भाजपा में विलुप्त होते ब्राह्मण नेता.. सवाल भविष्य का चेहरा कौन (सवाल दर सवाल) (राकेशअग्निहोत्री)

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भाजपा में विलुप्त होते ब्राह्मण नेता.. सवाल भविष्य का चेहरा कौन (सवाल दर सवाल) (राकेशअग्निहोत्री)

✅✅(बदलती बीजेपी में ब्राह्मण नेता हैरान-परेशान क्यों..) मध्य प्रदेश भाजपा की बदलती राजनीति में खासतौर से पीढ़ी परिवर्तन के दौर में जब चुनाव जीतने का क्राइटेरिया बदलते जा रहा तब एक सवाल अब धीरे-धीरे बड़ा होता जा रहा है... कल के बड़े ब्राह्मण चेहरे आज कहां हैं... और कल का चेहरा आखिर कौन होगा?... जिनकी उपयोगिता हो स्वीकार्यता हो और जो ब्राह्मण वर्ग के मतदाताओं का भरोसा अपने क्षेत्र और सीट से आगे प्रदेश में अन्य विधानसभा क्षेत्र में जीत सके.. एक दौर में कैलाश जोशी जैसे नेता प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समाज के सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि माने जाते थे... फिर गोपाल भार्गव... नरोत्तम मिश्रा... अनूप मिश्रा जैसे चेहरों ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाई... जिनका चुनाव में उनके विधानसभा क्षेत्र से बाहर भी पार्टी ने खूब प्रयोग किया..लेकिन पीढ़ी परिवर्तन के दौर में इनमें से कई चेहरे या तो सक्रिय सत्ता राजनीति से बाहर हो गए... कुछ अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित रह गए... और कुछ की राजनीतिक भूमिका पहले की तुलना में काफी सिमट गई... आज स्थिति यह है कि विधानसभा और लोकसभा में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व मौजूद है... लेकिन क्या ये चेहरे अपने क्षेत्र से बाहर भी व्यापक ब्राह्मण राजनीतिक प्रभाव पैदा कर पा रहे हैं?... क्या इनके पास अगले चुनाव के लिए ऐसा संगठनात्मक नेटवर्क और स्वीकार्यता है जो प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में ब्राह्मण मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में लामबंद कर सके?... यही सबसे बड़ा सवाल है... क्योंकि आगामी चुनाव केवल सीटों का गणित नहीं होगा... यह नए सामाजिक समीकरणों, ओबीसी-आदिवासी-दलित प्रतिनिधित्व और पुराने समर्थक वर्गों के बीच संतुलन की भी परीक्षा होगी... ऐसे में जब पुरानी पीढ़ी के कई अनुभवी चेहरे या तो विलुप्त हो गए हैं... या राजनीतिक रूप से पीछे धकेल दिए गए हैं... दतिया उपचुनाव में ब्राह्मण नेतृत्व ब्राह्मण मतदाता और ब्राह्मण उम्मीदवार के बावजूद भाजपा की हार के बाद पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती है भविष्य का वह ब्राह्मण चेहरा कौन होगा, जो परंपरा को नई राजनीति से जोड़े... संगठन में प्रभाव रखे... और अपनी विधानसभा से बाहर भी समाज में स्वीकार्यता पैदा कर सके?... क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि आज ब्राह्मण नेता कितने हैं... सवाल यह है कि 2028 के बाद नेतृत्व करने वाला चेहरा कौन है?... बॉक्स✅✅ (बदलती बीजेपी में ब्राह्मण नेता हैरान-परेशान क्यों..) स्लग (सत्ता में गिने-चुने चेहरे... संगठन में सीमित हिस्सेदारी... और भविष्य को लेकर बढ़ती बेचैनी) ✅✅ क्या मध्य प्रदेश भाजपा की राजनीति में ब्राह्मण नेतृत्व का वजन पहले जैसा नहीं रहा? क्या पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग में ब्राह्मण की उपेक्षा हो रही है.. मध्य प्रदेश