✅ पुरानी पीढ़ी यदि बोझ तो करंट लाने वाले नए चेहरे कौन)✅ ✅ मध्य प्रदेश भाजपा के सामने अब सवाल सिर्फ पुराने और नए चेहरों का नहीं, बल्कि कौन सा चेहरा चुनावी मैदान में करंट पैदा कर सकता है, इसका है.. दतिया उपचुनाव ने पार्टी को एक महत्वपूर्ण सबक दिया है.. अनुभवी और वरिष्ठ नेतृत्व की पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर वर्तमान और नई पीढ़ी के चेहरों को जिम्मेदारी सौंपी गई.. संगठन, सरकार और चुनावी प्रबंधन में नए चेहरों की परीक्षा हुई, लेकिन अंततः टारगेट पूरा नहीं हो पाया.. तो क्या सिर्फ पीढ़ी परिवर्तन से चुनावी परिणाम बदल सकते हैं?.. या नए नेतृत्व को जिम्मेदारी के साथ स्थानीय स्वीकार्यता, संघर्ष का अनुभव और जनता से सीधा जुड़ाव भी चाहिए?.. मोहन काल में यह सवाल और बड़ा हो जाता है.. जेन जी के बाद बदलते राजनीतिक माहौल में कांग्रेस के पास राहुल गांधी जैसा राष्ट्रीय स्तर पर आक्रामक चेहरा और मध्य प्रदेश में जीतू पटवारी जैसा सक्रिय प्रदेश नेतृत्व है.. इसके मुकाबले भाजपा के पास कौन ऐसे चेहरे हैं जो डबल इंजन की सरकार के रहते मुद्दों को तलाश और तराश कर संगठन की सीमा से बाहर निकलकर सड़क पर उतरें, युवाओं से सीधा संवाद करें और कार्यकर्ताओं में राजनीतिक करंट पैदा कर सकें?.. जबकि कॉकरोच जनता पार्टी कांग्रेस के लिए थर्ड पार्टी पॉलिटिक्स का सहयोग करती हुई नजर आ रही.. अब नजर 30 और 31 अगस्त को ओरछा में होने वाली प्रदेश भाजपा की नई कार्यकारिणी की पहली बैठक पर भी है.. प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में राम राजा सरकार की नगरी में होने वाली यह बैठक केवल संगठनात्मक औपचारिकता होगी या 2028 की राजनीतिक तैयारी का शुरुआती संकेत भी देगी?.. क्या भाजपा जेन जी की चुनौती को ध्यान में रखते हुए जुझारू और संघर्षशील नए नेतृत्व को चिन्हित करने, उसे जिम्मेदारी देने और मैदान में उतारने पर कोई रणनीति बनाएगी?.. दिल्ली में राष्ट्रीय संगठन भी युवाओं की चुनौती को लेकर संकेत दे चुका है.. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के साथ विनोद तावड़े और स्मृति ईरानी को जेन जी से संवाद की जिम्मेदारी दिए जाने से साफ है कि युवा अब सिर्फ वोट बैंक नहीं, राजनीतिक नैरेटिव की ताकत हैं.. तो सवाल यह भी है ..क्या प्रबंधन के इस दौर में भाजपा को अब जुझारू नेतृत्व वाले नए क्षत्रपों की कमी महसूस हो रही है?.. और 2028 को ध्यान में रखते हुए क्या मोहन यादव-हेमंत खंडेलवाल की भाजपा पदाधिकारियों की नई सूची से आगे बढ़कर ऐसे चेहरों की तलाश करेगी, जो चुनाव जीतने के साथ माहौल भी बना सकें?.. दतिया का सबक, दिल्ली की रणनीति और ओरछा की बैठक.. इन तीनों को जोड़ें तो सवाल एक ही है,भाजपा अगली पीढ़ी को सिर्फ पद देगी या संघर्ष का मैदान भी? ✅✅✅ बॉक्स✅✅🙏 ✅✅( सड़क की सियासत में भाजपा का चेहरा कौन? 2028 से पहले क्या मध्य प्रदेश में नए चेहरों की दरकार)✅✅ 🙏✅ देश की राजनीति में फिलहाल तीन तरह की राजनीतिक सक्रियता एक साथ दिखाई दे रही है.. एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा की सत्ता और संगठन की राजनीति है.. निर्विवाद तौर पर सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत लेकिन नए सिरे से रणनीति बनाने को मजबूर भी.. दूसरी तरफ गठबंधन की पॉलिटिक्स के बावजूद केंद बिंदु बनते जा रहे राहुल गांधी की लगातार संवाद, आंदोलन और युवा केंद्रित स्ट्रीट पॉलिटिक्स है.. और तीसरी तरफ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसे नए राजनीतिक प्रयोगों की सोशल मीडिया आधारित सक्रियता.. कल का राजनीतिक परिदृश्य क्या होगा, यह कहना जल्दबाजी होगी.. लेकिन इतना तय है कि किसी चेहरे की लोकप्रियता, किसी फैसले की टाइमिंग और किसी रणनीति का जमीन पर उतरना माहौल बनाने और बदलने में बड़ी भूमिका निभाता है.. राजनीति में पार्टी जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही उसका चेहरा भी महत्वपूर्ण है.. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं.. सवाल इसलिए अब मध्य प्रदेश भाजपा के सामने है.., मोहन हेमंत की जोड़ी के लिए सड़क की सियासत के लिए उसके पास कौन सा चेहरा है?.. कौन ऐसा नेता है जो भीड़ खींच सकता है?.. पुरानी पीढ़ी अनुभवी लेकिन उनकी भूमिका सीमित होती जा रही.. ऐसे में कौन युवा पीढ़ी से संवाद कर सकता है?.. जाति वर्ग की राजनीति से आगे कौन चुनाव जीतने के साथ दूसरे क्षेत्रों में भी पार्टी के लिए वोट ट्रांसफर करा सकता है?.. 2028 विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीति में ढाई साल बहुत लंबा समय नहीं होता.. खासकर तब जब कांग्रेस राहुल गांधी के जरिए युवाओं और छात्रों के बीच नया नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश कर रही हो और नए राजनीतिक समूह सोशल मीडिया तथा सड़क के आंदोलनों के जरिए अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हों.. सवाल चेहरों की कमी का नहीं, असरदार चेहरों का है.. मध्य प्रदेश भाजपा में नए चेहरे सामने आए हैं.. संगठन में बदलाव हुआ है.. प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में नई टीम भी सक्रिय है.. सरकार में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ कई लोकप्रिय और प्रभावशाली चेहरे मौजूद हैं.. बावजूद इसके सवाल यह है कि इनमें से कितने नेता ऐसे हैं जिनकी अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता इतनी मजबूत है कि वे पार्टी के लिए किसी दूसरे विधानसभा क्षेत्र में जाकर भी माहौल बना सकें?.. दतिया उप चुनाव का प्रबंध हो या फिर चुनावी रणनीति पराजय के कारण सवालों के घेरे में आ चुकी है.. सीट कांग्रेस के कब्जे वाली तो फिर नया सवाल 2028 में जितनी सीटों पर कांग्रेस काबिज है क्या भाजपा के पास उसे जीतने की रणनीति और ताकत नहींबची है.. नई चुनौती और नए खड़े हो रहे सवालों के बीच यह कहना गलत नहीं होगा कि किसी पद पर बैठना और उस पद की प्रतिष्ठा बढ़ाना दो अलग बातें हैं..राजनीति में पद से पहचान मिल सकती है, लेकिन संघर्ष से स्वीकार्यता बनती है.. यही वह अंतर है जिस पर भाजपा को गंभीरता से विचार करना होगा.. डबल इंजन की मजबूरी सरकार के खिलाफ आंदोलन कैसे? भाजपा के सामने एक दिलचस्प राजनीतिक समस्या है.. मध्य प्रदेश में उसकी डबल इंजन सरकार है.. केंद्र में मोदी सरकार और राज्य में मोहन सरकार.. ऐसे में पारंपरिक विपक्षी राजनीति की तरह सड़क पर सरकार विरोधी आंदोलन खड़ा करना भाजपा के लिए संभव नहीं है.. फिर उसके नेता सड़क पर किस मुद्दे को लेकर उतरेंगे?.. यही चुनौती कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए अवसर बन सकती है.. पेपर लीक, बेरोजगारी, शिक्षा, महंगाई, स्थानीय प्रशासन, युवा अवसर और सामाजिक मुद्दे विपक्ष को आंदोलन की जमीन देते हैं.. भाजपा के लिए वही मुद्दे सरकार की जवाबदेही का सवाल बन जाते हैं.. इसलिए भाजपा को सरकार के बचाव की राजनीति से आगे बढ़कर समाधान की राजनीति का चेहरा तैयार करना होगा.. (सोशल मीडिया ने खेल बदल दिया) भाजपा ने जनहित देसी योजनाओं और हर वर्ग खसते जरूरतमंदों के लिए आर्थिक मदद और सहयोग से एक बड़ा वोट बैंक बनाया है लेकिन अब राजनीति बदल रही है.., आज राजनीतिक माहौल केवल रैली और पोस्टर से नहीं बनता.. एक वीडियो, एक बयान, एक छात्र का सवाल या एक वायरल अभियान कुछ घंटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकता है..