राजनीति में धारणा अक्सर वास्तविकता से अधिक प्रभाव डालती है। कांग्रेस सरकार को घेरने के लिए आंदोलन की घोषणा कर रही थी, लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया की सुर्खियां उसकी अंदरूनी कलह बन गईं। भाजपा ने इसी अवसर को भुनाते हुए कांग्रेस पर संगठनहीनता, अनुशासनहीनता और नेतृत्व संकट के आरोप लगाए। आशीष अग्रवाल का ट्वीट केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि कांग्रेस की मौजूदा स्थिति पर भाजपा की आक्रामक संचार रणनीति का हिस्सा है। भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि जहां कांग्रेस आंतरिक विवादों में उलझी है, वहीं भाजपा विकास, सुशासन और संगठनात्मक मजबूती के एजेंडे पर आगे बढ़ रही है। अब कांग्रेस के सामने चुनौती केवल भाजपा के आरोपों का जवाब देना नहीं है, बल्कि अपने व्यवहार से यह साबित करना भी है कि पार्टी के भीतर अनुशासन और नेतृत्व पूरी तरह नियंत्रण में है। क्योंकि यदि ऐसे घटनाक्रम लगातार दोहराए गए, तो विपक्ष के उठाए मुद्दों से ज्यादा उसकी अपनी अंतर्कलह ही राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनती रहेगी। ::: [6/30, 7:36 PM] Rakesh Agnihotri: बॉक्स बड़ा इंट्रो के बाद✅✅ (मंगलवार :मार्गदर्शक.. नेता.. कार्यकर्ता.. मीडिया.. पांच मंचों पर घिरी कांग्रेस..!) प्रेस कॉन्फ्रेंस.. बैठक.. सड़क.. सोशल मीडिया.. पीएसी.. एक ही दिन में उठे कई सवाल.. आखिर कांग्रेस की कलह खत्म क्यों नहीं हो रही..? भोपाल में मंगलवार का दिन कांग्रेस के लिए सरकार को घेरने का था.. लेकिन दिनभर के घटनाक्रम ने पार्टी को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया.. एक ही दिन में कांग्रेस के भीतर पांच अलग-अलग मंचों पर विरोधाभास.. असंतोष.. अनुशासनहीनता और नेतृत्व को लेकर सवाल सामने आए.. परिणाम यह रहा कि सरकार पर हमला करने निकली कांग्रेस को अपने ही संगठन पर सफाई देनी पड़ी.. सबसे पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में साथ आए.. उद्देश्य था उज्जैन भूमि प्रकरण पर सरकार को घेरना और पिछले दिनों दोनों नेताओं के बयानों से पैदा हुए विवाद पर विराम लगाना.. दिग्विजय सिंह ने सफाई दी कि उन्होंने जीतू पटवारी के लिए "दलाल" शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था.. लेकिन सवाल यह भी खड़ा हुआ कि यदि विवाद था ही नहीं.. तो संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सफाई देने की जरूरत क्यों पड़ी.. क्या यह डैमेज कंट्रोल था..? प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही थी.. उसी समय कांग्रेस कार्यालय के भीतर यूथ कांग्रेस की संगठनात्मक बैठक में धक्का-मुक्की हो गई.. समीक्षा बैठक विवाद में बदल गई.. प्रदेश अध्यक्ष यश घनघोरिया को खुद बीच-बचाव करना पड़ा.. जिस संगठन को युवाओं का नेतृत्व तैयार करना है.. वह अपनी बैठक का अनुशासन नहीं संभाल पाया.. इस घटना ने कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.. कांग्रेस कार्यालय के बाहर भी तस्वीर अलग नहीं थी.. रतलाम से पैदल चलकर भोपाल पहुंचे कार्यकर्ता न्याय की मांग लेकर प्रदेश अध्यक्ष से मिलने आए.. मुलाकात के बाद भी असंतोष खत्म नहीं हुआ.. बाद में उन्हें पार्टी कार्यालय के बाहर फिर धरना देना पड़ा.. सवाल उठा कि जब अपने कार्यकर्ता ही संगठन के भीतर न्याय की मांग कर रहे हों.. तब जनता तक क्या संदेश जाएगा..? विवाद यहीं नहीं रुका.. सोशल मीडिया पर पूर्व मंत्री स्वर्गीय सत्यव्रत (सत्य) चतुर्वेदी की पुत्री निधि चतुर्वेदी ने दिग्विजय सिंह को सार्वजनिक सलाह