भाजपा की बदलती राजनीति में ये कुछ सवाल धीरे-धीरे बड़ा होता जा रहा है... कभी पार्टी का स्वाभाविक और मजबूत वोट बैंक माने जाने वाला ब्राह्मण समाज आज सत्ता और संगठन के गलियारों में अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर असहज क्यों दिखाई देता है?... सवाल सिर्फ मंत्री पद का नहीं है... सवाल टिकट का भी नहीं है... सवाल उससे कहीं बड़ा है... आखिर पार्टी के भीतर ब्राह्मण नेतृत्व की उपयोगिता, उसकी भूमिका और उसकी भविष्य की जगह को लेकर इतना असमंजस क्यों पैदा हुआ? पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम हों... सीताशरण शर्मा हों... पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा हों... बुंदेलखंड के वरिष्ठ नेता गोपाल भार्गव हों... ग्वालियर-चंबल के कभी प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरे अनूप मिश्रा हों... इंदौर के लगातार मजबूत चुनावी प्रदर्शन के बावजूद रमेश मेंदोला हों...उमाकांत शर्मा हों, युवा चेहरों में अभिलाष पांडे हों, संजय पाठक हों या सांसद से विधायक बनीं रीति पाठक जो सत्ता और संगठन में जगह नहीं बना पाईं... कभी राज्यसभा के दावेदार रहे विनोद गोटिया जो मूल रुप से संगठन के कार्यकर्ता हैं...एडजेस्टमेंट के नाम पर तीर्थ विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष सीमित होकर रह गए...निष्ठावान कार्यकर्ता हैं...मीडिया से जुड़े रहे डॉ हितेश वाजपेई ही क्यों ना हो या संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहे और दूसरे ब्राह्मण नेता... अलग-अलग नेताओं की कहानी अलग है, एक दूसरे की हालत देखकर अधिकांश हैरान परेशान से नजर आते हैं.. सत्ता हो या संगठन भोपाल हो या दिल्ली जो जहां वह वहां संतुष्ट नहीं तो आखिर क्यों..लेकिन बेचैनी का सवाल लगभग एक जैसा है... क्या बदलती भाजपा में ब्राह्मण नेतृत्व की जगह अब पहले जैसी नहीं रही? यहां एक बात साफ समझनी होगी... इसे सीधे-सीधे "ब्राह्मणों की उपेक्षा" का निष्कर्ष मान लेना जल्दबाजी माना जाएगा लेकिन इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता.. भाजपा की राजनीति पिछले एक दशक में जिस तरह बदली है, उसमें सामाजिक प्रतिनिधित्व का पूरा गणित बदल चुका है... ओबीसी... आदिवासी... दलित... महिला... अब जेन जी के बाद युवा और क्षेत्रीय संतुलन... टिकट से लेकर मंत्रिमंडल और संगठन तक हर निर्णय में कई सामाजिक समीकरण एक साथ देखे जाते हैं... यानी भाजपा का पुराना फॉर्मूला बदल चुका है... पहले जहां कुछ प्रभावशाली सवर्ण चेहरों के आसपास राजनीतिक पहचान मजबूत होती थी, वहीं अब पार्टी का लक्ष्य व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व का ऐसा ढांचा बनाना है जिसमें हर वर्ग को अपना राजनीतिक चेहरा दिखाई दे... यहीं से ब्राह्मण राजनीति की पहेली शुरू होती है... कभी जो चेहरा "स्वाभाविक नेतृत्व" माना जाता था... आज वही चेहरा "सामाजिक संतुलन" की गणित में अपनी जगह खोजता दिखाई देता है... डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में ओबीसी प्रतिनिधित्व का सबसे बड़ा चेहरा स्वयं मुख्यमंत्री के रूप में सामने है... आदिवासी और दलित प्रतिनिधित्व को लेकर भी भाजपा लगातार राजनीतिक विस्तार की कोशिश कर रही है... महिलाओं और नए सामाजिक समूहों को भी संगठन और सत्ता में जगह देने का दबाव है... ऐसे में ब्राह्मण नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने पुराने प्रभाव को नई सामाजिक राजनीति के साथ कैसे जोड़ता है... राजेंद्र शुक्ला उपमुख्यमंत्री और राकेश शुक्ला मंत्री जरूर हैं.. लेकिन दूसरी ओर नरोत्तम मिश्रा का सक्रिय सत्ता राजनीति से बाहर होना केवल एक नेता के टिकट या पद की कहानी नहीं रह जाता... और भी ब्राह्मण नेता भाजपा में उपेक्षा का शिकार नजर आ रहे हैं.. इसलिए एक नई बहस एक पूरी पीढ़ी के सामने खड़े सवाल का प्रतीक बन जाता है... जिस नेता के पास लंबा प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव रहा हो... वह अचानक सत्ता की सक्रिय भूमिका से बाहर दिखाई दे तो समर्थकों के बीच सवाल उठना स्वाभाविक है... दतिया उपचुनाव ने इस बहस को और तेज किया... नरोत्तम मिश्रा जैसे स्थापित चेहरे की राजनीतिक विरासत वाले क्षेत्र में नए चेहरे आशुतोष तिवारी को उतारना पार्टी की पीढ़ी परिवर्तन की नीति के रूप में देखा गया... क्या दतिया उपचुनाव में पार्टी की नीति और नियत के चलते नरोत्तम की राजनीतिक हत्या तो साथ में संघ से निकले आशुतोष को चुनाव लड़ा कर क्या जाने अनजाने उनकी भी सियासी भ्रूण हत्या हो गई या जाने अनजाने कर दी गई.. लेकिन यहीं दूसरा सवाल पैदा हुआ... क्या नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में पुरानी पीढ़ी का राजनीतिक पुनर्वास कमजोर पड़ रहा है? और अगर ऐसा है तो यह केवल ब्राह्मण नेतृत्व की समस्या नहीं... यह भाजपा की पूरी पीढ़ीगत राजनीति की चुनौती है... अनूप मिश्रा की कहानी भी इसी बहस को अलग कोण देती है... अटल बिहारी वाजपेयी जैसे विराट राजनीतिक व्यक्तित्व से पारिवारिक संबंध... लंबा राजनीतिक अनुभव... ग्वालियर-चंबल की पहचान... इसके बावजूद सक्रिय सत्ता-संगठन में उनकी भूमिका का सीमित होना बताता है कि नई भाजपा में सिर्फ राजनीतिक वंश, अनुभव या सामाजिक पहचान पर्याप्त नहीं है... अब संगठनात्मक उपयोगिता... चुनावी क्षमता... क्षेत्रीय समीकरण... नेतृत्व के साथ तालमेल और भविष्य की राजनीतिक जरूरत... सब कुछ साथ तौला जाता है... गोपाल भार्गव जैसे वरिष्ठ नेता इस बदलाव का दूसरा चेहरा हैं... लंबे राजनीतिक अनुभव और विधानसभा की राजनीति में मजबूत पहचान के बावजूद नई पीढ़ी के उभार के दौर में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका का स्वरूप बदलना स्वाभाविक है... सवाल यह है कि भाजपा अनुभवी चेहरों के अनुभव को किस तरह नई राजनीतिक संरचना में इस्तेमाल करती है... इंदौर के सबसे अनुभवी वरिष्ठ लगातार रिकॉर्ड मतों से चुनाव जीतने वाले रमेश मेंदोला का उदाहरण भी अलग तरह का सवाल खड़ा करता है... लगातार मजबूत चुनावी प्रदर्शन करने वाले नेता जिसने सबसे बड़ी जीत का रिकॉर्ड बनाया उनका लंबे समय तक मंत्री पद से बाहर रहना बताता है कि भाजपा में व्यक्तिगत चुनावी ताकत और सत्ता में भागीदारी अब एक ही समीकरण नहीं है... भाजपा की तेज सम्राट महिला नेत्री अर्चना चिटनीस भी ना मंत्रिमंडल का हिस्सा बन सकी और ना ही दिल्ली तक वो अपने को एडजस्ट कर पाईं.. सवाल फिर वही आखिर ब्राह्मण चेहरों की भाजपा में धमक क्यों खत्म हो रही.. और क्या यही बात ब्राह्मण नेताओं की बेचैनी को बढ़ाती है... मध्य प्रदेश में वर्तमान सत्ता संरचना में उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला निश्चित रूप से बड़ा ब्राह्मण चेहरा हैं... लेकिन उनकी भूमिका