राहुल गांधी का युवा संवाद इसी बदलती राजनीति का उदाहरण है.. कॉकरोच जनता पार्टी जैसे छोटे राजनीतिक प्रयोग भी सोशल मीडिया के जरिए अपनी दृश्यता बढ़ा रहे हैं.. ऐसे माहौल में भाजपा का संगठन मजबूत होने के बावजूद यदि उसके पास तुरंत प्रतिक्रिया देने वाला लोकप्रिय चेहरा नहीं है तो राजनीतिक नैरेटिव किसी और के हाथ में जा सकता है.. मीडिया मैनेजमेंट और सोशल मीडिया मैनेजमेंट जरूरी हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल मैनेजमेंट से जनता का भाव बदला जा सकता है?.. शिवराज के बाद खाली हुई जगह का सवाल खड़े हो चुके.. नया चेहरा मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का सामने लाया जा चुका है पर उन्हें अभी तक मंत्रिमंडल पुनर्गठन का रास्ता साफ कर फ्री हैंड नहीं दिया जाना पार्टी की रणनीति पर सस्पेंस बढ़ा देता है.. मध्य प्रदेश की राजनीति में शिवराज सिंह चौहान लंबे समय तक भाजपा का ऐसा चेहरा रहे जिनकी पहचान पार्टी की सीमा से आगे तक थी.. नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल जैसे नेताओं ने भी अलग-अलग स्तर पर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई.. केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया एक ग्लैमरस चेहरा लेकिन वे ग्वालियर अंचल से लेकर दिल्ली तक सीमित होकर रह गए हैं..अब सवाल है कि अगले दशक के लिए इस पीढ़ी के विकल्प कौन हैं?.. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव निश्चित रूप से राज्य की राजनीति का प्रमुख चेहरा हैं.. लेकिन भाजपा को मुख्यमंत्री के साथ-साथ ऐसे कई चेहरे चाहिए जो अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में पार्टी का विस्तार कर सकें.. यही कारण है कि मंत्रिमंडल पुनर्गठन की संभावनाओं से लेकर संगठन के नए पदाधिकारियों की भूमिका तक हर बदलाव को इसी नजरिए से देखा जाएगा.. (स्टूडेंट पॉलिटिक्स बंद दरवाजा या नई नर्सरी?) मध्य प्रदेश में छात्र संघ चुनाव लंबे समय से बंद हैं.. लेकिन बदलती राजनीति में क्या इन्हें नए नेतृत्व की प्रयोगशाला के रूप में फिर से देखने का समय आ गया है?.. यदि भाजपा को युवा नेतृत्व चाहिए तो कॉलेज कैंपस से बेहतर प्रतिभा पहचानने की शुरुआत कहां से होगी?.. छात्र राजनीति युवा नेताओं को तीन चीजें सिखाती है—संघर्ष, संवाद और चुनाव.. वे हारते हैं, जीतते हैं, विरोध झेलते हैं और जनता के बीच अपनी पहचान बनाते हैं.. सहकारिता और नगरीय निकाय चुनाव भी यही अवसर दे सकते हैं.. लेकिन जोखिम बड़ा है.. छात्र राजनीति में स्वतंत्र आवाजें होंगी.. असहमति होगी.. गुटबाजी भी होगी.. ऐसे में क्या भाजपा संगठन नियंत्रित राजनीति से बाहर निकलकर युवा नेतृत्व को खुला मैदान देगा?.. समाधान—पद नहीं, राजनीतिक परीक्षा भाजपा को यदि 2028 और उसके बाद की राजनीति के लिए नए चेहरे तैयार करने हैं तो एक स्पष्ट लीडरशिप टैलेंट पूल बनाना होगा.. हर संभाग से युवा नेताओं की पहचान हो.. उन्हें केवल पद न मिले, बल्कि विधानसभा क्षेत्र से बाहर जाकर काम करने की जिम्मेदारी मिले.. छात्र, सहकारिता और निकाय राजनीति में उनकी क्षमता परखी जाए.. सोशल मीडिया के साथ-साथ जमीन पर जनसंपर्क की परीक्षा हो.. चुनाव जीतने की क्षमता के साथ संकट में खड़े रहने की क्षमता देखी जाए.. और सबसे महत्वपूर्ण—हारने वाले युवा को समाप्त न किया जाए.. जो नेता एक चुनाव हारकर भी जनता के बीच बना रहता है, वह अगले चुनाव का बड़ा चेहरा बन सकता है.. 2028 की चुनौती अभी से शुरू भाजपा के लिए मध्य प्रदेश में चिंता यह नहीं होनी चाहिए कि उसके पास नेता नहीं हैं.. चिंता यह होनी चाहिए कि अगले दस साल के लिए कितने नेता तैयार हो रहे हैं.. 