देते हुए कहा कि अब उन्हें मार्गदर्शक मंडल में जाकर युवाओं के लिए रास्ता छोड़ देना चाहिए.. यानी कांग्रेस के भीतर पीढ़ीगत नेतृत्व का सवाल भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया.. राजनीतिक मामलों की समिति (PAC) की बैठक में भी दिग्विजय सिंह के बयान चर्चा का विषय बने.. सूत्रों के मुताबिक कुछ नेताओं ने साफ कहा कि ऐसे बयानों से संगठन को नुकसान हो रहा है.. यदि वरिष्ठ नेता ही सार्वजनिक विवादों में रहेंगे तो 2028 की तैयारी कैसे होगी.. यानी जिस विवाद को प्रेस कॉन्फ्रेंस में समाप्त करने की कोशिश हुई.. वही पार्टी के सर्वोच्च राजनीतिक मंच पर फिर उठ गया.. मंगलवार को कांग्रेस पांच मंचों पर दिखाई दी.. प्रेस कॉन्फ्रेंस में डैमेज कंट्रोल.. यूथ कांग्रेस बैठक में हंगामा.. कार्यालय के बाहर कार्यकर्ताओं का विरोध.. सोशल मीडिया पर वरिष्ठ नेतृत्व पर सवाल.. और पीएसी में रणनीतिक असहमति.. यह केवल संयोग नहीं.. बल्कि संगठन के भीतर बढ़ती बेचैनी का संकेत माना जा रहा है.. प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं.. बल्कि संगठन को एकजुट रखना दिखाई दे रही है.. प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भी जब यूथ कांग्रेस विवाद पर सवाल पूछा गया.. दिग्विजय सिंह बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए.. उस समय जीतू पटवारी का उन्हें संकेत देकर आगे ले जाना भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया.. उधर भाजपा ने भी मौका नहीं गंवाया.. प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए कहा.. "जो अपनी बैठक नहीं संभाल पा रहे.. वे प्रदेश क्या संभालेंगे..?" भाजपा अब कांग्रेस के आरोपों का जवाब देने के बजाय उसकी अंदरूनी कलह को ही राजनीतिक हथियार बना रही है.. सबसे बड़ा सवाल यही है.. क्या कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा है.. या उसकी अपनी अंतर्कलह..? क्या बार-बार सार्वजनिक हो रहे विरोधाभास केवल संयोग हैं.. या संगठन के भीतर संवाद और अनुशासन की गंभीर कमी का संकेत..? क्या नेतृत्व समय रहते इन संकेतों को समझेगा.. या 2028 की तैयारी से पहले ही संगठनात्मक विवाद राजनीतिक नुकसान का कारण बनते रहेंगे..? फिलहाल मंगलवार का पूरा घटनाक्रम यही बताता है कि कांग्रेस सरकार को जितना नहीं.. उससे कहीं ज्यादा अपने संगठन को संभालने की चुनौती से जूझ रही है.. और जब तक यह चुनौती समाप्त नहीं होती.. तब तक हर बड़ा राजनीतिक मुद्दा.. पार्टी की आंतरिक कलह की भेंट चढ़ता रहेगा.. [6/30, 7:41 PM] Rakesh Agnihotri: बॉक्स फोटो निधि चतुर्वेदी (सत्यव्रत से सीख ले दिग्विजय .. ) दिग्विजय का 'नागपाश', कांग्रेस पर प्रहार: अपनों के ही इस घातक बाण से कब मुक्त होगी मध्य प्रदेश कांग्रेस? ✅ उज्जैन के भूमि विवाद और वीर भारत न्यास के मामले में सच क्या है और झूठ क्या, कौन सही है और कौन गलत, यह जांच का विषय हो सकता है। लेकिन एक बात जो मेरी समझ के बिल्कुल परे है -और जिसे देखकर आज हर सच्चे कांग्रेसी का सिर शर्म से झुक गया है—वह यह है कि दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को अपने ही प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के खिलाफ इस तरह सार्वजनिक रूप से मोर्चा खोलने और अपशब्दों का इस्तेमाल करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी? अगर जीतू पटवारी कहीं गलत भी थे, तो एक वरिष्ठ और मार्गदर्शक होने के नाते दिग्विजय सिंह जी उन्हें आमने-सामने बैठकर या फ़ोन करके बता सकते थे। उनके पास दिल्ली से लेकर भोपाल तक पार्टी