भी एक सीमित क्षेत्र और राजनीतिक-संगठनात्मक दायरे में पढ़ी जाती है... दिल्ली तक पहुंच और धमक लेकिन मध्य प्रदेश में दायरा सीमित न जाने कितने संतुष्ट खुद को समझ पाते होंगे.. मंत्रिमंडल में ग्वालियर चंबल से भरपाई के साथ राकेश शुक्ला को भी एक एडजस्टमेंट तक सीमित रखा गया.. भविष्य में क्या वह भाजपा के बड़े ब्राह्मण चेहरा खुद को साबित कर पाएंगे.. इसके अलावा कुछ चेहरों को सत्ता-संगठन में समायोजित किया गया है, लेकिन पुराने दौर की तरह एक साथ कई प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरे निर्णायक पदों पर दिखाई नहीं देते... यहीं से तुलना शुरू होती है... क्या भाजपा ने ब्राह्मण नेतृत्व को खत्म किया है?... नहीं... लेकिन क्या उसने उसे पहले जैसी केंद्रीय भूमिका दी है?... यह सवाल जरूर मौजूद है... भाजपा की नई राजनीति में "सामाजिक विस्तार" शायद "परंपरागत प्रभाव" से बड़ा लक्ष्य बन गया है... ओबीसी राजनीति का विस्तार... आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ मजबूत करने की कोशिश... दलित प्रतिनिधित्व... महिला नेतृत्व... युवा चेहरे... इन सभी के बीच ब्राह्मण नेतृत्व को अपनी नई भूमिका तलाशनी पड़ रही है... इस बदलाव को मोदी-शाह युग की भाजपा की व्यापक रणनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता... अब पार्टी केवल परंपरागत समर्थक वर्गों पर निर्भर नहीं रहना चाहती... वह उन सामाजिक समूहों में भी स्थायी राजनीतिक आधार बनाना चाहती है, जहां पहले उसका प्रभाव सीमित था... मध्य प्रदेश में डॉ. मोहन यादव का मुख्यमंत्री बनना इसी बदलाव का बड़ा प्रतीक है... यह संदेश भी है कि भाजपा अब सामाजिक नेतृत्व के नए केंद्र तैयार कर रही है... लेकिन राजनीति में एक वर्ग को आगे बढ़ाना दूसरे वर्ग को अप्रासंगिक करने के बराबर नहीं होना चाहिए... यहीं भाजपा के सामने असली चुनौती है... ब्राह्मण नेतृत्व को प्रतीक से सहभागिता तक कैसे लाया जाए?... पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और खजुराहो सांसद विष्णु दत्त शर्मा को लेकर चल रही चर्चाएं इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती हैं... उन्हें राष्ट्रीय संगठन में नई भूमिका मिली है , सवाल क्या वह इसके हकदार थे वह उन्हें दिया गया.. क्या उनका धैर्य, संयम भविष्य में भाजपा की पूंजी बन पाएगा..तो क्या इसे एक तरफ मध्य प्रदेश के प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरे को राष्ट्रीय स्तर पर उपयोग करने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है... दूसरी तरफ यह भी सवाल रहेगा कि क्या प्रदेश की राजनीति से उनका स्थानांतरण राज्य में ब्राह्मण नेतृत्व के लिए नई जगह बनाएगा या एक और खालीपन पैदा करेगा... यही वह मोड़ है जहां भाजपा को 2028 की राजनीति को ध्यान में रखना होगा... खासतौर से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की बढ़ती सरगर्मियों के बीच वहां ब्राह्मण नेतृत्व को लेकर मचे घमासान को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश में सम्मानजनक कोई फार्मूला क्या जरूरी हो गया है.. क्योंकि चुनाव सिर्फ जातीय गणित से नहीं जीते जाते... लेकिन जातीय प्रतिनिधित्व की अनुभूति भी चुनावी राजनीति में महत्व रखती है... ब्राह्मण समाज यदि यह महसूस करने लगे कि उसके पास पार्टी में प्रभावशाली राजनीतिक चेहरे कम हो