मोहन भागवत का आत्मनिर्भरता और समरसता पर जोर
संघ के प्रति विरोध और निस्वार्थ सेवा
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जितना विरोध हुआ है, उतना किसी अन्य संगठन का नहीं हुआ। बावजूद इसके, स्वयंसेवकों का समाज के प्रति निस्वार्थ प्रेम कम नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि इसी प्रेम से विरोध की धार कमजोर पड़ी है।
आत्मनिर्भरता और स्वदेशी का महत्व
भागवत ने आत्मनिर्भरता को देश के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वदेशी अपनाने का मतलब अंतरराष्ट्रीय व्यापार को समाप्त करना नहीं है। व्यापार और लेन-देन जारी रहेगा, लेकिन किसी दबाव में नहीं होगा।
समाज में समरसता और कानून का पालन
उन्होंने कहा कि नेक लोगों से दोस्ती करें और अच्छे कार्यों की सराहना करें, चाहे वे विरोधियों ने किए हों। उन्होंने हिंदू और इस्लाम धर्म के बीच की दूरियों को कम करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, हर परिस्थिति में संविधान और कानून का पालन करने की अपील की।
आरएसएस की शताब्दी और संवाद का लक्ष्य
आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न धर्मों और क्षेत्रों के प्रतिनिधि शामिल हुए। भागवत ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य समाज के सभी वर्गों और धर्मों के बीच संवाद और सह-अस्तित्व की संभावनाओं को बढ़ावा देना है।
कार्यक्रम का समापन इस विचार के साथ हुआ कि समाज की सेवा और विश्व कल्याण के लिए भारत को अपनी सांस्कृतिक शक्ति का उपयोग करना चाहिए।