के तमाम आंतरिक मंच उपलब्ध थे, जहाँ वे अपनी बात रख सकते थे। लेकिन इन सब मर्यादाओं को दरकिनार कर, हाथ में फ़ाइल लेकर, विशेष रूप से उज्जैन जाकर और प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर पत्रकारों के सामने इस बात को उछालने का क्या औचित्य है? इस तरह सरेआम मीडिया के कैमरों के सामने प्रदेश अध्यक्ष के बयान को खारिज करना और उनके लिए अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करना किसी भी तौर पर जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। आखिर यह सारी कवायद क्यों की गई ? यह एक ऐसा गंभीर प्रश्न है जिसका जवाब आज संगठन का हर सच्चा कार्यकर्ता जानना चाहता है। दिग्विजय सिंह जी की यह छटपटाहट, यह गुस्सा और यह अमर्यादित आचरण और कुछ नहीं, बल्कि 'पुत्र-मोह' में उठाया गया एक बेहद अशोभनीय, पीड़ादायक और निंदनीय कदम है। अपने बेटे जयवर्धन सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाने की महत्वाकांक्षा में वे भूल चुके हैं कि पार्टी का अनुशासन क्या होता है। जब देश भर में राहुल गांधी जी और हमारे लाखों समर्पित ज़मीनी कार्यकर्ता भाजपा और संघ की जनविरोधी विचारधारा के खिलाफ सड़कों पर लाठियां खा रहे हैं, संघर्ष कर रहे हैं, तब पार्टी के एक शीर्ष नेता द्वारा इस तरह की बयानबाज़ी करना उन कार्यकर्ताओं के आत्म-सम्मान और निष्ठा पर करारा तमाचा है। अपनी ही पार्टी के नेतृत्व को कमज़ोर करके दिग्विजय सिंह जी सीधे तौर पर विपक्षी खेमे को ऑक्सीजन देने का काम कर रहे हैं। सवाल उठना लाज़मी है कि क्या दिग्विजय सिंह की यह 'संघ-अनुकूल' भाषा महज़ एक संयोग है या उनके पारिवारिक इतिहास का पुराना प्रभाव? जब भी कांग्रेस मज़बूती से खड़ी होने की कोशिश करती है, इनके ऐसे गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्य पार्टी के लिए एक नया संकट खड़ा कर देते हैं। व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते दिग्विजय सिंह जी अब खुले तौर पर इसी तर्ज पर चल रहे हैं कि - यदि मनमुताबिक कुछ हासिल न हुआ, तो रायता फैला दूँगा। इन्हीं व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और अंदरूनी खींचतान के चलते साल 2020 में हमारी सरकार गिरी थी, और 2023 और 2024 के चुनावों में भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था। और हालिया राज्यसभा चुनाव में जो कुछ भी हुआ, वह तो जग-जाहिर है। दिग्विजय सिंह जी की यह सोची-समझी रणनीति कि—'साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे' - हर बार संगठन को खोखला करने में ही कारगर साबित होती है। पार्टी को भीतर से खोखला करने वाले इस तरह के 'स्लीपर सेल' से बचने के लिए राहुल गांधी जी बार-बार हमें और पूरे संगठन को चेताते आ रहे हैं। आज मध्य प्रदेश में राहुल जी की यही चेतावनी बिल्कुल सच साबित हो रही है। कांग्रेस हाईकमान को अब इस अनदेखी के सिलसिले को तुरंत बंद करना होगा। पार्टी की साख और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बचाने के लिए यह अनिवार्य है कि नेतृत्व तुरंत दिग्विजय सिंह के विरुद्ध कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करे। — निधि सत्यव्रत चतुर्वेदी प्रदेश महासचिव, मध्य प्रदेश कांग्रेस [6/30, 7:52 PM] Rakesh Agnihotri: Box फोटो जयवर्धन सिंह हेडिंग जयवर्धन के खातिर.. दिग्विजय क्या बदलेंगे..? स्लग राजा की सक्रियता.. पुत्र की राजनीति.. कांग्रेस में पीढ़ी परिवर्तन का सबसे बड़ा सवाल दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में