बंगाल: TMC में विभाजन की सुगबुगाहट, 2 बागी विधायक विधानसभा पहुंचे
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) में विभाजन की स्थिति बन सकती है। पार्टी से निकाले गए दो विधायक, संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी, बुधवार सुबह विधानसभा पहुंचे। वे स्पीकर से मिलकर 59 विधायकों के समर्थन का दावा पेश करने की योजना बना रहे हैं।
बागी विधायकों की मांगें
सूत्रों के अनुसार, बागी विधायक स्पीकर के समक्ष तीन मुख्य मुद्दे उठाएंगे: वे स्वयं को असली तृणमूल कांग्रेस बताएंगे, ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता घोषित करने की मांग करेंगे, न कि शोभनदेव को, और यह दावा करेंगे कि दो-तिहाई बहुमत उनके साथ होने के कारण पार्टी का चुनाव चिह्न उन्हें मिलना चाहिए।
बहुमत का गणित
पश्चिम बंगाल विधानसभा में TMC के कुल 80 विधायक हैं। किसी नए गुट को मान्यता के लिए दो-तिहाई यानी 54 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी। इससे कम विधायकों का समर्थन होने पर स्पीकर नए गुट को मान्यता नहीं देंगे।
हालिया घटनाक्रम
सोमवार को संदीपन और ऋतब्रत ने कोलकाता के MLA हॉस्टल में TMC के कई विधायकों के साथ एक बैठक की थी, जिसमें ममता बनर्जी के कुछ खास विधायक भी शामिल हुए थे।
TMC में टूट की तीन संभावित स्थितियाँ
पहली संभावना:दो-तिहाई विधायक भाजपा में शामिल हों। अगर TMC के 80 में से 54 विधायक भाजपा में शामिल होते हैं, तो दलबदल कानून लागू नहीं होगा। हालांकि, भाजपा ने इस संभावना से इनकार किया है।
दूसरी संभावना:TMC दो गुटों में बंट जाए। एक समूह पार्टी से अलग होकर असली TMC होने का दावा कर सकता है। इसके लिए भी 54 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी। चुनाव आयोग इस मामले में फैसला लेगा, और यह मामला अदालत भी जा सकता है। इसके लिए 28 लोकसभा सांसदों में से 19 का समर्थन भी आवश्यक होगा। शिवसेना और NCP मामलों में, निर्वाचन आयोग ने केवल विधायकों के अलावा सांसदों, पार्टी संगठन और अधिकृत पदाधिकारियों के समर्थन को भी ध्यान में रखा था। यदि नया गुट सांसदों को अपने पक्ष में नहीं कर पाता है, तो वे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद तो पा सकते हैं, लेकिन पार्टी का नाम और चिह्न नहीं।
तीसरी संभावना:नया गुट अपनी नई पार्टी बना सकता है। इसके लिए भी 54 विधायकों को TMC छोड़कर नई पार्टी में शामिल होना पड़ेगा।
संविधान और दलबदल कानून
किसी पार्टी के बागी नेताओं के लिए केवल विधानसभा में संख्या ही निर्णायक नहीं होती। दलबदल कानून, पार्टी संगठन के संविधान और निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार निर्णय लिया जाता है। 91वें संविधान संशोधन (2003) के बाद, यदि कम से कम दो-तिहाई विधायक मूल पार्टी से अलग होने का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है। इसके बाद, चुनाव आयोग यह जांचता है कि पार्टी पर असली नियंत्रण किसका होगा, जिसके लिए चार बिंदु तय हैं।
फर्जी हस्ताक्षर की शिकायत और पार्टी से निष्कासन
सोमवार को ममता बनर्जी ने संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से निकाल दिया था। दोनों विधायकों ने स्पीकर से शिकायत की थी कि पार्टी ने शोभनदेव को नेता प्रतिपक्ष बनाने वाले प्रस्ताव में उनके फर्जी हस्ताक्षर किए थे। उनका आरोप है कि इस शिकायत के कारण ही उन्हें TMC से निकाला गया।
पिछले 12 दिनों में TMC में टूट के रास्ते बनाने वाले घटनाक्रम
Janmejay Chaturvedi