रहे हैं... तो यह केवल पद की नाराजगी नहीं होगी... यह प्रतिनिधित्व की मनोवैज्ञानिक राजनीति बन जाएगी... भाजपा के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है... एक तरफ उसे ओबीसी, दलित और आदिवासी विस्तार की अपनी राजनीति को आगे बढ़ाना है... दूसरी तरफ अपने पुराने समर्थक सामाजिक वर्गों को यह भरोसा भी देना है कि उनकी राजनीतिक उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है... उत्तर प्रदेश का आगामी राजनीतिक परिदृश्य भी इस बहस को और महत्वपूर्ण बना रहा है... वहां ब्राह्मण नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर उठने वाली आवाजों का असर मध्य प्रदेश सहित भाजपा शासित राज्यों की रणनीति पर भी पड़ सकता है... क्योंकि राजनीति में वोट बैंक स्थायी नहीं होते... लेकिन राजनीतिक सम्मान और प्रतिनिधित्व की स्मृति लंबे समय तक रहती है... मध्य प्रदेश भाजपा के ब्राह्मण नेताओं की मौजूदा स्थिति को इसलिए "उपेक्षा" बनाम "सम्मान" के सीधे द्वंद्व में देखना अधूरा होगा... असली सवाल है भूमिका का पुनर्निर्धारण... पुराने दौर में ब्राह्मण नेता अक्सर विचार... संगठन... प्रशासन और सत्ता के स्वाभाविक चेहरे होते थे... नई भाजपा में उनसे अब केवल सामाजिक प्रतिनिधित्व की अपेक्षा नहीं, बल्कि चुनावी उपयोगिता और संगठनात्मक योगदान की भी अपेक्षा है... यही बदलाव कई पुराने चेहरों को हैरान करता है... कल तक जो नेतृत्व स्वाभाविक था... आज उसे अपनी उपयोगिता साबित करनी पड़ रही है... और शायद यही बदलती भाजपा का सबसे बड़ा संदेश है... ब्राह्मण नेतृत्व खत्म नहीं हुआ है... उसका राजनीतिक प्रारूप बदल रहा है... सवाल यह है कि भाजपा उसे किस रूप में पुनर्स्थापित करती है... 2028 तक तस्वीर और साफ होगी... क्या राजेंद्र शुक्ला जैसे चेहरे को व्यापक राजनीतिक भूमिका मिलेगी?... क्या विष्णु दत्त शर्मा को राष्ट्रीय स्तर पर जो नई जिम्मेदारी नए प्रकोष्ठ के गठन के साथ सौंपी गई क्या वह उनके अनुभव पार्टी के लिए उनकी उपलब्धियां को ध्यान में रखते हुए न्याय है.. क्या यह किसी दूरगामी रणनीति का हिस्सा है सीधे शब्दों में कोई विकल्प रोककर रखा गया है.. क्योंकि विष्णु दत्त का नाम मोदी मंत्रिमंडल के पुनर्गठन से जोड़कर देखा जा रहा था.. क्या ब्राह्मण के नाते वो भाजपा के सोशल इंजीनियरिंग में फिट नहीं हो पाए.. मध्य प्रदेश में नई पीढ़ी तैयार की जाएगी?... क्या वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का इस्तेमाल सत्ता के बाहर भी किसी प्रभावी संरचना में होगा?... क्या नरोत्तम मिश्रा जैसे चेहरों की राजनीतिक उपयोगिता नए रूप में वापस आएगी?... और क्या नए ब्राह्मण चेहरों को केवल चुनावी मैदान में उतारने के बजाय उन्हें दीर्घकालीन नेतृत्व के लिए तैयार किया जाएगा?... इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि मध्य प्रदेश भाजपा में ब्राह्मण नेतृत्व पीछे छूट रहा है... या फिर पार्टी उसे पुरानी भूमिका से निकालकर नई भूमिका में ढाल रही है... क्योंकि भाजपा की बदलती राजनीति में असली लड़ाई अब केवल टिकट या मंत्री पद की नहीं है... असली लड़ाई राजनीतिक प्रासंगिकता की है... और इस समय मध्य प्रदेश के ब्राह्मण नेताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल भी यही है... "क्या बदलती भाजपा में हमारी जगह कम हुई है... या हमारी भूमिका बदल गई है?" भाजपा