हैं.. मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य तक की लंबी राजनीतिक पारी उन्हें पार्टी का स्वाभाविक मार्गदर्शक बनाती है.. प्रदेश के लगभग हर जिले में आज भी उनके समर्थक और राजनीतिक प्रभाव मौजूद हैं.. लेकिन पिछले कुछ समय से उनके बयानों ने जितनी राजनीतिक चर्चा पैदा की है.. उतना ही कांग्रेस नेतृत्व को डैमेज कंट्रोल भी करना पड़ा है.. ऐसे में अब एक नया सवाल खड़ा हो रहा है.. क्या दिग्विजय सिंह की लगातार सार्वजनिक सक्रियता उनके पुत्र जयवर्धन सिंह की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने में मदद कर रही है.. या अनजाने में उसे सीमित भी कर रही है..? जयवर्धन सिंह ने अब तक अपेक्षाकृत शांत.. सहज और संवाद आधारित राजनीति की पहचान बनाई है.. कमलनाथ सरकार में मंत्री रहते हुए भी उन्होंने आक्रामक बयानबाजी की बजाय संतुलित व्यवहार से अपनी अलग छवि बनाई.. यही वजह है कि उन्हें कांग्रेस की नई पीढ़ी के संभावित चेहरों में देखा जाता है.. लेकिन जब-जब प्रदेश कांग्रेस में कोई बड़ा विवाद सामने आता है.. राजनीतिक विमर्श का केंद्र फिर दिग्विजय सिंह बन जाते हैं.. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जयवर्धन अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बना पाएंगे.. या लंबे समय तक पिता की राजनीतिक छाया में ही देखे जाएंगे..? यह बहस केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है.. बल्कि मध्यप्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व परिवर्तन से भी जुड़ी है.. राहुल गांधी लगातार नई पीढ़ी को आगे लाने की बात करते रहे हैं.. प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी उसी बदलाव के चेहरे माने जाते हैं.. ऐसे में क्या अब वरिष्ठ नेताओं की भूमिका प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप की बजाय मार्गदर्शन की होनी चाहिए..? दिग्विजय सिंह का अनुभव कांग्रेस की बड़ी ताकत है.. लेकिन हर राजनीतिक दौर की अपनी जरूरतें होती हैं.. क्या अब उनकी सबसे बड़ी भूमिका हर विवाद के केंद्र में रहने की है.. या फिर अपने लंबे अनुभव से नए नेतृत्व को मजबूत करने की..? क्या कांग्रेस दिग्विजय सिंह के राजनीतिक आभामंडल से आगे बढ़कर जयवर्धन.. जीतू और उमंग जैसे नेताओं को स्वाभाविक रूप से स्थापित कर पाएगी..? राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि यदि हर बड़े मुद्दे पर वरिष्ठ नेतृत्व ही सुर्खियों में रहेगा.. तो नई पीढ़ी के नेताओं को अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने का अवसर कब मिलेगा..? आखिर क्या दिग्विजय सिंह समय की राजनीतिक जरूरत को समझते हुए एक कदम पीछे हटकर मार्गदर्शक की भूमिका स्वीकार करेंगे.. ताकि जयवर्धन सिंह सहित कांग्रेस का नया नेतृत्व बिना किसी छाया के अपनी पहचान बना सके..? यही वह सवाल है.. जिसका जवाब केवल दिग्विजय सिंह के राजनीतिक भविष्य से नहीं.. बल्कि मध्यप्रदेश कांग्रेस में पीढ़ी परिवर्तन की दिशा से भी जुड़ा हुआ है.. बॉक्स (कांग्रेस की कलह पर आशीष का सवाल) कांग्रेस की कलह पर भाजपा का तंज... क्या विपक्ष ने खुद ही दे दिया राजनीतिक अवसर? यूथ कांग्रेस की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में हुए हंगामे ने कांग्रेस को केवल संगठनात्मक असहजता में ही नहीं डाला, बल्कि भाजपा को भी सीधा राजनीतिक हमला करने का मौका दे दिया। भाजपा प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल का ट्वीट इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया कि "जो अपनी बैठक तक नहीं संभाल पा रहे, वे प्रदेश क्या