भोपाल-इंदौर में अधूरा पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम, सीमित अधिकारों पर सवाल
परिचय
देश के करीब 70 शहरों में लागू पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम को पुलिस प्रशासन का मजबूत मॉडल माना जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के भोपाल और इंदौर में यह व्यवस्था अभी भी आधी-अधूरी मानी जा रही है। यहां के पुलिस कमिश्नर्स को वे सभी अधिकार नहीं मिले हैं, जो अन्य कमिश्नरेट शहरों में सामान्य तौर पर उपलब्ध हैं।
भोपाल-इंदौर में सीमित अधिकारों वाला कमिश्नरेट
भोपाल और इंदौर में कमिश्नरी व्यवस्था मात्र सात तरह की प्रतिबंधात्मक कार्रवाई के अधिकारों के इर्द-गिर्द सीमित है। यहां के कमिश्नर किसी अपराधी के खिलाफ नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (एनएसए) के तहत कार्रवाई नहीं कर सकते। न ही उन्हें आग्नेयास्त्र (फायर आर्म्स) के लाइसेंस जारी करने या निरस्त करने का अधिकार प्राप्त है।
स्थिति यह है कि फील्ड में कार्यरत डीसीपी, जो एसपी स्तर के अधिकारी होते हैं, उन्हें कार्यालय में एक साधारण पेन खरीदने के लिए भी कमिश्नर ऑफिस को पत्र लिखकर अनुमति लेनी पड़ती है। इससे कमिश्नरेट सिस्टम की स्वायत्तता और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े होते हैं।
अन्य शहरों में विस्तृत अधिकार और मजबूत संरचना
इसके विपरीत, अहमदाबाद जैसे शहरों में डीसीपी स्तर पर ही अलग क्राइम ब्रांच की व्यवस्था है, जिसे लोकल क्राइम ब्रांच कहा जाता है। इसके साथ ही जिले में एक अलग डीसीपी क्राइम ब्रांच भी तैनात है, जिसके पास गंभीर अपराधों की जांच और कार्रवाई के व्यापक अधिकार हैं।
नेशनल पुलिस एकेडमी एक नोडल एजेंसी के रूप में देश के सभी कमिश्नरों को समान अधिकार देने के लिए काम कर रही है। इस दिशा में भोपाल और इंदौर के पुलिस कमिश्नर्स से उनके अधिकारों से संबंधित रिपोर्ट जल्द उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है, ताकि सिस्टम को पुन: डिज़ाइन और सशक्त किया जा सके।
सीमित कानूनी धाराएं और उनकी व्यावहारिक दिक्कतें
भोपाल-इंदौर में कमिश्नरेट सिस्टम लागू करते समय पुलिस को दंड प्रक्रिया संहिता (अब बीएनएसएस) की धाराओं 107 से 116, 144, 151 और 110 के तहत प्रतिबंधात्मक कार्रवाई के अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा जिला बदर की कार्यवाही, धरना-प्रदर्शन की अनुमति देना और शर्तों के उल्लंघन पर कार्रवाई करने की शक्तियां भी पुलिस के पास हैं।
हालांकि, कमिश्नर यहां लाइसेंस अथॉरिटी नहीं हैं। उन्हें आबकारी या लिकर लाइसेंस जारी करने या रद्द करने का अधिकार नहीं है। फायर आर्म्स लाइसेंस जारी करने और निरस्त करने की शक्तियां भी उनके पास नहीं हैं। साथ ही, किसी अपराधी को रासुका (राष्ट्र सुरक्षा अधिनियम) में निरुद्ध करने के अधिकार से भी वे वंचित हैं।
कानपुर मॉडल का अध्ययन, फिर भी अधूरे अधिकार
दिसंबर 2021 में भोपाल में कमिश्नरेट सिस्टम लागू होने के बाद पुलिस की पांच सदस्यीय टीम कानपुर भेजी गई थी, ताकि वहां की व्यवस्था का अध्ययन किया जा सके। टीम ने वापस लौटकर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर को एक विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया और इसका विजिट नोट पुलिस मुख्यालय को भी भेजा गया।
प्रेजेंटेशन में कानपुर पुलिस को उपलब्ध कई महत्वपूर्ण धाराओं और अधिकारों का उल्लेख किया गया, लेकिन इसके बावजूद भोपाल-इंदौर पुलिस की मांगों को पूरा नहीं किया गया। नतीजतन, यहां का कमिश्नरेट सिस्टम अभी भी सीमित अधिकारों के साथ काम कर रहा है।
धारा 133 और 145 जैसे अधिकारों की आवश्यकता
प्रेजेंटेशन में विशेष रूप से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 (अब बीएनएसएस की धारा 152) और धारा 145 (अब बीएनएसएस 164) को भी शामिल किया गया था। कानपुर पुलिस को इन दोनों धाराओं के तहत कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है।
धारा 133 के तहत पब्लिक न्यूसेंस यानी सार्वजनिक उपद्रव या बाधा, जैसे स्थायी और अस्थायी अतिक्रमण, पर सीधी कार्रवाई की जा सकती है। राजधानी भोपाल में अवैध गुमठियों और अतिक्रमण का बड़ा नेटवर्क सक्रिय होने के कारण यह धारा बेहद उपयोगी मानी जाती है। एमपी नगर, न्यू मार्केट, दस नंबर, कोलार, नेहरू नगर, जवाहर चौक, बावड़िया कला और बागसेवनिया जैसे क्षेत्रों में अवैध गुमठियों की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है।
इसी तरह धारा 145 के तहत कब्जे के निर्धारण और विवादित संपत्ति पर नियंत्रण के अधिकार मिलते हैं। यदि ये अधिकार कमिश्नरेट को मिलें, तो पुलिस स्थानीय विवाद, अवैध कब्जे और जमीन से जुड़े तनावपूर्ण मामलों को अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकती है।
निष्कर्ष
भोपाल और इंदौर में पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम लागू तो कर दिया गया है, लेकिन अधिकारों की कमी के चलते यह व्यवस्था पूर्ण रूप से प्रभावी नहीं हो पाई है। एनएसए, फायर आर्म्स और लिकर लाइसेंस, अतिक्रमण हटाने तथा सार्वजनिक उपद्रव से संबंधित धाराओं जैसे महत्वपूर्ण अधिकारों के अभाव में कमिश्नर और उनकी टीम प्रशासनिक रूप से बंधी हुई नजर आती है।
नेशनल पुलिस एकेडमी द्वारा सभी शहरों में कमिश्नरेट सिस्टम को समान और सशक्त बनाने की पहल यदि समयबद्ध तरीके से लागू होती है, तो भोपाल-इंदौर में भी पुलिस व्यवस्था अधिक सक्षम, जवाबदेह और तेज हो सकती है। फिलहाल, अधूरे अधिकारों वाला यह सिस्टम राजधानी और इंदौर जैसे बड़े शहरों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए एक चुनौती बना हुआ है।
Arvind Vishwakarma