाड़े के भीतर दो पहलवान आमने-सामने हैं.. लेकिन अखाड़े के बाहर भी एक ऐसा पहलवान मौजूद है.. जिसकी हर आवाज.. हर आहट.. हर बयान.. हर बैठक.. हर मुस्कान.. और हर संदेश चुनावी माहौल को प्रभावित करता दिखाई दे रहा है.. यह चेहरा है पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का.. टिकट कट गया.. लेकिन चर्चा नहीं कटी.. चुनाव नहीं लड़ रहे.. लेकिन चुनावी विमर्श के केंद्र में लगातार बने हुए हैं.. दतिया के दंगल की यही सबसे बड़ी दिलचस्पी है.. कभी गामा पहलवान के दांव की चर्चा होती थी.. आज नरोत्तम मिश्रा के संवाद की हो रही है.. तब अखाड़े में पकड़ मजबूत होना जीत की गारंटी मानी जाती थी.. आज कार्यकर्ताओं पर पकड़.. जनसंपर्क पर पकड़.. मीडिया पर पकड़.. और संदेश पर पकड़.. चुनावी ताकत का पैमाना बनती दिखाई दे रही है.. भाजपा का संदेश साफ है.. उम्मीदवार आशुतोष तिवारी हैं.. कमल ही चुनाव का चेहरा है.. संगठन ही सबसे बड़ी ताकत है.. लेकिन पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है.. क्या दतिया के इस दंगल में उम्मीदवार से ज्यादा चर्चा नरोत्तम मिश्रा की हो रही है..? यह सवाल यूं ही नहीं उठ रहा.. कार्यकर्ता बैठकों से लेकर जनसभाओं तक.. मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक.. नरोत्तम मिश्रा लगातार बहस के केंद्र में हैं.. वे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा रहे हैं.. प्रशासन को संदेश दे रहे हैं.. विरोधियों पर हमला बोल रहे हैं.. और साथ ही यह भरोसा भी दिला रहे हैं कि भाजपा ही चुनाव जीतेगी.. लेकिन उनके हर बयान के बाद नई राजनीतिक व्याख्या भी शुरू हो जाती है.. यहीं दतिया का चुनाव साधारण नहीं रह जाता.. यह केवल भाजपा और कांग्रेस का मुकाबला नहीं दिखता.. बल्कि रणनीति बनाम धारणा.. संगठन बनाम व्यक्तित्व.. और उम्मीदवार बनाम प्रभाव की समानांतर लड़ाई भी नजर आने लगती है..उधर कांग्रेस भी पूरी तरह चुप नहीं है.. राजघराने की विरासत.. परंपरागत जनाधार.. और भाजपा के भीतर उठ रही हर चर्चा पर उसकी नजर है.. पिछले चुनावों की गलतियों से सबक लेकर कांग्रेस इस बार ज्यादा संयमित दिखाई दे रही है.. वह जानती है कि चुनाव केवल नारों से नहीं.. बल्कि माहौल से भी जीते जाते हैं..इधर भाजपा बूथ प्रबंधन पर भरोसा जता रही है.. उधर कांग्रेस सामाजिक समीकरणों पर.. लेकिन इन दोनों के बीच चुनावी हवा का सबसे बड़ा केंद्र बार-बार नरोत्तम मिश्रा बनते दिखाई दे रहे हैं.. दतिया की चौपालों में चर्चा है.. बाजारों में बहस है.. चाय की दुकानों पर विश्लेषण है.. और सोशल मीडिया पर सवालों की बाढ़ है.. जितने समर्थक.. उतनी व्याख्याएं.. जितने विरोधी.. उतने तर्क.. लेकिन एक बात पर लगभग सभी सहमत नजर आते हैं.. दतिया का यह चुनाव अब केवल दो उम्मीदवारों की लड़ाई नहीं रह गया..कभी गामा पहलवान के दांव पर भीड़ तालियां बजाती थी.. आज लोकतंत्र के इस दंगल में जनता हर राजनीतिक दांव को परख रही है.. फर्क सिर्फ इतना है.. तब फैसला अखाड़े की मिट्टी करती थी.. आज फैसला मतपेटी करेगी..और शायद यही दतिया की सबसे बड़ी पहचान भी है.. यहां दंगल केवल लड़ा नहीं जाता.. देखा भी जाता है.. समझा भी जाता है.. और फिर जनता अपने अंतिम दांव से विजेता तय करती है.. ✅✅बॉक्स ✅✅(दतिया का दंगल: अखाड़े में दो पहलवान... लेकिन सबसे बड़ी कुश्ती किसकी?)✅✅ दतिया के पुराने अखाड़ों में एक कहावत खूब सुनाई देती है"कुश्ती हमेशा दो पहलवान नहीं लड़ते, कई बार अखाड़े के बाहर बैठे लोग भी मुकाबले का फैसला कर देते हैं"..