संभालेंगे?" दरअसल, यह हमला किसी एक धक्का-मुक्की की घटना तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ दिनों में उज्जैन भूमि प्रकरण को लेकर दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी के अलग-अलग बयानों, फिर संयुक्त प्रेसवार्ता के जरिए एकजुटता का संदेश देने की कोशिश और उसी दौरान यूथ कांग्रेस की बैठक में हुए विवाद ने कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति को कमजोर किया। भाजपा ने इसी विरोधाभास को मुद्दा बना लिया। राजनीति में धारणा अक्सर वास्तविकता से अधिक प्रभाव डालती है। कांग्रेस सरकार को घेरने के लिए आंदोलन की घोषणा कर रही थी, लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया की सुर्खियां उसकी अंदरूनी कलह बन गईं। भाजपा ने इसी अवसर को भुनाते हुए कांग्रेस पर संगठनहीनता, अनुशासनहीनता और नेतृत्व संकट के आरोप लगाए। आशीष अग्रवाल का ट्वीट केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि कांग्रेस की मौजूदा स्थिति पर भाजपा की आक्रामक संचार रणनीति का हिस्सा है। भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि जहां कांग्रेस आंतरिक विवादों में उलझी है, वहीं भाजपा विकास, सुशासन और संगठनात्मक मजबूती के एजेंडे पर आगे बढ़ रही है। अब कांग्रेस के सामने चुनौती केवल भाजपा के आरोपों का जवाब देना नहीं है, बल्कि अपने व्यवहार से यह साबित करना भी है कि पार्टी के भीतर अनुशासन और नेतृत्व पूरी तरह नियंत्रण में है। क्योंकि यदि ऐसे घटनाक्रम लगातार दोहराए गए, तो विपक्ष के उठाए मुद्दों से ज्यादा उसकी अपनी अंतर्कलह ही राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनती रहेगी.. ::: बॉक्स (मंगलवार :मार्गदर्शक.. नेता.. कार्यकर्ता.. मीडिया.. पांच मंचों पर घिरी कांग्रेस..!) प्रेस कॉन्फ्रेंस.. बैठक.. सड़क.. सोशल मीडिया.. पीएसी.. एक ही दिन में उठे कई सवाल.. आखिर कांग्रेस की कलह खत्म क्यों नहीं हो रही..? भोपाल में मंगलवार का दिन कांग्रेस के लिए सरकार को घेरने का था.. लेकिन दिनभर के घटनाक्रम ने पार्टी को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया.. एक ही दिन में कांग्रेस के भीतर पांच अलग-अलग मंचों पर विरोधाभास.. असंतोष.. अनुशासनहीनता और नेतृत्व को लेकर सवाल सामने आए.. परिणाम यह रहा कि सरकार पर हमला करने निकली कांग्रेस को अपने ही संगठन पर सफाई देनी पड़ी.. सबसे पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में साथ आए.. उद्देश्य था उज्जैन भूमि प्रकरण पर सरकार को घेरना और पिछले दिनों दोनों नेताओं के बयानों से पैदा हुए विवाद पर विराम लगाना.. दिग्विजय सिंह ने सफाई दी कि उन्होंने जीतू पटवारी के लिए "दलाल" शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था.. लेकिन सवाल यह भी खड़ा हुआ कि यदि विवाद था ही नहीं.. तो संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सफाई देने की जरूरत क्यों पड़ी.. क्या यह डैमेज कंट्रोल था..? प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही थी.. उसी समय कांग्रेस कार्यालय के भीतर यूथ कांग्रेस की संगठनात्मक बैठक में धक्का-मुक्की हो गई.. समीक्षा बैठक विवाद में बदल गई.. प्रदेश अध्यक्ष यश घनघोरिया को खुद बीच-बचाव करना पड़ा.. जिस संगठन को युवाओं का नेतृत्व तैयार करना है.. वह अपनी बैठक का अनुशासन नहीं संभाल पाया.. इस घटना ने कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.. कांग्रेस कार्यालय के बाहर भी तस्वीर अलग नहीं थी.. रतलाम से पैदल चलकर भोपाल पहुंचे कार्यकर्ता न्याय