2028 सिर्फ एक चुनाव नहीं होगा.. यह मोहन यादव सरकार, हेमंत खंडेलवाल संगठन और भाजपा की नई पीढ़ी—तीनों की परीक्षा होगी.. सवाल यह भी है कि क्या भाजपा अपने पुराने स्थापित चेहरों की छाया में नए चेहरों को जगह दे पाएगी?.. क्या संगठनात्मक पदों से आगे बढ़कर चुनावी और जनसंघर्ष की जिम्मेदारी युवाओं को मिलेगी?.. क्या छात्र राजनीति का दरवाजा फिर खुलेगा?.. क्या सहकारिता और नगरीय निकाय चुनावों को नेतृत्व चयन की प्रयोगशाला बनाया जाएगा?.. क्योंकि आने वाली राजनीति में चेहरा ही संदेश होगा और संघर्ष ही उसकी विश्वसनीयता.. भाजपा के सामने विकल्प साफ है.. या तो वह सत्ता की सुविधा के बीच नए चेहरों के उभरने का इंतजार करे.. या फिर अभी से उन्हें मैदान में उतारे, उन्हें जोखिम लेने दे और हार-जीत के अनुभव से नेतृत्व तैयार करे.. शायद यही समय की सबसे बड़ी मांग है,2028 के लिए उम्मीदवार नहीं, 2030 के दशक के नेता तैयार किए जाएं.. बॉक्स🙏✅ ✅(मध्य प्रदेश में नया नेतृत्व कहां से आएगा? क्या स्टूडेंट पॉलिटिक्स है परफेक्ट टाइम?) 🙏🙏 मध्य प्रदेश भाजपा के सामने इस समय सबसे बड़ा सवाल केवल अगला चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि अगली राजनीतिक पीढ़ी तैयार करने का है.. दतिया उपचुनाव के बाद उठे सवाल, कांग्रेस की आक्रामकता, राहुल गांधी की युवा संवाद आधारित राजनीति और बदलते राजनीतिक व्यवहार के बीच भाजपा के लिए यह सोचने का समय है कि नए, जुझारू और संघर्षशील चेहरे आखिर आएंगे कहां से?.. यहीं से स्टूडेंट पॉलिटिक्स का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है.. यदि भाजपा को जमीन से निकला हुआ नया नेतृत्व चाहिए तो उसे केवल संगठन में पद देने से तैयार नहीं किया जा सकता.. उसे संघर्ष की जमीन देनी होगी.. उसे सवाल पूछने, विरोध करने, चुनाव लड़ने, हारने और फिर खड़े होने का अवसर देना होगा.. मध्य प्रदेश में छात्र संघ चुनाव, सहकारिता चुनाव और नगरीय निकाय चुनाव इस प्रयोग के लिए तीन महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म बन सकते हैं.. कॉलेज कैंपस बन सकता है नेतृत्व की प्रयोगशाला छात्र राजनीति सीधे तौर पर आज सत्ता का केंद्र नहीं है, लेकिन राजनीतिक एजेंडा प्रभावित करने की उसकी क्षमता खत्म नहीं हुई है.. कैंपस में बेरोजगारी, फीस, परीक्षा, पेपर लीक, शिक्षा की गुणवत्ता, छात्रवृत्ति और युवाओं के अवसर जैसे सवाल उठते हैं.. यही सवाल आगे चलकर राष्ट्रीय और राज्य की राजनीति का हिस्सा बनते हैं.. राहुल गांधी का कोटा से देहरादून, प्रयागराज और पुणे तक छात्रों से संवाद इसी बदलते राजनीतिक समीकरण की ओर इशारा करता है.. दूसरी ओर अभिजीत जैसे नए राजनीतिक प्रयोगों की सक्रियता बताती है कि युवाओं की नाराजगी अब पारंपरिक राजनीतिक दलों के बाहर भी अभिव्यक्ति तलाश रही है.. यानी युवा सीधे राजनीति का केंद्र बिंदु भले नहीं बने हों, लेकिन राजनेताओं का एजेंडा बदलने वाली तीसरी ताकत जरूर बन रहे हैं.. मोहन यादव-हेमंत खंडेलवाल के सामने अवसर भी, चुनौती भी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के लिए यह परिस्थिति चुनौती से ज्यादा अवसर भी बन सकती है.. संगठन के पास यदि नए नेतृत्व की तलाश है तो कॉलेज कैंपस से बेहतर राजनीतिक प्रतिभाओं की पहचान का कोई शुरुआती मंच हो सकता है?..लेकिन सवाल यह है कि क्या भाजपा इसके लिए जोखिम उठाएगी?.. क्या वह युवाओं को सिर्फ सोशल मीडिया, आईटी सेल, कार्यक्रमों और संगठनात्मक जिम्मेदारियों तक सीमित रखेगी या उन्हें वास्तविक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मैदान भी देगी?.. छात्र संघ चुनाव शुरू होते हैं तो वहां सिर्फ पदाधिकारी नहीं चुने जाएंगे.. वहां वक्ता, संगठनकर्ता, रणनीतिकार और जनसंपर्क करने वाले चेहरे सामने आएंगे.. यही वे गुण हैं जो भविष्य में पार्षद, महापौर, विधायक और सांसद बनने वाले नेताओं की पहली पहचान बन सकते हैं.. (विष्णुदत्त शर्मा मॉडल की याद क्यों?) मध्य प्रदेश भाजपा में विष्णुदत्त शर्मा के प्रदेश अध्यक्ष रहते विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि और छात्र राजनीति से निकले कार्यकर्ताओं