जीतू और जयवर्धन की जोड़ी क्या नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार को रास आएगी.. क्या राहुल गांधी के टारगेट को पूरा करेगी यह नई जोड़ी ? यह बड़ा सवाल जब कांग्रेस में नाथ और राजा आमने-सामने.. ..गुना में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच आयोजित मुलाकात में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और पूर्व मंत्री व विधायक जयवर्धन सिंह की जोड़ी ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। मंच पर जीतू पटवारी ने जयवर्धन को “सगे भाई से बढ़कर” बताया और रिश्तों का महत्व रेखांकित किया। इस बयान को केवल भावनात्मक जुड़ाव तक सीमित न मानते हुए राजनीतिक पंडित इसे कांग्रेस के भविष्य की रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं । दरअसल, मध्यप्रदेश कांग्रेस फिलहाल गुटबाज़ी और नेतृत्व संकट से जूझ रही है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं की छवि के बावजूद संगठन में नई ऊर्जा भरने और युवाओं को आगे लाने की मांग लगातार उठ रही है। ऐसे में राहुल गांधी भी “युवा जोश और टीम वर्क” के फॉर्मूले पर कांग्रेस संगठन को खड़ा करना चाहते हैं। यही वजह है कि जीतू पटवारी और जयवर्धन सिंह की “जय-वीरू” जैसी जोड़ी को कार्यकर्ताओं के बीच एक संदेश की तरह पेश किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जीतू पटवारी संगठनात्मक सख्ती और तेजतर्रार शैली के लिए जाने जाते हैं, वहीं जयवर्धन सिंह का व्यक्तित्व जमीन से जुड़े और सौम्य नेता के रूप में सामने आता है। दोनों के स्वभाव में यह संतुलन कांग्रेस के लिए अहम हो सकता है। गुना की मुलाकात में जिस तरह कार्यकर्ताओं ने उत्साह दिखाया, उससे संकेत मिलता है कि युवा नेतृत्व की जोड़ी कई स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर सकती है ।कांग्रेस के अंदरूनी समीकरणों की बात करें तो जीतू पटवारी को प्रदेश नेतृत्व की जिम्मेदारी मिलने के बाद गुटबाजी कम करने की चुनौती मिली है। इस चुनौती का समाधान तभी संभव होगा जब वे वरिष्ठ नेताओं की परंपरा और युवा चेहरों की उम्मीदों के बीच पुल का काम करें। जयवर्धन सिंह, दिग्विजय सिंह के बेटे होने के नाते परंपरा और अनुभव का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि जीतू पटवारी संगठन में नई ऊर्जा का प्रतीक माने जाते हैं। इस लिहाज से यह जोड़ी “पुराने और नए” के मेल का प्रतीक बनकर उभर सकती है। हालांकि, राजनीति में समीकरण हर वक्त बदलते रहते हैं। कांग्रेस के पास मजबूत रणनीति और जमीनी स्तर पर संघर्ष की जरुरत है। महज भावनात्मक अपील या जोड़ी की छवि से चुनावी जीत सुनिश्चित नहीं होती। लेकिन, यदि यह जोड़ी कार्यकर्ताओं में भरोसा पैदा करने, गुटों को साधने और जनता तक पहुंचने का काम लगातार करती है, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में इसका असर जरूर दिखाई देगा। संक्षेप में कहा जाए तो गुना से निकली यह तस्वीर और बयान केवल व्यक्तिगत रिश्तों का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि कांग्रेस संगठन को एकजुट करने और राहुल गांधी की “युवा काडर आधारित राजनीति” को जमीनी रूप देने का संकेत भी है। अब देखना होगा कि जीतू और जयवर्धन की यह दोस्ती सचमुच “शोले की जोड़ी” की तरह स्थायी साबित होती है या केवल एक राजनीतिक मंच की झलक भर बनकर रह जाती है।
जीतू - जयवर्धन की जोड़ी क्या उमंग को रास आएगी... (गीत दीक्षित की दो टूक)