की मांग लेकर प्रदेश अध्यक्ष से मिलने आए.. मुलाकात के बाद भी असंतोष खत्म नहीं हुआ.. बाद में उन्हें पार्टी कार्यालय के बाहर फिर धरना देना पड़ा.. सवाल उठा कि जब अपने कार्यकर्ता ही संगठन के भीतर न्याय की मांग कर रहे हों.. तब जनता तक क्या संदेश जाएगा..? विवाद यहीं नहीं रुका.. सोशल मीडिया पर पूर्व मंत्री स्वर्गीय सत्यव्रत (सत्य) चतुर्वेदी की पुत्री निधि चतुर्वेदी ने दिग्विजय सिंह को सार्वजनिक सलाह देते हुए कहा कि अब उन्हें मार्गदर्शक मंडल में जाकर युवाओं के लिए रास्ता छोड़ देना चाहिए.. यानी कांग्रेस के भीतर पीढ़ीगत नेतृत्व का सवाल भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया.. राजनीतिक मामलों की समिति (PAC) की बैठक में भी दिग्विजय सिंह के बयान चर्चा का विषय बने.. सूत्रों के मुताबिक कुछ नेताओं ने साफ कहा कि ऐसे बयानों से संगठन को नुकसान हो रहा है.. यदि वरिष्ठ नेता ही सार्वजनिक विवादों में रहेंगे तो 2028 की तैयारी कैसे होगी.. यानी जिस विवाद को प्रेस कॉन्फ्रेंस में समाप्त करने की कोशिश हुई.. वही पार्टी के सर्वोच्च राजनीतिक मंच पर फिर उठ गया.. मंगलवार को कांग्रेस पांच मंचों पर दिखाई दी.. प्रेस कॉन्फ्रेंस में डैमेज कंट्रोल.. यूथ कांग्रेस बैठक में हंगामा.. कार्यालय के बाहर कार्यकर्ताओं का विरोध.. सोशल मीडिया पर वरिष्ठ नेतृत्व पर सवाल.. और पीएसी में रणनीतिक असहमति.. यह केवल संयोग नहीं.. बल्कि संगठन के भीतर बढ़ती बेचैनी का संकेत माना जा रहा है.. प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं.. बल्कि संगठन को एकजुट रखना दिखाई दे रही है.. प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भी जब यूथ कांग्रेस विवाद पर सवाल पूछा गया.. दिग्विजय सिंह बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए.. उस समय जीतू पटवारी का उन्हें संकेत देकर आगे ले जाना भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया.. उधर भाजपा ने भी मौका नहीं गंवाया.. प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए कहा.. "जो अपनी बैठक नहीं संभाल पा रहे.. वे प्रदेश क्या संभालेंगे..?" भाजपा अब कांग्रेस के आरोपों का जवाब देने के बजाय उसकी अंदरूनी कलह को ही राजनीतिक हथियार बना रही है.. सबसे बड़ा सवाल यही है.. क्या कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा है.. या उसकी अपनी अंतर्कलह..? क्या बार-बार सार्वजनिक हो रहे विरोधाभास केवल संयोग हैं.. या संगठन के भीतर संवाद और अनुशासन की गंभीर कमी का संकेत..? क्या नेतृत्व समय रहते इन संकेतों को समझेगा.. या 2028 की तैयारी से पहले ही संगठनात्मक विवाद राजनीतिक नुकसान का कारण बनते रहेंगे..? फिलहाल मंगलवार का पूरा घटनाक्रम यही बताता है कि कांग्रेस सरकार को जितना नहीं.. उससे कहीं ज्यादा अपने संगठन को संभालने की चुनौती से जूझ रही है.. और जब तक यह चुनौती समाप्त नहीं होती.. तब तक हर बड़ा राजनीतिक मुद्दा.. पार्टी की आंतरिक कलह की भेंट चढ़ता रहेगा.. (सत्यव्रत से सीख ले दिग्विजय .. ) दिग्विजय का 'नागपाश', कांग्रेस पर प्रहार: अपनों के ही इस घातक बाण से कब मुक्त होगी मध्य प्रदेश कांग्रेस? ✅ उज्जैन के भूमि विवाद और वीर भारत न्यास के मामले में सच क्या है और झूठ क्या, कौन सही है और कौन गलत, यह जांच का विषय हो सकता है। लेकिन एक बात जो मेरी समझ के बिल्कुल परे है -और जिसे देखकर आज हर सच्चे कांग्रेसी का सिर शर्म से झुक गया है—वह यह है कि दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को अपने ही