कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल: राहुल की जिद बनाम प्रियंका का संवाद मॉडल

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कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल: राहुल की जिद बनाम प्रियंका का संवाद मॉडल

कांग्रेस में नेतृत्व और बदलाव पर सवाल, राहुल-प्रियंका की शैली की तुलना

इस लेख में कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व, उसकी कार्यशैली और बुनियादी बदलाव से बचने की प्रवृत्ति पर विस्तृत चर्चा की गई है। लेखक का मानना है कि समय के साथ राजनीतिक दलों की दिशा, विश्वसनीयता और पहचान उनके शीर्ष नेतृत्व से तय होती है, और 2025 में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों ने इसे फिर से उजागर किया है।

प्रियंका गांधी की तस्वीरों से उपजा नया विमर्श

लेख की शुरुआत हाल में चर्चा में रही दो तस्वीरों से होती है। पहली तस्वीर में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और अन्य पक्ष-विपक्ष नेताओं के साथ मुस्कुराते हुए चाय पीती दिखती हैं। दूसरी तस्वीर में वे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के साथ हिमाचल की सड़कों और केरल में अपनी प्राथमिकताओं पर चर्चा कर रही हैं। लेखक के अनुसार संसदीय परंपरा में यह सामान्य बात है, लेकिन इन दृश्यों से यह संदेश भी जाता है कि विपक्ष सरकार से संवाद और सुझाव तो दे सकता है, दबाव भी बना सकता है, पर उसे पूरी तरह अस्वीकार करने की प्रवृत्ति उचित नहीं है।

नेतृत्व की अहमियत और 2025 के चुनाव

लेख में कहा गया है कि एक मोड़ पर जाकर किसी भी दल में नेतृत्व ही सबसे अहम हो जाता है, वही जीत-हार और भविष्य की दिशा तय करता है। वर्ष 2025 में देश की राजधानी दिल्ली और राजनीतिक रूप से अहम बिहार में हुए चुनाव इसका उदाहरण बताए गए हैं। लेखक के अनुसार 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी नेता विपक्ष बने और पार्टी के भीतर भी प्रभावी नेता के रूप में स्थापित हुए, लेकिन इन चुनावों के बाद यह साफ दिखा कि वे खुद को कांग्रेस नेता से आगे बढ़ाकर एक व्यापक नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपग्रेड नहीं कर सके।

राहुल गांधी पर संवाद की कमी और अकड़ के आरोप

लेखक राहुल गांधी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए संवाद की कमी, जिद और अकड़ को मुख्य कारण बताते हैं। उनके अनुसार राहुल विपक्षी नेताओं से तारतम्य बनाने में असफल रहे हैं और सरकार से संवाद करना उनके लिए असहज है। संसद के अंदर भी उनका कठोर चेहरा ही ज्यादा दिखाई देता है। पार्टी के अंदर संवाद की जो स्थिति है, वह समय-समय पर कांग्रेस नेताओं द्वारा सोनिया गांधी को लिखी गई चिट्ठियों से सामने आती रही है। इसी पृष्ठभूमि में प्रियंका गांधी की सरकार से सहज बातचीत वाली तस्वीरें कांग्रेस के भीतर तुलना और चर्चा का विषय बनी हैं।

मोदी की संवाद क्षमता और विपक्ष से तुलना

दूसरी ओर, लेखक भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसे नेता के रूप में पेश करते हैं, जो हर किसी से संवाद में माहिर हैं। उनके अनुसार मोदी विपक्षी नेताओं से भी सहज और मुक्त संवाद करते हैं, जनता को स्पर्श करने वाले मुद्दों को उठाते हैं और चुनाव के समय पार्टी के साथ खड़े होकर जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेते हैं। लेखक यह भी लिखते हैं कि मोदी जब इतिहास के कुछ पन्ने सामने लाते हैं तो उससे कांग्रेस असहज होती है, लेकिन युवाओं को इतिहास याद दिलाना और सकारात्मक सोच की अपील करना प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी भी है।

संसदीय सत्र, चुनाव सुधार और कांग्रेस की भूमिका

शीतकालीन सत्र की शुरुआत पर लेखक को लगा कि कांग्रेस समय और जनता की अपेक्षाओं के अनुसार बदलने को तैयार हो रही है, क्योंकि लंबे समय बाद दो दिन के शोर-शराबे के बाद विपक्ष चर्चा और सुचारु कार्यवाही के लिए राजी हुआ। लेकिन चुनाव सुधार की बहस पर उनका आकलन है कि मानसिक बदलाव नहीं दिखा। लेखक के अनुसार, जहां सार्थक सुझाव दिए जाने चाहिए थे, वहां विपक्ष विशेषकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग के अधिकारों पर सवाल उठाते हुए उन्हें सीमित करने जैसी मांगें उठाईं।