की राजनीतिक भूमिका को व्यापक पहचान मिली थी.. उस दौर की एक बड़ी विशेषता यह थी कि संगठन के भीतर कॉलेज और कैंपस से निकले युवाओं को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाई देता था.. अब सवाल यह है कि मोहन-हेमंत की भाजपा क्या उस रास्ते को फिर से खोलने का साहस करेगी? यह रास्ता आसान नहीं है.. छात्र राजनीति का अर्थ केवल संगठन का विस्तार नहीं बल्कि स्वतंत्र विचार, बहस, विरोध और प्रतिस्पर्धा भी है.. युवा नेता सवाल भी पूछेंगे और कभी-कभी पार्टी की लाइन से अलग अपनी आवाज भी रखेंगे.. लेकिन शायद यही लोकतांत्रिक प्रशिक्षण भविष्य के मजबूत नेताओं को तैयार करता है.. वो कहते है न..शेर पद से नहीं, संघर्ष से चमकते हैं..भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नए चेहरों को पद देकर नेता बनाने के बजाय उन्हें संघर्ष से नेता बनने दिया जाए.. कॉलेज कैंपस में चुनाव हो.. सहकारिता में युवा चेहरे उतारे जाएं.. नगरीय निकाय चुनावों में नए उम्मीदवारों को मौका मिले.. स्थानीय मुद्दों पर उन्हें जिम्मेदारी दी जाए.. हारने पर उन्हें खत्म न किया जाए बल्कि दूसरी भूमिका में आगे बढ़ाया जाए.. यही प्रक्रिया पार्टी को ऐसे नेता दे सकती है जिनकी राजनीतिक पूंजी केवल पद नहीं बल्कि संघर्ष और स्वीकार्यता हो.. राहुल-अभिजीत से आगे मोदी की प्राथमिकता युवाओं को लेकर यह बदलाव केवल राहुल गांधी की राजनीति तक सीमित नहीं है.. अभिजीत जैसे नए राजनीतिक प्रयोग भी युवा ऊर्जा को राजनीतिक शक्ति में बदलने की कोशिश कर रहे हैं.. और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लगातार युवा शक्ति, स्टार्टअप, कौशल, खेल, टेक्नोलॉजी और नई पीढ़ी के राजनीतिक-सामाजिक जुड़ाव पर जोर देते रहे हैं.. इसका अर्थ साफ है—राजनीति में युवा अब सिर्फ चुनावी वोट बैंक नहीं है.. वह नैरेटिव बनाने वाला वर्ग भी है.. जो पार्टी युवाओं की भाषा समझेगी, वही भविष्य की राजनीति की भाषा तय करने की स्थिति में होगी.. (जोखिम बड़ा है, लेकिन अवसर उससे बड़ा) 2003 की उमा भारती सरकार के बाद बीच में कमलनाथ की सरकार आई और ज्यादातर समय शिवराज की सरकार रही लेकिन स्टूडेंट पॉलिटिक्स का रास्ता नहीं खुला.. ऐसे में मोहन यादव और हेमंत खंडेलवाल के सामने छात्र राजनीति को लेकर दो रास्ते हैं.. पहला—इसे नियंत्रित संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित रखना.. दूसरा—इसे नए नेतृत्व की खोज का खुला प्रयोग बनाना.. पहले रास्ते में जोखिम कम है, लेकिन नए नेतृत्व की संभावना भी सीमित है.. दूसरे रास्ते में टकराव, असहमति और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का खतरा है, लेकिन वहीं से संघर्षशील नेतृत्व निकल सकता है.. समय शायद दूसरे विकल्प की ओर संकेत कर रहा है.. क्योंकि आने वाली राजनीति में केवल मैनेजमेंट से चुनाव नहीं जीते जाएंगे.. मैनेजमेंट के साथ मैदान में खड़ा होने वाला चेहरा भी चाहिए.. मध्य प्रदेश भाजपा के सामने इसलिए सवाल छात्र संघ चुनाव कराने का भर नहीं है.. असली सवाल यह है कि क्या वह कॉलेज कैंपस को फिर से राजनीतिक नेतृत्व की नर्सरी बनाने का साहस करेगी?.. विद्यार्थी इन दोनों जंतर मंतर से लेकर दिल्ली से बाहर राज्यों में भी धरना आंदोलन विरोध में अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहे हैं.. तो क्या मोहन-हेमंत के नेतृत्व में यह प्रयोग भाजपा को आने वाले वर्षों के लिए दर्जनों नए चेहरे दे सकता है.. ऐसे चेहरे जो संगठन की सीढ़ी से नहीं, संघर्ष की सीढ़ी चढ़कर आएं.. और शायद यही आज की सबसे बड़ी सियासी जरूरत भी है,नए चेहरे नहीं, नए संघर्षशील चेहरे.. बॉक्स✅✅ (डबल इंजन में नया इंजन कौन? मध्य प्रदेश से जुझारू नेतृत्व की तलाश क्यों जरूरी..