प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के खिलाफ इस तरह सार्वजनिक रूप से मोर्चा खोलने और अपशब्दों का इस्तेमाल करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी? अगर जीतू पटवारी कहीं गलत भी थे, तो एक वरिष्ठ और मार्गदर्शक होने के नाते दिग्विजय सिंह जी उन्हें आमने-सामने बैठकर या फ़ोन करके बता सकते थे। उनके पास दिल्ली से लेकर भोपाल तक पार्टी के तमाम आंतरिक मंच उपलब्ध थे, जहाँ वे अपनी बात रख सकते थे। लेकिन इन सब मर्यादाओं को दरकिनार कर, हाथ में फ़ाइल लेकर, विशेष रूप से उज्जैन जाकर और प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर पत्रकारों के सामने इस बात को उछालने का क्या औचित्य है? इस तरह सरेआम मीडिया के कैमरों के सामने प्रदेश अध्यक्ष के बयान को खारिज करना और उनके लिए अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करना किसी भी तौर पर जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। आखिर यह सारी कवायद क्यों की गई ? यह एक ऐसा गंभीर प्रश्न है जिसका जवाब आज संगठन का हर सच्चा कार्यकर्ता जानना चाहता है। दिग्विजय सिंह जी की यह छटपटाहट, यह गुस्सा और यह अमर्यादित आचरण और कुछ नहीं, बल्कि 'पुत्र-मोह' में उठाया गया एक बेहद अशोभनीय, पीड़ादायक और निंदनीय कदम है। अपने बेटे जयवर्धन सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाने की महत्वाकांक्षा में वे भूल चुके हैं कि पार्टी का अनुशासन क्या होता है। जब देश भर में राहुल गांधी जी और हमारे लाखों समर्पित ज़मीनी कार्यकर्ता भाजपा और संघ की जनविरोधी विचारधारा के खिलाफ सड़कों पर लाठियां खा रहे हैं, संघर्ष कर रहे हैं, तब पार्टी के एक शीर्ष नेता द्वारा इस तरह की बयानबाज़ी करना उन कार्यकर्ताओं के आत्म-सम्मान और निष्ठा पर करारा तमाचा है। अपनी ही पार्टी के नेतृत्व को कमज़ोर करके दिग्विजय सिंह जी सीधे तौर पर विपक्षी खेमे को ऑक्सीजन देने का काम कर रहे हैं। सवाल उठना लाज़मी है कि क्या दिग्विजय सिंह की यह 'संघ-अनुकूल' भाषा महज़ एक संयोग है या उनके पारिवारिक इतिहास का पुराना प्रभाव? जब भी कांग्रेस मज़बूती से खड़ी होने की कोशिश करती है, इनके ऐसे गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्य पार्टी के लिए एक नया संकट खड़ा कर देते हैं। व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते दिग्विजय सिंह जी अब खुले तौर पर इसी तर्ज पर चल रहे हैं कि - यदि मनमुताबिक कुछ हासिल न हुआ, तो रायता फैला दूँगा। इन्हीं व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और अंदरूनी खींचतान के चलते साल 2020 में हमारी सरकार गिरी थी, और 2023 और 2024 के चुनावों में भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था। और हालिया राज्यसभा चुनाव में जो कुछ भी हुआ, वह तो जग-जाहिर है। दिग्विजय सिंह जी की यह सोची-समझी रणनीति कि—'साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे' - हर बार संगठन को खोखला करने में ही कारगर साबित होती है। पार्टी को भीतर से खोखला करने वाले इस तरह के 'स्लीपर सेल' से बचने के लिए राहुल गांधी जी बार-बार हमें और पूरे संगठन को चेताते आ रहे हैं। आज मध्य प्रदेश में राहुल जी की यही चेतावनी बिल्कुल सच साबित हो रही है। कांग्रेस हाईकमान को अब इस अनदेखी के सिलसिले को तुरंत बंद करना होगा। पार्टी की साख और कार्यकर्ताओं के मनोबल को बचाने के लिए यह अनिवार्य है कि नेतृत्व तुरंत दिग्विजय सिंह के विरुद्ध कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करे। — निधि सत्यव्रत चतुर्वेदी प्रदेश