बाबा का धमाल.. खड़े हो रहे सवाल... सत्कार ..संदेश और सियासत.. बात पते की महेंद्र विश्वकर्मा..

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बाबा का धमाल.. खड़े  हो रहे सवाल... सत्कार ..संदेश और सियासत.. बात पते की महेंद्र विश्वकर्मा..

.त्वरित टिप्पणी.. (बाबा.. सत्ता और सियासत.. आखिर किसे किसकी ज्यादा जरूरत..?) मुख्यमंत्री से लेकर विधानसभा अध्यक्ष तक मुलाकातें.. धर्म.. राजनीति और जनस्वीकार्यता का नया समीकरण..? जकार्ता यात्रा से लौटने के बाद बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का भोपाल दौरा केवल धार्मिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा.. एक ही दिन में उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव.. विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर.. प्रदेश सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों और भाजपा संगठन से जुड़े नेताओं से हुई.. ठिकाना मंत्री लखन पटेल का आवास बना.. जहां वरिष्ठ मंत्री राकेश सिंह.. प्रहलाद पटेल.. रामपाल सिंह.. शिवाजी पटेल.. आलोक शर्मा सहित कई मंत्री और विधायक उनसे मिलने पहुंचे.. इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष के निवास और फिर मुख्यमंत्री निवास से आगे भी मेल मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा.. सभी ने बाबा का सम्मान किया.. बाबा ने आशीर्वाद दिया.. मुस्कुराते हुए सबकी बातें सुनीं.. और अपनी सलाह भी दी.. भोपाल पहुंचते ही पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने राम मंदिर विवाद पर भी खुलकर अपनी राय रखी.. यानी एक ही दिन धार्मिक संदेश.. सामाजिक संवाद और राजनीतिक मुलाकातें.. तीनों साथ-साथ चलती रहीं.. यही घटनाक्रम एक बार फिर पुराना लेकिन महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है.. आखिर धर्मगुरु और राजनेताओं में किसे किसकी ज्यादा जरूरत है..? क्या यह केवल शिष्टाचार भेंट थी.. या जनस्वीकार्यता और जनसंपर्क का साझा मंच..? क्या करोड़ों लोगों तक पहुंच रखने वाले धर्मगुरुओं की लोकप्रियता राजनीतिक नेतृत्व के लिए भी महत्वपूर्ण होती जा रही है..? और क्या धर्मगुरु भी अपने सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश को व्यापक स्तर तक पहुंचाने के लिए राजनीतिक संवाद को आवश्यक मानते हैं..? भारतीय राजनीति में संतों और राजनेताओं के बीच संवाद कोई नई परंपरा नहीं है.. लेकिन पिछले एक दशक में धर्मगुरुओं का सामाजिक प्रभाव और सार्वजनिक स्वीकार्यता पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ी है.. ऐसे में जब किसी लोकप्रिय धर्मगुरु की मुख्यमंत्री.. विधानसभा अध्यक्ष और सत्तारूढ़ दल के शीर्ष नेताओं से लगातार मुलाकातें होती हैं.. तो उनके राजनीतिक अर्थ भी तलाशे जाने लगते हैं.. एक और सवाल भी चर्चा में है.. क्या पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का सार्वजनिक संवाद अब भाजपा नेतृत्व के साथ अधिक दिखाई देता है..? यदि हां.. तो क्या कांग्रेस और उसके नेताओं से उनकी दूरी बढ़ी है.. या यह केवल परिस्थितियों का परिणाम है..? उपलब्ध घटनाक्रम के आधार पर इसका स्पष्ट निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है.. लेकिन राजनीतिक चर्चाओं में यह प्रश्न जरूर मौजूद है.. क्या कोई लोकप्रिय कथावाचक चुनाव जिताने की क्षमता रखता है..? या उसकी भूमिका केवल सकारात्मक माहौल और जनभावना तैयार करने तक सीमित रहती है..? भारतीय चुनावों का इतिहास बताता है कि धार्मिक प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है.. लेकिन चुनावी परिणाम अंततः कई राजनीतिक.. सामाजिक और स्थानीय कारकों से तय होते हैं.. ध्यान देने योग्य यह भी है कि भोपाल में धीरेंद्र शास्त्री ने राम मंदिर विवाद पर अपनी स्वतंत्र राय रखी.. उन्होंने जांच एजेंसियों पर भरोसा जताया.. साथ ही मंदिरों के संचालन में सनातन परंपरा के प्रति पूर्ण समर्पित लोगों की भूमिका पर जोर दिया.. यानी राजनीतिक मुलाकातों के बीच उन्होंने अपने धार्मिक और वैचारिक पक्ष को भी खुलकर रखा.. फिलहाल भोपाल का पूरा घटनाक्रम यही संकेत देता है कि धर्म और राजनीति का संवाद समाप्त नहीं हुआ है.. बल्कि नए स्वरूप में विकसित हो रहा है.. लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न अभी भी वही है.. क्या यह केवल सम्मान और संवाद का रिश्ता है.. या जनविश्वास.. जनस्वीकार्यता और सामाजिक प्रभाव का ऐसा साझा बिंदु.. जहां धर्मगुरु और राजनेता.. दोनों एक-दूसरे की उपस्थिति को महत्वपूर्ण मानते हैं..? आने वाले समय में यह बहस और गहरी हो सकती है.. विशेषकर तब.. जब देश की राजनीति में जनभावनाएं और जनसंपर्क.. दोनों पहले से कहीं अधिक निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं.. बॉक्स बाबा बागेश्वर की सलाह..