दतिया का उपचुनाव भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है.. अखाड़े के भीतर गिने-चुने पहलवान बचे हैं.. भाजपा के आशुतोष तिवारी, कांग्रेस के घनश्याम सिंह और कुछ अन्य चेहरे.. लेकिन अखाड़े के बाहर खड़े वे चेहरे, जो माहौल बना रहे हैं, बहस खड़ी कर रहे हैं, समर्थकों को संदेश दे रहे हैं और विरोधियों को जवाब दे रहे हैं, वे कहीं अधिक प्रभावशाली नजर आने लगे हैं..यहीं से यह चुनाव दिलचस्प हो जाता है..जो दिखाई दे रहा है, क्या वही सच है? या सच के पीछे भी कोई दूसरा सच छिपा है? यही सवाल दतिया के चौराहों, चाय की दुकानों, सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा सुनाई दे रहा है..अगर इस चुनाव को शतरंज की बिसात मान लें तो पहली नजर में मुकाबला बिल्कुल सीधा दिखता है.. एक तरफ भाजपा..दूसरी तरफ कांग्रेस.. नरोत्तम मिश्रा एक ऐसा चेहरा जिस पर भाजपा कांग्रेस दोनों की नजर.. क्या बोलते हैं, जो बोलते हैं वहीं अंतिम सत्य है, तो क्या संदेश देते हैं.. फिलहाल कोई नहीं समझ पा रहा कि वह चाहते क्या है..बीच में कुछ और मोहरे जरूर हैं, लेकिन वे फिलहाल बाजी पलटते नहीं दिख रहे..दामोदर यादव ने जिस संयम के साथ चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई है, उससे तीसरे कोण की संभावना फिलहाल कमजोर पड़ती दिखाई देती है.. ऐसे में लड़ाई फिर उसी पारंपरिक द्वंद्व पर लौट आती है, जहां भाजपा अपने संगठन और कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक पर भरोसा करती है.. तो फिर उम्मीदवार के चेहरे क्या मायने रखते हैं.. दोनों को अपने दम पर चुनाव जीतने का भरोसा कम अपनी पार्टी से ज्यादा विरोधी दल पर उनकी नजर है.. कांग्रेस पिछले कई चुनावों की हार से सबक लेने की कोशिश करती दिख रही है..भाजपा अपने बूथ मैनेजमेंट और कैडर की ताकत पर भरोसा जताती है, इसके लिए उसे मशक्कत नए सिरे से करना पड़ रही है.. समय कम है पुराने पदाधिकारी यानी नरोत्तम की टीम पर भरोसा करें या उससे भी पुराने कार्यकर्ताओं को सामने लाकर चुनाव लड़े.. प्रदेश स्तर के नेताओं की मौजूदगी बढ़ गई है पर वह परिणाम को कितना प्रभावित कर पाएंगे यह देखना दिलचस्प होगा.. इस चुनाव में प्रचार थमने के बाद के 48 घंटे और थोड़ा उससे पहले अंतिम 72 घंटे का यह चुनाव किस करवट देगा इस पर सब की नजर है..लेकिन... शतरंज की हर बाजी में कभी-कभी ऐसा भी होता है कि चर्चा राजा और वजीर की नहीं, बल्कि उस खिलाड़ी की होने लगती है जो चाल चल रहा होता है,दतिया में यही भूमिका धीरे-धीरे नरोत्तम मिश्रा निभाते दिखाई दे रहे हैं.. भाजपा के कार्यकर्ता सम्मेलन में नरोत्तम के साथ आशुतोष की मौजूदगी, यहां से तमाम संदेश और उसके साथ नए सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. टिकट बदलने से ज्यादा टिकट काटने की चर्चा ज्यादा है..यहीं से कहानी अचानक मोड़ लेती है, टिकट किसी और को मिला.. चेहरा आशुतोष तिवारी बने.. लेकिन चुनाव का सबसे ज्यादा चर्चित चेहरा लगातार नरोत्तम मिश्रा बने हुए हैं, सवालक्या यह स्वाभाविक है?या फिर राजनीति की पटकथा में कोई ऐसा अध्याय लिखा जा रहा है, जिसे अभी पूरी तरह पढ़ा जाना बाकी है.? भाजपा के कार्यकर्ता सम्मेलन ने इस चर्चा को और तेज कर दिया,मंच पर आशुतोष तिवारी और नरोत्तम मिश्रा साथ दिखे..दोनों के बीच सहज संवाद दिखा,कार्यकर्ताओं ने तालियां बजाईं..