सियासत, संभावनाएं और समय की मांग) ✅🙏 डबल इंजन की सरकार में मध्य प्रदेश भाजपा के सामने अब चुनौती सिर्फ सत्ता चलाने की नहीं, बल्कि अगली राजनीतिक पीढ़ी तैयार करने की भी है.. दतिया उपचुनाव के नतीजे ने संगठन के सामने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या मजबूत चुनावी प्रबंधन और सत्ता की उपलब्धियों के भरोसे हर चुनाव जीता जा सकता है?.. या फिर बदलते राजनीतिक माहौल में पार्टी को ऐसे नए, जुझारू और संघर्षशील चेहरों की जरूरत है जो मैदान में उतरकर कांग्रेस की आक्रामक राजनीति का जवाब दे सकें?.. राहुल गांधी की स्ट्रीट पॉलिटिक्स, छात्रों और युवा महिलाओं के बीच बढ़ता संवाद, लगातार संपर्क और ‘जेन जी’ को केंद्र में रखकर तैयार किया जा रहा राजनीतिक नैरेटिव भाजपा के लिए आने वाले समय की चुनौती का संकेत है.. दूसरी तरफ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के अभिजीत की रणनीति में बदलाव और जंतर-मंतर के बाद उसकी सक्रियता बताती है कि राजनीति का मैदान अब केवल पारंपरिक दलों तक सीमित नहीं रह गया है..तो सवाल दर सवाल है.. क्या मध्य प्रदेश भाजपा भी अब अपनी अगली पीढ़ी के नेतृत्व को मैदान में उतारने की तैयारी करेगी?..दतिया के बाद सवाल सिर्फ हार का नहीं दतिया उपचुनाव को केवल एक सीट की हार मानकर आगे बढ़ जाना आसान है.. लेकिन राजनीति में उपचुनाव कई बार संगठन की कमजोरी, स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता और कार्यकर्ताओं के मनोबल का एक्स-रे भी करते हैं.. यदि पार्टी लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद किसी क्षेत्र में चुनौती का सामना करती है तो उसे आंकड़ों के साथ-साथ यह भी देखना होता है कि जमीन पर उसका चेहरा कौन है और मतदाता उसे किस रूप में देख रहा है?.. यही वह बिंदु है जहां दतिया का अनुभव मध्य प्रदेश भाजपा के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है.. क्या संगठन के पास हर विधानसभा क्षेत्र में ऐसा स्थानीय चेहरा है जो चुनाव आने से पहले ही जनता के बीच संघर्ष करता दिखाई देता हो?.. क्या युवा नेतृत्व सिर्फ संगठनात्मक पदों तक सीमित है या उसे सड़क, आंदोलन और स्थानीय मुद्दों पर लड़ने की स्वतंत्रता भी दी जा रही है?.. (प्रशांत की नसीहत और बदलती चुनावी राजनीति) भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की परंपरागत सीट पर बिहार के उपचुनाव के बाद प्रशांत किशोर की यह बात कि किसी भी व्यक्ति को खड़ा कर देना अपने आप में चुनाव जीतने की गारंटी नहीं हो सकता, भारतीय राजनीति में बदलती चुनावी समझ की ओर इशारा करती है.. उम्मीदवार का नाम, संगठन की मशीनरी और सत्ता की ताकत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अब स्थानीय स्वीकार्यता, व्यक्तिगत विश्वसनीयता, निरंतर जनसंपर्क और संघर्ष की अपनी राजनीतिक पूंजी भी मायने रखती है.. भाजपा के लिए यह सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि पार्टी लंबे समय से मजबूत संगठन और चुनावी प्रबंधन के लिए पहचानी जाती रही है.. लेकिन क्या मैनेजमेंट के साथ मूवमेंट भी जरूरी हो गया है?.. क्या बूथ मैनेजमेंट से आगे बढ़कर बूथ से निकला हुआ कोई संघर्षशील चेहरा भी चाहिए?.. क्या चुनाव से छह महीने पहले सक्रिय होने वाला नेता पर्याप्त है या पांच साल जनता के बीच रहने वाला कार्यकर्ता ज्यादा प्रभावी हो सकता है?.. राहुल की स्ट्रीट पॉलिटिक्स का जवाब क्या होगा? राहुल गांधी की हालिया राजनीति में एक खास बदलाव दिखाई देता है.. वे संसद और प्रेस कॉन्फ्रेंस से बाहर निकलकर छात्रों, युवाओं और महिलाओं के बीच सीधे संवाद का मॉडल बना रहे हैं.. कोटा से देहरादून और प्रयागराज होते हुए पुणे तक छात्र संवाद की श्रृंखला इसी रणनीति का संकेत देती है.. यहां राहुल सिर्फ भाषण नहीं देते.. सवाल लेते हैं, व्यक्तिगत अनुभव सुनते हैं और फिर उन्हें बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा, स्वतंत्रता, और सामाजिक नियंत्रण जैसे बड़े राजनीतिक मुद्दों से जोड़ते हैं.. यदि यह मॉडल आगे 800 शहरों और कस्बों तक पहुंचता है तो कांग्रेस के पास एक ऐसा नेटवर्क तैयार हो सकता है जिसमें युवा केवल मतदाता नहीं बल्कि नैरेटिव के वाहक बनें.. भाजपा के सामने चुनौती यही है.. क्या उसका युवा नेतृत्व भी कॉलेज, विश्वविद्यालय, रोजगार, परीक्षा, स्टार्टअप, खेल, सहकारिता और स्थानीय निकाय के मुद्दों पर उतनी ही सक्रियता से दिखाई देगा?..