व्यवस्था पर सवाल..या नए मॉडल का संकेत..? (राम मंदि..जांच जारी..विवाद बरकरार..संत परंपरा की पैरवी..सियासी मुलाकातें..आखिर धीरेंद्र शास्त्री कहना क्या चाहते हैं..?) राम मंदिर से जुड़े कथित अनियमितताओं के आरोपों की जांच अभी जारी है..लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने अब बहस को केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रखा है..मामला अब मंदिर प्रबंधन..संत परंपरा.. धार्मिक संस्थाओं की जवाबदेही और आस्था की विश्वसनीयता तक पहुंच गया है..इसी बीच भोपाल में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने जो कहा..उसने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं.. धीरेंद्र शास्त्री ने कहा.."राम मंदिर की इस घटना के बाद सनातनी वैष्णव परंपरा और संत परंपरा के प्रति पूर्ण समर्पित लोगों को ही भगवान के मंदिर की सेवा का कार्य मिलना चाहिए"..साथ ही उन्होंने आरोपियों को "महादंड" मिलने की बात दोहराते हुए कहा कि इस घटना से करोड़ों रामभक्तों की आस्था को ठेस पहुंची है.. और धर्म विरोधी ताकतों को पूरे संत समाज और मंदिर व्यवस्था पर सवाल उठाने का अवसर मिल गया है.. यहीं से सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है..आखिर धीरेंद्र शास्त्री का यह सुझाव किस ओर इशारा करता है..? क्या यह केवल एक धार्मिक आग्रह है..या मंदिरों के संचालन की वर्तमान व्यवस्था पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी भी है..? क्या वह यह कहना चाहते हैं कि बड़े मंदिरों के प्रबंधन में संत परंपरा की भूमिका और मजबूत होनी चाहिए..? या फिर यह केवल आस्था और समर्पण को प्राथमिकता देने का संदेश है..? हालांकि..उनके बयान में कहीं भी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट..संघ..विश्व हिंदू परिषद..या किसी अन्य संस्था का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है..इसलिए यह निष्कर्ष निकालना कि उनका इशारा किसी विशेष संगठन की ओर था..उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उचित नहीं होगा..लेकिन इतना जरूर है कि उनके बयान ने मंदिर प्रबंधन की संरचना पर नई बहस शुरू कर दी है. यह भी ध्यान रखने योग्य है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार द्वारा किया गया था.. यह एक विधिक संस्था है..ऐसे में उसके गठन..पुनर्गठन या संरचना में किसी भी बदलाव का निर्णय केवल सार्वजनिक बयान से नहीं.. बल्कि कानूनी और संस्थागत प्रक्रिया से ही संभव होगा..धीरेंद्र शास्त्री ने एक महत्वपूर्ण संतुलन भी रखा..उन्होंने आरोपियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की.. लेकिन साथ ही यह भी कहा कि एसआईटी जांच कर रही है और जांच एजेंसियों को अपना काम करने देना चाहिए..यानी उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा भी जताया.. राजनीतिक दृष्टि से यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है..क्योंकि धीरेंद्र शास्त्री अब केवल धार्मिक कथावाचक नहीं..बल्कि राष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखने वाले प्रभावशाली सार्वजनिक व्यक्तित्व बन चुके हैं..उनके बयान को धार्मिक और राजनीतिक..दोनों नजरियों से देखा जाता है. सबसे बड़ा प्रश्न अब यह नहीं है कि ट्रस्ट बदलेगा या नहीं..बल्कि यह है कि क्या मौजूदा विवाद के बाद मंदिर प्रबंधन की पारदर्शिता..जवाबदेही और विश्वसनीयता को और मजबूत करने की जरूरत महसूस की जा रही है..? क्या आस्था और प्रशासन के बीच संतुलन का कोई नया मॉडल सामने आएगा..? और क्या संत समाज की भूमिका भविष्य में पहले से अधिक संस्थागत रूप ले सकती है..? फिलहाल इतना स्पष्ट है कि जांच अभी जारी है.. अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है..लेकिन बाबा बागेश्वर के बयान ने एक नई बहस जरूर शुरू कर दी है.. कि भगवान के मंदिरों का संचालन केवल प्रशासनिक व्यवस्था से चले.. या उसमें सनातन परंपरा से जुड़े संतों और धर्माचार्यों की भूमिका भी निर्णायक रूप से सुनिश्चित की जाए..यही वह सवाल है..जो आने वाले दिनों में धार्मिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन सकता है.