जीतू-उमंग की कांग्रेस का सेल्फ गोल और सवाल... क्या बहस से बचकर जवाब के लिए तैयारी हेतु समय मांगा जा सकता था.. सवाल दर सवाल ( राकेश अग्निहोत्री)

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जीतू-उमंग की कांग्रेस का सेल्फ गोल और सवाल... क्या बहस से बचकर जवाब के लिए तैयारी  हेतु  समय मांगा जा सकता था.. सवाल दर सवाल ( राकेश अग्निहोत्री)

मध्य प्रदेश की राज्यसभा की तीसरी सीट का चुनाव मतदान से पहले ही समाप्त हो गया, लेकिन अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गया जिनके जवाब कांग्रेस को केवल भाजपा नहीं, बल्कि अपने भीतर भी तलाशने होंगे..आखिर किसने राहुल गांधी को निराश किया.. क्या इसकी जिम्मेदारी से होगी.. जिस चुनाव में कांग्रेस के पास संख्या बल था, उम्मीदवार था, राष्ट्रीय नेतृत्व का समर्थन था और भाजपा के मुकाबले सीट जीतने की संभावनाएं भी सुरक्षित मानी जा रही थीं, उसी चुनाव में पार्टी मतदान तक नहीं पहुंच सकी, ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर चूक कहां हुई? यह केवल तकनीकी गलती थी, अनुभव की कमी थी, ओवर कॉन्फिडेंस था या फिर समन्वय और समझदारी का अभाव? अंतिम समय पर आपत्ति पर हुई बहस को क्या तुरंत टाला जा सकता था..इन सवालों के जवाब तलाशना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह हार वोटों से नहीं, बल्कि प्रक्रिया के पहले चरण में ही दर्ज हो गई। ...राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि कांग्रेस ने अपनी ऊर्जा किस मोर्चे पर खर्च की और असली चुनौती कहां से सामने आई। बीती रात नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के आवास पर कांग्रेस विधायकों की बैठक हुई। एकजुटता का प्रदर्शन किया गया। सुबह-सुबह विधायकों को एयरपोर्ट ले जाया गया। संदेश स्पष्ट था कि पार्टी किसी भी संभावित टूट-फूट और क्रॉस वोटिंग की आशंका को लेकर गंभीर है। ...लेकिन विडंबना देखिए, जिस संकट को रोकने की तैयारी कांग्रेस कर रही थी, वह संकट आया ही नहीं। और जिस तकनीकी चुनौती को लेकर सतर्कता अपेक्षित थी, वहीं पार्टी फिसल गई। एयरपोर्ट से बेंगलुरु रवाना होने की तैयारी कर रहे विधायक बाद में वापस लौटे और राज्यसभा चुनाव की लड़ाई सचिवालय के भीतर कागजों, नियमों और आपत्तियों के बीच सिमट गई। क्या इस आपत्ति पर तुरंत बहस से बचते हुए कांग्रेस के वकील द्वारा समय मांगा जा सकता था और पूरी तैयारी के साथ जवाब देकर के इस समस्या से क्या बाहर निकाला जा सकता था.. ...यहीं से यह सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस ने राजनीतिक प्रबंधन को कानूनी तैयारी पर प्राथमिकता दे दी थी? भाजपा के नेताओं, समर्थकों और कानूनी विशेषज्ञों की टीम जहां दस्तावेजों की बारीकियों पर काम कर रही थी, वहीं कांग्रेस का बड़ा हिस्सा संभावित क्रॉस वोटिंग की आशंका से जूझता दिखाई दिया। ...विवेक तन्खा का बयान भी इस पूरे विवाद में महत्वपूर्ण हो जाता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कानूनी मामलों की गहरी समझ रखने वाले तन्खा ने जिस तरह सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए, उसने यदि भाजपा की नीति नीयत और संवैधानिक मूल्य कानून पर सवाल खड़े किए तो उसने पार्टी की तैयारी और समन्वय दोनों पर भी बहस छेड़ दी। सवाल केवल निर्वाचन अधिकारी के निर्णय का नहीं है, सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस के पास विशेषज्ञों की पर्याप्त सलाह और वैकल्पिक रणनीति मौजूद थी? ...राजनीतिक दल चुनाव लड़ते समय केवल उम्मीदवार नहीं उतारते, बल्कि कई स्तरों पर तैयारी करते हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस को अपने डमी उम्मीदवार की कमी महसूस हुई? यदि कोई वैकल्पिक व्यवस्था होती तो क्या पार्टी पूरी तरह मुकाबले से बाहर होने से बच सकती थी? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर आने वाले दिनों में कांग्रेस को स्वयं देना होगा। ...राहुल गांधी की पसंद मानी जाने वाली मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस ने स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया था। लेकिन अब चर्चा इस बात की भी है कि मीनाक्षी के सामने सबसे बड़ा खतरा भाजपा से था या कांग्रेस के भीतर मौजूद असुरक्षा और अविश्वास से? जब पूरा संगठन विधायकों को संभालने में व्यस्त दिखाई दे, तब यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है। ...भाजपा मंत्री विश्वास सारंग के दावे ने इस बहस को और हवा दी है। यदि भाजपा के आरोपों पर विश्वास किया जाए तो कांग्रेस को अपने ही विधायकों पर भरोसा नहीं था और क्रॉस वोटिंग की आशंका वास्तविक थी। हालांकि इस दावे का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया, लेकिन कांग्रेस की गतिविधियों ने इन आशंकाओं को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया। ...