महासचिव, मध्य प्रदेश कांग्रेस बॉक्स जयवर्धन के खातिर.. दिग्विजय क्या बदलेंगे..? राजा की सक्रियता.. पुत्र की राजनीति.. कांग्रेस में पीढ़ी परिवर्तन का सबसे बड़ा सवाल दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में हैं.. मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य तक की लंबी राजनीतिक पारी उन्हें पार्टी का स्वाभाविक मार्गदर्शक बनाती है.. प्रदेश के लगभग हर जिले में आज भी उनके समर्थक और राजनीतिक प्रभाव मौजूद हैं.. लेकिन पिछले कुछ समय से उनके बयानों ने जितनी राजनीतिक चर्चा पैदा की है.. उतना ही कांग्रेस नेतृत्व को डैमेज कंट्रोल भी करना पड़ा है.. ऐसे में अब एक नया सवाल खड़ा हो रहा है.. क्या दिग्विजय सिंह की लगातार सार्वजनिक सक्रियता उनके पुत्र जयवर्धन सिंह की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने में मदद कर रही है.. या अनजाने में उसे सीमित भी कर रही है..? जयवर्धन सिंह ने अब तक अपेक्षाकृत शांत.. सहज और संवाद आधारित राजनीति की पहचान बनाई है.. कमलनाथ सरकार में मंत्री रहते हुए भी उन्होंने आक्रामक बयानबाजी की बजाय संतुलित व्यवहार से अपनी अलग छवि बनाई.. यही वजह है कि उन्हें कांग्रेस की नई पीढ़ी के संभावित चेहरों में देखा जाता है.. लेकिन जब-जब प्रदेश कांग्रेस में कोई बड़ा विवाद सामने आता है.. राजनीतिक विमर्श का केंद्र फिर दिग्विजय सिंह बन जाते हैं.. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जयवर्धन अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बना पाएंगे.. या लंबे समय तक पिता की राजनीतिक छाया में ही देखे जाएंगे..? यह बहस केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है.. बल्कि मध्यप्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व परिवर्तन से भी जुड़ी है.. राहुल गांधी लगातार नई पीढ़ी को आगे लाने की बात करते रहे हैं.. प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी उसी बदलाव के चेहरे माने जाते हैं.. ऐसे में क्या अब वरिष्ठ नेताओं की भूमिका प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप की बजाय मार्गदर्शन की होनी चाहिए..? दिग्विजय सिंह का अनुभव कांग्रेस की बड़ी ताकत है.. लेकिन हर राजनीतिक दौर की अपनी जरूरतें होती हैं.. क्या अब उनकी सबसे बड़ी भूमिका हर विवाद के केंद्र में रहने की है.. या फिर अपने लंबे अनुभव से नए नेतृत्व को मजबूत करने की..? क्या कांग्रेस दिग्विजय सिंह के राजनीतिक आभामंडल से आगे बढ़कर जयवर्धन.. जीतू और उमंग जैसे नेताओं को स्वाभाविक रूप से स्थापित कर पाएगी..? राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि यदि हर बड़े मुद्दे पर वरिष्ठ नेतृत्व ही सुर्खियों में रहेगा.. तो नई पीढ़ी के नेताओं को अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने का अवसर कब मिलेगा..? आखिर क्या दिग्विजय सिंह समय की राजनीतिक जरूरत को समझते हुए एक कदम पीछे हटकर मार्गदर्शक की भूमिका स्वीकार करेंगे.. ताकि जयवर्धन सिंह सहित कांग्रेस का नया नेतृत्व बिना किसी छाया के अपनी पहचान बना सके..? यही वह सवाल है.. जिसका जवाब केवल दिग्विजय सिंह के राजनीतिक भविष्य से नहीं.. बल्कि मध्यप्रदेश कांग्रेस में पीढ़ी परिवर्तन की दिशा से भी जुड़ा हुआ है..
(कांग्रेस में घमासान.. राजा बने धुरी.. जीतू का नेतृत्व सवालों में) एक दिन.. पांच मंच.. प्रेस कॉन्फ्रेंस.. पीएसी.. यूथ कांग्रेस.. सड़क.. सोशल मीडिया.. डैमेज कंट्रोल पर भारी पड़ी अंतर्कलह इंट्रो मध्यप्रदेश कांग्रेस में अंतर्कलह थमने का नाम नहीं ले रही है..