जेन जी और जेन अल्फा पर भाजपा की नजर भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में नई टीम के जरिए जेन जी से संवाद और संपर्क को महत्व दिया जाना इस बदलाव की गंभीरता बताता है.. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के साथ विनोद तावड़े और स्मृति ईरानी जैसे अनुभवी नेताओं को युवा पीढ़ी से संवाद की जिम्मेदारी से जोड़ना केवल संगठनात्मक नियुक्ति नहीं, बल्कि बदलते मतदाता वर्ग को समझने की आवश्यकता का संकेत माना जा सकता है.. क्योंकि आने वाला मतदाता पहले जैसा नहीं है.. जेन जी का बड़ा हिस्सा राजनीति को टीवी भाषण से नहीं, सोशल मीडिया, छोटे वीडियो, प्रत्यक्ष संवाद और अपने अनुभवों के आधार पर देखता है.. जेन अल्फा अभी मतदाता नहीं है, लेकिन वह परिवारों की राजनीतिक सोच को प्रभावित करने वाली पीढ़ी जरूर बन रही है.. इसलिए सवाल यह नहीं कि भाजपा युवाओं तक पहुंचेगी या नहीं.. सवाल यह है कि कौन पहले पहुंचेगा और किस भाषा में पहुंचेगा? मध्य प्रदेश में नया नेतृत्व कहां से आएगा? यहीं भाजपा के सामने सबसे बड़ा संगठनात्मक प्रयोग है.. यदि नया नेतृत्व चाहिए तो उसे केवल पद देकर तैयार नहीं किया जा सकता.. उसे संघर्ष की जमीन देनी होगी.. मध्य प्रदेश में इसके लिए तीन बड़े अवसर सामने हैं—छात्र संघ चुनाव, सहकारिता चुनाव और नगरीय निकाय चुनाव.. छात्र राजनीति भाजपा के लिए नई पीढ़ी तैयार करने की प्रयोगशाला बन सकती है.. विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में सक्रिय युवाओं को लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का अनुभव मिलेगा, मुद्दों पर बोलने का अवसर मिलेगा और संगठन को भविष्य के सार्वजनिक चेहरे मिल सकते हैं.. लेकिन यहां जोखिम भी है.. क्या भाजपा छात्र राजनीति में फिर से खुला राजनीतिक स्पेस देने का जोखिम उठाएगी?.. क्या वह अपने युवा कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ने, हारने और संघर्ष करने की स्वतंत्रता देगी?.. या फिर संगठनात्मक अनुशासन और नियंत्रित राजनीति के बीच ही युवा नेतृत्व को सीमित रखेगी?.. सहकारिता और निकाय चुनाव सबसे बड़ा टेस्ट सहकारिता चुनाव मध्य प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली नेटवर्क तैयार करने का माध्यम रहे हैं.. नगरीय निकाय चुनाव स्थानीय नेतृत्व की लोकप्रियता की वास्तविक परीक्षा होते हैं.. यदि भाजपा सचमुच नया नेतृत्व तैयार करना चाहती है तो इन दोनों चुनावों में युवाओं को बड़ी संख्या में मौका देना एक रणनीतिक प्रयोग हो सकता है.. नगर पालिका अध्यक्ष, पार्षद, जिला पंचायत, जनपद, सहकारी संस्थाओं और छात्र संगठनों से निकलकर भविष्य के विधायक और सांसद तैयार हो सकते हैं.. लेकिन इसके लिए एक राजनीतिक संस्कृति बदलनी होगी.. पद पहले और संघर्ष बाद में नहीं.. संघर्ष पहले और पद बाद में। युवा नेता को केवल मंच पर माला पहनाने के बजाय सड़क पर जनता के साथ खड़ा करना होगा.. परिवारवाद की चुनौती और ‘अपनों’ की राजनीति भाजपा परिवारवाद को विपक्ष के खिलाफ लंबे समय से राजनीतिक हथियार बनाती रही है.. लेकिन संगठन के भीतर भी टिकट और पद के लिए व्यक्तिगत प्रभाव, राजनीतिक परिवार और गुटीय समीकरणों की चर्चा से पार्टी पूरी तरह मुक्त