के वर्तमान ब्राह्मण चेहरों पर नजर डालें तो सवाल तो खड़ा होता है कौन कहां किस हाल में है और हैरान परेशान सा क्यों नजर आता है.. यह कहना गलत नहीं होगा कि 2028 का चुनाव इस सवाल का सबसे बड़ा जवाब देगा... बॉक्स✅ बॉक्स✅ (2028:भाजपा के लिए भविष्य का ब्राह्मण चेहरा कौन और क्यों ) स्लग (ब्राह्मण नेतृत्व : कल के चेहरे, आज की भूमिका और कल की तलाश) ✅✅ मध्य प्रदेश भाजपा में ब्राह्मण नेतृत्व की कहानी किसी एक चुनाव, एक टिकट या एक मंत्री पद की कहानी नहीं है... यह तीन पीढ़ियों के राजनीतिक संक्रमण की कहानी है... एक दौर था जब मध्य प्रदेश के ग्वालियर से निकले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई देश में दलगत राजनीति से ऊपर सबसे बड़ा ब्राह्मण चेहरा बने और स्थापित हुए, पूर्व मुख्यमंत्री सत्ता और संगठन के कई अहम पदों पर रह चुके स्वर्गीय कैलाश जोशी जैसे नेता भाजपा की वैचारिक राजनीति और संगठनात्मक पहचान के बड़े स्तंभ माने जाते थे... उनके साथ पूर्व सांसद अब मुखर आलोचालकों में से एक रघुनंदन शर्मा जैसे चेहरे भी पार्टी के पारंपरिक ब्राह्मण समर्थक वर्ग से संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम रहे... इन नेताओं की पहचान केवल पद से नहीं थी... संगठन, विचार और समाज के बीच उनका अपना प्रभाव था... समय बदला तो गोपाल भार्गव, सीता शरण शर्मा, गिरीश गौतम, रमेश मेंदोला, अर्चना चिटनिस नरोत्तम मिश्रा और अनूप मिश्रा जैसे चेहरे भाजपा की मुख्यधारा में उभरे... गोपाल भार्गव ने लंबे समय तक विधानसभा की राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखी... कभी नेता प्रतिपक्ष रहे गोपाल भार्गव भी इस बार मंत्री भी नहीं बन सके.. नरोत्तम मिश्रा ने सत्ता, संगठन और आक्रामक राजनीतिक शैली के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई... जिन्हें दतिया यूपी चुनाव में टिकट के लायक नहीं समझा गया.. अनूप मिश्रा ने ग्वालियर-चंबल की राजनीति में अपनी जगह बनाई और अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विरासत से जुड़े होने के कारण उनका अपना महत्व रहा... अनूप मिश्रा भी विलुप्त हो गए.. इसके समानांतर संगठन की जमीन से निकले आलोक शर्मा जैसे नेताओं ने लंबे समय तक पार्टी के लिए काम किया...वहीं कांग्रेस से भाजपा में आए सुरेश पचौरी जैसे अनुभवी ब्राह्मण चेहरे भी पार्टी के साथ जुड़े... जिनकी कांग्रेस के प्रमुख 6 नेताओं में कभी तूती बोलती थी आज भाजपा न सिर्फ उनकी उपेक्षा कर रही बल्कि बेहतर उपयोग भी नहीं कर रही.. एडजस्टमेंट के नाम पर पचौरी के लिए पद प्रतिष्ठा पावर तो दूर की बात.., लेकिन इन सभी की राजनीतिक उपयोगिता अलग-अलग समय पर अलग-अलग सवालों के घेरे में आती रही... अब कहानी तीसरी पीढ़ी की है... पीढ़ी परिवर्तन के दौर में भाजपा ने पुराने चेहरों को पूरी तरह हटाया नहीं है... लेकिन नई भूमिका और नई प्राथमिकताओं के साथ नए चेहरों को आगे बढ़ाया है... मध्य प्रदेश से लोकसभा में पहुंचे विष्णु दत्त शर्मा के लिए तो शायद ब्राह्मण होना ही उन्हें नुकसान पहुंचा रहा.. जिसके नेतृत्व में चुनाव जीते जिसने राष्ट्रीय नेतृत्व का एजेंडा मध्य प्रदेश में आगे बढ़ाया वह भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग विशेष कोटा में अभी तक फिट नहीं हो पाए.. सांसद जनार्दन मिश्रा, आलोक शर्मा, आशीष दुबे और राजेश मिश्रा जैसे ब्राह्मण सांसद यह बताते हैं कि चुनावी राजनीति में ब्राह्मण नेतृत्व अभी भी मौजूद और प्रभावशाली है... विधायक रहते रामेश्वर शर्मा ,उमाकांत शर्मा जैसे तेज तर्राट ब्राह्मण नेता भी मंत्री पद के दावेदार बनकर सामने हैं..