भाजपा में राजनैतिक नियुक्तियों पर श्राद्ध पक्ष ने लगाई रोक,सत्ता और संगठन के समन्वय से बनाई जाएगी ट्रांसपेरेंट पोस्टिंग लिस्ट

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भाजपा में राजनैतिक नियुक्तियों पर श्राद्ध पक्ष ने लगाई रोक,सत्ता और संगठन के समन्वय से बनाई जाएगी ट्रांसपेरेंट पोस्टिंग लिस्ट

राजनैतिक नियुक्तियों पर श्राद्ध पक्ष ने लगाई रोक गुटबाजी से बचकर संतुलन साधने की कवायद सत्ता और संगठन के समन्वय से बनाई जाएगी ट्रांसपेरेंट पोस्टिंग लिस्ट मध्य प्रदेश की राजनीति में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा राजनीतिक नियुक्तियों की है। भाजपा संगठन और सत्ता, दोनों ही स्तर पर नए समीकरण साधने में जुटे हैं। लेकिन फिलहाल संकेत यही हैं कि प्रदेश में राजनीतिक नियुक्तियों की घोषणा अभी टल गई है। भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और संगठन के प्रमुख नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे सभी गुटों को साधें और असंतोष को दूर करें। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का विवाद न खड़ा हो, इसलिए मामला श्राद्ध पक्ष तक ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। माना जा रहा है कि नियुक्तियों की घोषणा नवरात्र या दशहरे के बाद ही हो सकती है। जानकार सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हाल ही में प्रशासनिक फेरबदल कर "प्रशासनिक सर्जरी" पूरी कर दी है। आईएएस और आईपीएस अफसरों के तबादले अपेक्षाकृत आसानी से निपटा दिए गए, क्योंकि वहां बगावत की संभावना बहुत कम रहती है। लेकिन राजनीतिक नियुक्तियां अलग मसला है। इनमें क्षेत्रीय और गुटीय समीकरणों पर सीधा असर होता है। यदि किसी गुट की उपेक्षा हुई तो संगठन के भीतर असंतोष और बगावत की स्थिति बन सकती है। यही वजह है कि इस बार संगठन और सरकार दोनों ही पक्ष अत्यधिक सतर्कता बरत रहे हैं। कारण साफ नजर आता है राजनीतिक पंडितों की नजर में वह यह है कि राजनीतिक नियुक्तियों में देरी के पीछे संघ और केंद्र की गतिविधियां भी अहम मानी जा रही हैं। अगले एक सप्ताह में संघ प्रमुख मोहन भागवत का मध्य प्रदेश प्रवास प्रस्तावित है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस माह प्रदेश में आ रहे हैं। भाजपा नेतृत्व नहीं चाहता कि इन उच्चस्तरीय दिग्गजों के दौरों के बीच संगठन के भीतर विवाद या नाराजगी की स्थिति बने। यही कारण है कि राजनीतिक नियुक्तियों का मसला अभी दबा हुआ है। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि भाजपा इस समय किसी भी तरह का "बवाल" झेलने के मूड में नहीं है। विधानसभा चुनाव के बाद सरकार और संगठन के बीच संतुलन साधने की चुनौती पहले से ही बनी हुई है। नए प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल पर सभी गुटों को साधने और समन्वय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पुराने नेताओं और नए चेहरे, दोनों के बीच संतुलन कायम हो और कोई भी समूह खुद को उपेक्षित न महसूस करे। इसके अलावा मंत्रिमंडल विस्तार की सुगबुगाहट ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया है। यदि पहले राजनीतिक नियुक्तियां कर दी जाती हैं तो यह तय करना मुश्किल होगा कि कौन सा चेहरा मंत्री बनेगा और कौन संगठन में जिम्मेदारी पाएगा। इसलिए रणनीति यह है कि पहले मंत्रिमंडल विस्तार की तस्वीर साफ हो और उसके बाद राजनीतिक नियुक्तियों पर निर्णय लिया जाए। बॉक्स नेताओं की आस और जनता की नजरें भाजपा के तमाम दावेदार नेता लंबे समय से राजनीतिक नियुक्तियों की आस लगाए बैठे हैं। प्रदेशभर में यह चर्चा आम है कि आखिर किसे निगम-मंडलों में जगह मिलेगी और किसे किन पदों से नवाजा जाएगा। हालांकि, पार्टी का शीर्ष नेतृत्व चाहता है कि इस बार नियुक्तियां पूरी रणनीति और सावधानी से हों, ताकि किसी भी तरह का असंतोष या गुटबाजी न उभरे। कुल मिलाकर, राजनीतिक नियुक्तियों का मसला अभी "फिलवक्त" स्थगित है। नवरात्र या दशहरे के बाद ही तस्वीर साफ हो पाएगी। तब तक सत्ता और संगठन की प्राथमिकता यही है कि प्रदेश में सामंजस्य और संतुलन बनाए रखा जाए और किसी भी तरह का विवाद उभरने न पाए।