सिंह इज़ किंग: हैंडल विद केयर, ऑपरेशन थर्ड आई... मोहन का भरोसा ,अनुभव और दिल्ली से समन्वय संवाद संपर्क काम आया, सवाल दर सवाल (राकेश अग्निहोत्री)

· 1 min read
सिंह इज़ किंग: हैंडल विद केयर, ऑपरेशन थर्ड आई... मोहन का भरोसा ,अनुभव और दिल्ली से  समन्वय संवाद संपर्क काम आया, सवाल दर सवाल (राकेश अग्निहोत्री)

एयरपोर्ट से लेकर सचिवालय तक हाई वोल्टेज पॉलिटिकल ड्रामे के बीच राज्यसभा की तीसरी सीट का चुनाव अंततः मतदान तक पहुंचने से पहले ही समाप्त हो गया। कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के साथ भाजपा प्रत्याशी महेश केवट की जीत तय हो गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने केवल चुनावी परिणाम नहीं दिया, बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की राजनीतिक कार्यशैली को भी उजागर कर दिया... सचिवालय परिसर में कांग्रेस के नामांकन पर उठी आपत्तियों और उसके निरस्त होने की जानकारी सार्वजनिक रूप से लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने दी। इससे यह संदेश गया कि भाजपा के "ऑपरेशन थर्ड आई" का सबसे प्रमुख और आक्रामक चेहरा राकेश सिंह ही थे... अमित शाह के करीबी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के भरोसेमंद सहयोगी माने जाने वाले राकेश सिंह ने एक बार फिर साबित किया कि सरकार में उनकी भूमिका केवल विभागीय मंत्री तक सीमित नहीं है। राजनीतिक और रणनीतिक अभियानों में भी उनकी पकड़ मजबूत होती जा रही है... भाजपा ने शुरू से ही इस चुनाव को केवल संख्या बल की लड़ाई नहीं माना। पार्टी ने नामांकन प्रक्रिया के हर तकनीकी पहलू पर नजर रखी और कांग्रेस प्रत्याशी के दस्तावेजों में मौजूद कमियों को आधार बनाकर लगातार आपत्तियां दर्ज कराईं... अंततः वही तकनीकी आपत्तियां कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गईं। भाजपा ने बिना किसी विधायक के पाला बदलवाए कांग्रेस को चुनावी मुकाबले से बाहर कर दिया... पूरे घटनाक्रम के दौरान कांग्रेस का फोकस संभावित क्रॉस वोटिंग और विधायकों को एकजुट रखने पर अधिक दिखाई दिया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के आवास पर बैठक और रात्रिभोज इसी रणनीति का हिस्सा थे... कांग्रेस लगातार दावा करती रही कि उसके सभी 62 विधायक एकजुट हैं और किसी भी प्रकार की टूट-फूट की संभावना नहीं है। लेकिन जिस संकट को लेकर पार्टी सबसे ज्यादा चिंतित थी, वह सामने नहीं आया... दूसरी ओर जिस तकनीकी और कानूनी चुनौती को लेकर अतिरिक्त सावधानी अपेक्षित थी, उसी मोर्चे पर कांग्रेस कमजोर साबित हुई... सचिवालय में कांग्रेस नामांकन बचाने की कोशिश कर रही थी तो दूसरी तरफ विधायक एयरपोर्ट पर बेंगलुरु रवाना होने की तैयारी में जुटे थे। यह तस्वीर कांग्रेस की राजनीतिक प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े करती है... प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के लिए यह घटनाक्रम बड़ा झटका माना जाएगा। दोनों नेता लगातार संगठनात्मक मजबूती का संदेश दे रहे थे, लेकिन परिणाम इसके विपरीत रहा... कांग्रेस की सबसे बड़ी विफलता यह रही कि पार्टी अपने उम्मीदवार का नामांकन ही सुरक्षित नहीं रख सकी। इससे संगठनात्मक तैयारी और चुनावी प्रबंधन दोनों पर प्रश्नचिह्न लगे हैं... पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की भूमिका भी चर्चा में रही। विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण की प्रक्रिया में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी और वर्तमान विधायक दल पर उनकी राजनीतिक छाप स्पष्ट दिखाई देती है... इसके बावजूद संकट की इस घड़ी में कमलनाथ की सक्रियता अपेक्षाकृत सीमित रही। उनका ट्वीट काफी देर से सामने आया, जबकि भोपाल में विधायकों के साथ उनकी कोई प्रमुख रणनीतिक बैठक नजर नहीं आई... इसके उलट दिग्विजय सिंह लगातार सक्रिय दिखाई दिए। जिस सीट पर उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव की स्थिति बनी, उस सीट को लेकर वे लगातार संवाद और समन्वय करते रहे... कांग्रेस नेतृत्व ने मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी। राहुल गांधी की निकट सहयोगी मानी जाने वाली मीनाक्षी के नाम पर राष्ट्रीय नेतृत्व की स्पष्ट सहमति थी... प्रभारी हरीश चौधरी लगातार सक्रिय रहे। तेलंगाना कांग्रेस के नेता भी भोपाल पहुंचे, क्योंकि विवाद का एक हिस्सा वहां से जुड़े दस्तावेजों से संबंधित था। इसके बावजूद कांग्रेस अंतिम परिणाम अपने पक्ष में नहीं कर सकी... राजनीतिक रूप से यह घटनाक्रम भाजपा के लिए दोहरी सफलता बन गया। एक ओर सीट सुरक्षित हुई, दूसरी ओर कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरियां भी सार्वजनिक हो गईं... मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा के भीतर उभर रही नई शक्ति संरचना भी इस चुनाव के दौरान स्पष्ट दिखाई दी। राकेश सिंह जैसे नेताओं की बढ़ती भूमिका इसी बदलाव का संकेत मानी जा रही है... यह चुनाव एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ गया कि भाजपा अब केवल राजनीतिक अंकगणित नहीं, बल्कि कानूनी और प्रक्रियागत तैयारी को भी चुनावी रणनीति का हिस्सा बना चुकी है... वहीं कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम चेतावनी है कि केवल राजनीतिक एकजुटता पर्याप्त नहीं होती। चुनावी प्रक्रिया के तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर समान रूप से मजबूत पकड़ जरूरी होती है... अंततः राज्यसभा की तीसरी सीट का यह चुनाव मतदान के बिना समाप्त जरूर हुआ, लेकिन अपने पीछे यह संदेश छोड़ गया कि राजनीति में कई बार लड़ाई संख्या की नहीं, तैयारी की होती है। भाजपा तैयार थी, कांग्रेस सतर्क नहीं दिखी, और परिणाम ने दोनों दलों की स्थिति स्पष्ट कर दी...

Related Articles