दिलचस्प बात यह है कि अंततः क्रॉस वोटिंग की नौबत ही नहीं आई। न कोई विधायक टूटा, न मतदान हुआ और न किसी को पार्टी लाइन से हटकर वोट देना पड़ा। इसके बावजूद कांग्रेस चुनावी मैदान से बाहर हो गई। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे "सेल्फ गोल" कहने से नहीं हिचक रहे। ...प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के लिए यह घटनाक्रम एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गया है। दोनों नेताओं ने पिछले डेढ़ वर्ष में संगठनात्मक एकजुटता और आक्रामक विपक्ष की छवि बनाने की कोशिश की है। लेकिन राज्यसभा चुनाव का यह परिणाम उस दावे के उलट जाता दिखाई देता है। ...दिग्विजय सिंह की सक्रियता और कमलनाथ की दूरी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। जिस सीट पर दिग्विजय सिंह का कार्यकाल समाप्त हुआ, उस सीट को लेकर वे लगातार सक्रिय दिखाई दिए। पार्टी बैठकों, संवाद और रणनीतिक चर्चाओं में उनकी मौजूदगी स्पष्ट थी। ...इसके विपरीत कमलनाथ अपेक्षाकृत दूरी बनाए हुए नजर आए। जबकि वर्तमान कांग्रेस विधायक दल के अधिकांश चेहरों के चयन में उनकी बड़ी भूमिका रही है। विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण से लेकर संगठनात्मक फैसलों तक कमलनाथ की छाप साफ दिखाई देती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि संकट की इस घड़ी में उन्होंने भोपाल में सक्रिय भूमिका क्यों नहीं निभाई? ...यदि कमलनाथ स्वयं विधायकों के बीच मौजूद रहते, तो क्या इससे पार्टी के भीतर भरोसे का वातावरण और मजबूत होता? क्या इससे संभावित असंतोष या आशंकाओं को कम किया जा सकता था? यह प्रश्न अब कांग्रेस के भीतर भी उठने लगे हैं। ...हालांकि यह भी संभव है कि कमलनाथ की दूरी कोई रणनीतिक निर्णय रही हो। लेकिन राजनीति में धारणा अक्सर वास्तविकता से अधिक प्रभावशाली होती है। और धारणा यही बनी कि कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग इस लड़ाई में पूरी ताकत से मैदान में दिखाई नहीं दिया। ...सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब कांग्रेस हर राज्य में एक-एक सीट के लिए संघर्ष कर रही है, तब मध्य प्रदेश जैसी स्थिति उसके लिए क्या संदेश छोड़ती है? यहां संख्या बल उसके पक्ष में था। सीट उसके प्रभाव क्षेत्र में मानी जा रही थी। फिर भी वह मतदान तक नहीं पहुंच सकी। ...यह केवल एक सीट का नुकसान नहीं है। यह संगठनात्मक क्षमता, कानूनी तैयारी और राजनीतिक समन्वय पर लगा प्रश्नचिह्न भी है। भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम में यह संदेश देने की कोशिश की कि कांग्रेस अभी भी चुनावी लड़ाई को केवल राजनीतिक नजरिए से देखती है, जबकि आधुनिक राजनीति में कानूनी और प्रक्रियागत तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो चुकी है। ...अब कांग्रेस भले ही इस निर्णय को चुनौती देने की तैयारी कर रही हो, लेकिन राजनीतिक नुकसान हो चुका है। न्यायिक प्रक्रिया अपना रास्ता लेगी, लेकिन जनधारणा के स्तर पर भाजपा बढ़त हासिल कर चुकी है। ...सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस के पास कोई बी-प्लान था? यदि था तो वह सामने क्यों नहीं आया? और यदि नहीं था, तो क्या यह मान लिया जाए कि पार्टी ने चुनाव को आवश्यकता से अधिक आसान मान लिया था? ...राज्यसभा की तीसरी सीट का यह पूरा घटनाक्रम कांग्रेस के लिए एक चेतावनी की तरह है। भाजपा ने उसे हराया या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि कांग्रेस अपनी तैयारियों की कमियों से जरूर हार गई। ...और राजनीति में कई बार विरोधी के हमले से ज्यादा नुकसान अपनी ही चूक पहुंचाती है। मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट पर फिलहाल यही सबसे बड़ा निष्कर्ष दिखाई देता है— जीतू-उमंग की कांग्रेस भाजपा के आक्रमण से कम, अपने ही सेल्फ गोल से ज्यादा घायल नजर आई। जीतू ने चुनाव आयोग के सामने विरोध प्रदर्शन का ऐलान कर दिया तो उधर दिल्ली में पार्टी का नेतृत्व भी सकरी हुआ और आयोग से अपेक्षा उसकी बढ़ रही है.. घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है देखना दिलचस्प होगा क्या आप कोई कांग्रेस के पास विकल्प है तो सवाल वही की डैमेज कंट्रोल आखिर क्यों फेल हो गया.. सवाल यह भी कांग्रेस की इस तैयारी पर कहीं पार्टी के अंदर से सवाल उसके अपने विधायकों द्वारा खड़े करना शुरू न हो जाए.. क्या इस घटनाक्रम से एकजुट हुई कांग्रेस फिर इंटरनल गुट बाजी के कारण विवादों में तो नहीं आजाएगी.. किस नेता ने सामने आकर वह किसने पीछे रहकर कांग्रेस की इस हार में अपने क्या हित साधे इसके लिए इंतजार करना होगा..

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