पंजाब में सतलुज फिल्म की ग्राउंड स्क्रीनिंग
फिल्म का प्रदर्शन और लोगों की प्रतिक्रिया
पंजाब के फिरोजपुर जिले के चक मारन गांव में गुरुद्वारे के बाहर फिल्म सतलुज दिखाई गई। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी पर आधारित है। फिल्म 3 जुलाई को OTT पर रिलीज हुई थी, लेकिन 48 घंटे बाद हटा ली गई। तब से पंजाब के गांव-गांव में इसे बड़ी स्क्रीन पर दिखाया जा रहा है।
पीड़ित परिवारों के बयान
फिरोजपुर के वालिके गांव के रंजीत सिंह ने बताया कि 1990-92 के बीच पुलिस ने उनके पिता और चाचा को फर्जी एनकाउंटर में मार दिया था। उन्होंने कहा कि फिल्म में हकीकत का केवल 20 फीसदी हिस्सा दिखाया गया है। हरिके कैनाल के पास गुरप्रीत कौर ने बताया कि 1993 में पुलिस ने उनके पिता को घर से उठाया था और फिल्म देखकर उन्हें एहसास हुआ कि उनके पिता के साथ क्या हुआ होगा।
फर्जी एनकाउंटर के चश्मदीदों का दावा
सतवंत सिंह मानक ने कहा कि 90 के दशक में कई झूठे एनकाउंटर हुए और फिल्म में दिखाए गए दृश्यों से कहीं ज्यादा दरिंदगी हुई थी। उन्होंने बताया कि चरण सिंह को पुलिस ने दो गाड़ियों में बांधकर सड़क पर खींचकर मार डाला और लाश नहर में फेंक दी।
स्क्रीनिंग कराने वालों का पक्ष
मिसल सतलुज संस्था के देवेंद्र सिंह ने बताया कि वे अब तक 400-500 जगहों पर फिल्म दिखा चुके हैं। उन्होंने कहा कि फिल्म का नाम सतलुज इसलिए रखा गया क्योंकि अधिकतर लाशें सतलुज नदी में बहाई गई थीं। जसनूर सिंह बराड़ ने कहा कि युवाओं को फिल्म दिखाना जरूरी है ताकि वे जसवंत सिंह खालड़ा की कुर्बानी जान सकें।
कानूनी चुनौती
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट विनीत जिंदल ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फिल्म की स्क्रीनिंग और स्ट्रीमिंग पर रोक लगाने की मांग की है। याचिका में दावा किया गया है कि CBFC ने फिल्म में 127 कट सुझाए थे, लेकिन फिल्म मेकर्स ने नाम बदलकर इसे ZEE5 पर रिलीज कर दिया।
Adarsh Chaurasiya