चीन ने लिपुलेख विवाद पर अपनाया तटस्थ रुख
चीन ने भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख विवाद में किसी भी प्रकार की हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने स्पष्ट किया है कि लिपुलेख एक पारंपरिक दर्रा है और यह विवाद भारत और नेपाल के बीच एक द्विपक्षीय मसला है। उन्होंने कहा कि इसे दोनों देशों को आपसी बातचीत से सुलझाना चाहिए।
नेपाल ने जताई आपत्ति
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने हाल ही में चीन में आयोजित SCO समिट के दौरान इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने दावा किया कि लिपुलेख नेपाल का हिस्सा है और भारत-चीन के बीच हुई हालिया सहमति पर आपत्ति जताई। दरअसल, 19 अगस्त को भारत और चीन ने लिपुलेख पास को व्यापारिक मार्ग के तौर पर फिर से खोलने का निर्णय लिया था, जिस पर नेपाल ने विरोध दर्ज कराया।
भारत-नेपाल संबंधों पर चर्चा
नेपाल के प्रधानमंत्री ओली 16 सितंबर को भारत दौरे पर आने वाले हैं। इस दौरे से पहले भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने काठमांडू में नेपाल के अधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों के बीच संबंध मजबूत करने और व्यापार, कनेक्टिविटी तथा विकास सहयोग पर चर्चा हुई। ओली के दौरे में कुछ अहम समझौतों की उम्मीद है।
लिपुलेख का ऐतिहासिक महत्व
लिपुलेख दर्रा सदियों से व्यापार और तीर्थयात्रा का मुख्य केंद्र रहा है। यह दर्रा भारत और चीन के बीच औपचारिक व्यापारिक मार्ग भी है। धारचूला-लिपुलेख सड़क और गूंजी गांव में मंडी से व्यापार को नई गति मिल रही है।
लिपुलेख विवाद पर चीन के तटस्थ रुख से भारत और नेपाल को इसे सुलझाने के लिए आपसी प्रयास करने की जरूरत है। आने वाले दिनों में ओली के भारत दौरे से इस मसले पर प्रगति की संभावना है।