नहीं है.. नई संगठनात्मक टीम में नए चेहरे लाना पहला कदम है.. लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब इन्हीं चेहरों को चुनावी मैदान में उतारने का समय आएगा.. क्या पार्टी टिकट वितरण में पुराने प्रभावशाली चेहरों और नए संघर्षशील कार्यकर्ताओं के बीच संतुलन बना पाएगी?.. क्या संगठनात्मक पद पर बैठे नेता चुनावी टिकट की दौड़ में आने के बजाय संगठन को मजबूत करने की भूमिका स्वीकार करेंगे?.. या फिर पद, प्रतिष्ठा और पावर की राजनीति युवा नेतृत्व को भी पुराने ढर्रे पर ले जाएगी?.. मंत्रिमंडल में पीढ़ी परिवर्तन का इंतजार मध्य प्रदेश में भाजपा के सामने एक और सवाल मंत्रिमंडल की अगली पीढ़ी का है.. संगठन में नए चेहरे दिखाई देने लगे हैं, लेकिन सरकार में भी पीढ़ी परिवर्तन का संकेत कब और कितना दिखाई देगा, यह भविष्य की राजनीति को प्रभावित कर सकता है.. क्योंकि संगठन और सरकार के चेहरे अलग-अलग संदेश नहीं दे सकते.. यदि पार्टी युवा नेतृत्व को आगे लाने की बात करती है तो उसे सत्ता की संरचना में भी उसका प्रतिबिंब दिखाना होगा.. यही वह जगह है जहां फील गुड के प्लस-माइनस का ईमानदार मूल्यांकन जरूरी है.. क्या सरकार की लोकप्रियता जमीन पर उतनी ही है जितनी संगठनात्मक रिपोर्टों में दिखाई देती है?.. क्या जनता की नाराजगी स्थानीय स्तर पर दब गई है या चुनाव के समय अचानक सामने आ सकती है?.. क्या विधायक और मंत्री जनता के बीच उसी सहजता से पहुंच रहे हैं जिस तरह विपक्षी नेता पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं?.. इन सवालों के जवाब अभी से खोजने होंगे.. भाजपा के पास विकल्प क्या है? पहला विकल्प—मौजूदा नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचे पर भरोसा रखते हुए सुधार करना.. दूसरा—हर संभाग और जिले में 35 से 50 वर्ष की उम्र के ऐसे चेहरों की पहचान करना जिनकी स्थानीय स्वीकार्यता और संघर्ष की पृष्ठभूमि हो.. तीसरा—छात्र, सहकारिता और नगरीय निकाय चुनावों को भविष्य के नेतृत्व की चयन प्रक्रिया की तरह देखना.. चौथा—युवा नेताओं को केवल सोशल मीडिया या संगठनात्मक जिम्मेदारी न देकर वास्तविक जनसंघर्ष की जिम्मेदारी देना.. पांचवां—टिकट वितरण में ‘कौन कितना प्रभावशाली है’ के साथ यह भी देखना कि कौन कितना स्वीकार्य है.. और छठा—पुरानी और नई पीढ़ी के बीच टकराव को संघर्ष न बनने देकर संक्रमण की प्रक्रिया बनाना.. समय की मांग—मैनेजमेंट से आगे मूवमेंट भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन है.. लेकिन बदलती राजनीति में संगठन की ताकत तभी राजनीतिक पूंजी बनती है जब उसके पास ऐसे चेहरे हों जो जनता के बीच लगातार दिखाई दें.. राहुल गांधी की स्ट्रीट पॉलिटिक्स, युवा संवाद, जेन जी पर बढ़ता फोकस और छोटे राजनीतिक समूहों की बदलती रणनीति भाजपा को एक संदेश दे रही है.. अब सिर्फ चुनाव लड़ने वाले चेहरे नहीं, चुनाव से पहले लड़ने वाले चेहरे चाहिए। मध्य प्रदेश में दतिया के बाद उठे सवाल को यदि भाजपा गंभीरता से लेती है तो छात्र राजनीति से लेकर सहकारिता और नगरीय निकाय चुनाव तक नए प्रयोग करने पड़ सकते हैं.. क्योंकि अगली लड़ाई केवल सत्ता की नहीं होगी.. यह पीढ़ी, नैरेटिव और राजनीतिक स्वीकार्यता की लड़ाई भी होगी.. भाजपा के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या वह नए नेतृत्व को सिर्फ पद देगी, या उसे संघर्ष करने का मैदान भी देगी?.. और शायद इसी सवाल का जवाब तय करेगा कि मध्य प्रदेश भाजपा आने वाले वर्षों में सिर्फ सत्ता की पार्टी बनी रहती है या फिर नई पीढ़ी के संघर्षशील नेतृत्व के साथ एक बार फिर राजनीतिक एजेंडा सेट करने वाली ताकत बनती है..
*नया जुझारू नेतृत्व कैसे सामने आ सकता.. स्टूडेंट पॉलिटिक्स. नगरीय निकाय और सहकारिता चुनाव..? (सवाल दर सवाल.).(राकेश अग्निहोत्री)*