संदेश साफ था भाजपा एकजुट है,लेकिन मंच से नीचे उतरते ही सोशल मीडिया ने दूसरा सवाल उठा दिया। अगर सब कुछ सामान्य है... तो फिर सबसे ज्यादा चर्चा उम्मीदवार की नहीं, नरोत्तम मिश्रा की क्यों? और नरोत्तम और आशुतोष जब भ्रमण के दौरान जनता के बीच पहुंचे तो सोशल मीडिया भी नए सिरे से संदेश देने लगा.. वह कहते हैं ना राजनीति कई बार नदी की तरह होती है,ऊपर से पानी सीधा बहता दिखाई देता है,लेकिन नीचे धाराएं अलग-अलग दिशा में चल रही होती हैं,दतिया में भी ऊपर से भाजपा का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है,"पार्टी सर्वोपरि है।" "आशुतोष तिवारी उम्मीदवार हैं""हर हाल में कमल खिलाना है"..लेकिन नीचे बह रही राजनीतिक धाराओं में सबसे ज्यादा हलचल नरोत्तम मिश्रा को लेकर दिखाई दे रही है, जिन्हें कंट्रोल में रखने के लिए प्रदेश भाजपा प्रभारी महेंद्र सिंह हो या फिर क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल या फिर मंत्री जगदीश देवड़ा और शहर चुनाव प्रभारी राहुल कोठारी कोई नहीं समझ पा रहा है कि चुनाव कैसे आगे बढ़ाया जाए.. पार्टी की पुरानी रणनीति नीति और स्ट्रक्चर से आगे बढ़े या दतिया में कुछ अलग रणनीति बनाकर आगे बढ़ना होगा.. कार्यालय के उद्घाटन की आड़ में राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश को दतिया पहुंचना पड़ा.. तो आनंद फाइनेंस कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम की घेराबंदी के लिए भाजपा ने अपने युवा देश सम्राट अरविंद भदौरिया को रणवीर सिंह रावत के साथ महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर दतिया में बैठा दिया.. भाजपा ने क्षत्रिय नेताओं की पूरी फौज उतार दी है, तो अवधेश नायक जो भाजपा के बागी फिलहाल कांग्रेस में उनके घर वापसी पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रही.. ब्राह्मण चेहरा आशुतोष और नरोत्तम लेकिन कुशवाहा वोट निर्णायक भूमिका में तो सांसद भारत सिंह कुशवाहा को सक्रिय कियाजा रहा.. नरोत्तम भाजपा की ताकत या फिर कमजोरी नेतृत्व असमंजस में क्योंकि उनकी हर सभाहर बयान,हर प्रतिक्रिया। हर मुस्कान,हर चेतावनी.. नई व्याख्या पैदा कर रही है.. सवाल नरोत्तम की भाषा... या राजनीतिक संदेश? कार्यकर्ता सम्मेलन में 5000 कार्यकर्ताओं की मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है,सबसे ज्यादा चर्चा उनके उस बयान की रही जिसमें उन्होंने पुलिस अधीक्षक को सीधे चेतावनी देते हुए कहा"नरोत्तम दोस्ती भी पूरी निभाता है और दुश्मनी भी पूरी निभाता है"राजनीति में शब्द केवल शब्द नहीं होते..वे संकेत भी होते हैं,संदेश भी होते हैं.. और कई बार भविष्य की भूमिका भी..यही कारण है कि इस बयान की व्याख्या अलग-अलग तरीके से हो रही है, क्या यह केवल प्रशासन को संदेश था?क्या यह कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की कोशिश थी?या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक लक्ष्य छिपा है? यही चर्चा दतिया में सबसे ज्यादा हो रही है.. दिलचस्प बात यह है कि टिकट कटने के बाद जिस तरह की राजनीतिक दूरी की आशंका जताई जा रही थी, वैसा कुछ दिखाई नहीं दिया..नरोत्तम मिश्रा लगातार कार्यकर्ताओं के बीच हैं, उम्मीदवार के साथ मंच साझा कर रहे हैं,जीत की बात कर रहे हैं,आशुतोष तिवारी को खुलकर समर्थन दे रहे हैं..लेकिन... इसी के साथ वे पार्टी के भीतर की पीड़ा भी छिपा नहीं रहे.. यहीं यह चुनाव रोचक बन जाता है,भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?क्या कांग्रेस?शायद नहीं..क्या उम्मीदवार?शायद नहीं..क्या संगठन? बिल्कुल नहीं..तो फिर? सबसे बड़ी चुनौती शायद परसेप्शन मैनेजमेंट बनती जा रही है,भाजपा का बूथ मैनेजमेंट जितना मजबूत माना जाता है, उतनी ही चुनौती इस समय मीडिया और सोशल मीडिया पर बनती धारणा को लेकर दिखाई दे रही है,पार्टी के सामने सबसे कठिन सवाल शायद यही है.. नरोत्तम मिश्रा को कितना आगे रखा जाए?