लेख में उल्लेख है कि संविधान और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने माना है कि एसआईआर (सिस्टमेटिक वोटर रोल प्यूरीफिकेशन) कराना चुनाव आयोग का अधिकार है, जबकि विपक्ष इस पर आपत्ति कर रहा है। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए बनी समिति को लेकर भी विपक्ष ने सवाल उठाए, जबकि लेखक का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सरकार ने नियम बनाए हैं, जो उसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

नेता विपक्ष की भूमिका और युवाओं को संदेश

लेखक के अनुसार युवाओं को तर्क और इतिहास के उदाहरणों से समझाया जाना चाहिए, जिससे वे राजनीतिक प्रक्रियाओं से जुड़ सकें। इसी संदर्भ में वे इस बात पर जोर देते हैं कि पहले नेता विपक्ष ऐसी समितियों में शामिल नहीं होते थे, लेकिन मोदी सरकार ने लोकसभा के नेता विपक्ष को शामिल कर दिया और यह नियम किसी भी सरकार पर लागू रहेगा। लेखक का मत है कि ऐसी स्थिति में राहुल गांधी अपनी छवि को बड़ा दिखा सकते थे।

वे सुझाव देते हैं कि राहुल को चुनाव सुधार की बहस में राजनीति के अपराधीकरण को रोकने और एक ही स्थान से चुनाव लड़ने की बाध्यता जैसे मुद्दों पर कानून बनाने की बात रखनी चाहिए थी। एसआईआर पर चुनाव आयोग ने यह कहकर चुनौती दी है कि कुछ राज्यों में एसआईआर के बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की गई है और आपत्तियां मांगी गई हैं।

सूचना आयुक्तों की नियुक्ति और विश्वसनीयता पर प्रश्न

लेख में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति पर हुई बैठक का जिक्र है, जिसमें नेता विपक्ष ने यह कहकर सभी नामों पर आपत्ति जताई कि सामाजिक न्याय का ध्यान नहीं रखा गया। लेकिन जब सूची सार्वजनिक हुई तो आठ में से पांच नाम वंचित वर्ग से थे। लेखक का मानना है कि ऐसे मामलों से विपक्ष की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।

कांग्रेस संगठन की कमजोरी और बूथ स्तर की चुनौती

हाल में एसआईआर को लेकर कांग्रेस की एक बैठक का उल्लेख करते हुए लेखक कहते हैं कि पार्टी ने स्वयं स्वीकार किया कि उसके पास बूथ लेवल एजेंट बहुत कम हैं। देश पर लगभग छह दशक तक शासन करने वाली पार्टी के पास बूथ स्तर पर एजेंटों की कमी को वे नेतृत्व की विफलता मानते हैं।

लेख में यह भी बताया गया है कि पश्चिम बंगाल चुनाव के संदर्भ में तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने कथित तौर पर संकेत दिया कि यदि कांग्रेस गठबंधन की बात करेगी तो उससे सहयोग करने को कहा जाएगा। इस संदर्भ में कांग्रेस की संगठनात्मक क्षमता और जमीन स्तर पर उपस्थिति पर सवाल खड़े किए गए हैं।

वंदे मातरम्, राष्ट्रवाद और राहुल की उदासीनता

लेख में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर हुई चर्चा का उल्लेख है। लेखक के अनुसार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वंदे मातरम् देश के भीतर भावनाओं की अभिव्यक्ति था और पिछले ग्यारह वर्षों में राष्ट्रवाद की भावना और प्रबल हुई है। वे यह संकेत करते हैं कि राहुल गांधी शायद इस चर्चा में अधिक रुचि नहीं दिखा सके, जिससे उनकी प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठते हैं।

अमित शाह की टिप्पणी और कांग्रेस के लिए संदेश

चुनाव सुधार पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की टिप्पणी का हवाला देते हुए लेखक लिखते हैं कि शाह ने चुनाव में जीत-हार को नेतृत्व से जोड़ा। लेखक के अनुसार कांग्रेस के भीतर भी कई शीर्ष नेता पहले यह बात कह चुके हैं। भाजपा राज्यों में भी मोदी के नाम की गारंटी लेकर उतरती है और कुछ राज्यों में स्थानीय नेतृत्व भी लगातार जीत दिला रहा है।

लेख का निष्कर्ष यही है कि भाजपा की वर्तमान विश्वसनीयता और लोकप्रियता का बड़ा कारण नरेंद्र मोदी का नेतृत्व है, जबकि कांग्रेस को अपने नेतृत्व और रणनीति में बुनियादी बदलाव कर विश्वसनीयता के संकट से बाहर निकलना होगा। लेखक के अनुसार प्रियंका गांधी की संवाद-आधारित राजनीति और राहुल गांधी की टकराववादी एवं संवादहीन शैली के बीच का अंतर कांग्रेस के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है।

Adarsh Chaurasiya