और कितना पीछे? अगर उन्हें पूरी तरह फ्रंट फुट पर रखा जाता है तो पूरी चर्चा उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमने लगती है.. अगर दूरी बनाई जाती है तो कार्यकर्ताओं के बीच गलत संदेश जाने का खतरा है.. यानी दोनों तरफ जोखिम.. चुनाव प्रचार रफ्तार पकड़ रहा है केंद्र बिंदु खासतौर से मीडिया का नरोत्तम मिश्रा बने हुए.. वर्तमान परिदृश्य में यह कहना गलत नहीं होगा दतिया का यह उप चुनाव अब सड़क की सीधी यात्रा नहीं रह गया..यह भूलभुलैया बन चुका है,जहां हर मोड़ पर नया रास्ता निकलता है..और हर रास्ता नई चर्चा पैदा करता है.. मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और भाजपा के दूसरे दिग्गज नेताओं के अलावा कांग्रेस के बड़े चेहरों की गैर मौजूदगी में सोशल मीडिया सब पर भारी पड़ रहा है..मीडिया का सबसे बड़ा चेहरा?एक और दिलचस्प पहलू है,पिछले चार-पांच दिनों में दतिया का चुनाव कवर कर रहे अधिकांश पत्रकारों के लिए सबसे ज्यादा समाचार मूल्य किसमें रहा?उम्मीदवार?या नरोत्तम मिश्रा? उत्तर शायद सब जानते हैं, मीडिया फ्रेंडली राजनीति क्या होती है...इसे नरोत्तम मिश्रा वर्षों से जानते हैं,वे बयान देते हैं,सवाल छोड़ते हैं,संकेत देते हैं। और अगले दिन वही चर्चा बन जाती है..यह उनकी राजनीतिक शैली भी है और उनकी ताकत भी,कार्यकर्ता सम्मेलन के बाद नई बहस.. सम्मेलन के बाद सोशल मीडिया पर बहस का नया दौर शुरू हो गया..कुछ लोगों ने कहा.."दादा पूरी ताकत से मैदान में हैं"कुछ ने लिखा.."भाजपा की असली ऊर्जा अभी भी नरोत्तम हैं।" कुछ ने इसे संगठन की मजबूती बताया, नरोत्तम के आलोचक भी काम नहीं है यही नहीं विरोधी भी सक्रिय हो चुके हैं..तो कुछ ने सवाल उठाया..अगर सब कुछ उम्मीदवार के इर्द-गिर्द है, तो चर्चा किसी और की क्यों? यही चुनावी लोकतंत्र की खूबसूरती भी है,और चुनौती भी.. दतिया उप चुनाव के बनते बिगड़ते समीकरण और नई जमत के बीच बड़ा सवाल क्या नरोत्तम मिश्रा खुद इस उपचुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुके हैं?क्या उनका हर बयान भाजपा की ताकत बढ़ा रहा है?या फिर अनजाने में चुनाव का फोकस उम्मीदवार से हटाकर किसी दूसरी दिशा में ले जा रहा है?क्या भाजपा की रणनीति संगठन को आगे रखेगी या व्यक्तित्व की लोकप्रियता को?और सबसे बड़ा सवाल... क्या दतिया का मतदाता इन सारी चर्चाओं से प्रभावित होगा, या अंततः वही करेगा जिसके लिए वह हमेशा जाना जाता है—चुपचाप मतदान और मतदान के दिन अपना अंतिम फैसला? इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं..लेकिन इतना तय है कि दतिया का यह दंगल अब केवल आशुतोष बनाम घनश्याम का चुनाव नहीं रह गया है,यह रणनीति बनाम धारणा, संगठन बनाम व्यक्तित्व, और संदेश बनाम परसेप्शन की भी लड़ाई बन चुका है..यही कारण है कि दतिया का उपचुनाव अब सिर्फ परिणाम के लिए नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक संदेश के लिए भी पूरे मध्यप्रदेश की नजरों में है.. लाख तक के का सवाल बरकरार नरोत्तम की सक्रियता चुनाव में मौजूदगी किसके लिए ज्यादा फायदेमंद और किसका नुकसान पहुंचा सकती है.. नरोत्तम को यदि प्रचार से दूर रखा जाए तो फिर किसके समीकरण दुरुस्त हो सकते हैं.. क्या बीजेपी नरोत्तम पर नकेल कसने की कोशिश करेगी तो यह कितना जरूरी और कैसे संभव होगा कहीं दांव उल्टा तो नहीं पड़ जाएगा.. शायद इसके लिए भाजपा को इसके लिए क्रेडिबिलिटी और कॉन्फिडेंस वाले नेता की कमी महसूस हो रही है..

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