रामेश्वर तो राजधानी की राजनीति का मुख्यमंत्री मोहन यादव का सबसे पसंदीदा चेहरा बनकर स्थापित हो चुके हैं.. सवाल वही इस बात की क्या गारंटी ये भविष्य में भाजपा का चेहरा बनेंगे.. संगठन में भी शैलेंद्र बरुआ, नंदिता पाठक और सुरेंद्र शर्मा जैसे चेहरे जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं... संगठनात्मक और वैचारिक स्तर पर लोकेंद्र पाराशर और क्षितिज भट्ट जैसे नेता सक्रिय रहे हैं... मोर्चा और प्रकोष्ठों में भी मनोरंजन मिश्रा और आशुतोष तिवारी जैसे चेहरे अपनी भूमिका निभा रहे हैं... भाजपा मीडिया का ब्राह्मण चेहरा डॉक्टर हितेश वाजपेई प्रवक्ता लेकिन अनुभव को दरकिनार कर दिया गया.. इनमें से कौन भविष्य का ब्राह्मण चेहरा पार्टी की जरूरत पूरा करेगा कहना कठिन है.. भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए यानी तस्वीर यह नहीं है कि भाजपा में ब्राह्मण चेहरा खत्म हो गया... असल सवाल यह है कि इन चेहरों में से कितने चेहरों को निर्णायक राजनीतिक शक्ति, सत्ता की जिम्मेदारी या भविष्य का नेतृत्व माना जा रहा है? यहीं से बेचैनी शुरू होती है... आशुतोष तिवारी इसका ताजा उदाहरण हैं... पार्टी ने दतिया उपचुनाव में नए चेहरे पर भरोसा किया... लेकिन चुनावी परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा... ऐसे मामलों में सवाल सिर्फ हार का नहीं होता... सवाल यह भी होता है कि क्या नई पीढ़ी को पर्याप्त राजनीतिक समय और अनुभव मिलने से पहले ही बड़े मुकाबले में उतार दिया गया? दूसरी तरफ अनुभवी चेहरों का सवाल है... कुछ मंत्री बने... कुछ उपमुख्यमंत्री तक पहुंचे... कुछ विधानसभा या संसद में सफल रहे... कुछ संगठन में जिम्मेदारी लेकर सक्रिय रहे... लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे चेहरे भी हैं जिनकी राजनीतिक क्षमता, संगठनात्मक अनुभव और सार्वजनिक पहचान के बावजूद उन्हें सत्ता या राष्ट्रीय संगठन में वैसी भूमिका नहीं मिली जिसकी उनके समर्थक अपेक्षा करते रहे... यही वह जगह है जहां "असंतुष्ट" और "संतुष्ट" के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है... इन नेताओं को पार्टी ने औपचारिक रूप से असंतुष्ट नहीं माना है... अधिकांश नेता भी सार्वजनिक रूप से संगठन के साथ खड़े दिखाई देते हैं... लेकिन यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि सभी अपनी वर्तमान भूमिका से पूरी तरह संतुष्ट हैं... क्योंकि राजनीति में पद से अधिक महत्वपूर्ण होता है प्रभाव... पहुंच... और भविष्य की संभावना... आज भाजपा में ब्राह्मण नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा संकट प्रतिनिधित्व का नहीं बल्कि दिशा और भूमिका का है... कल कैलाश जोशी जैसे नेता पार्टी की पहचान थे... फिर गोपाल भार्गव, नरोत्तम मिश्रा और अनूप मिश्रा जैसे चेहरे पार्टी की राजनीतिक ताकत बने... आज विष्णु दत्त शर्मा जैसे नेता प्रदेश से राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं... आलोक शर्मा जैसे नेता संगठन की पृष्ठभूमि से सांसद की पृष्ठभूमि से आए हैं... नए सांसद और नए संगठनात्मक चेहरे मौजूद हैं... लेकिन कल का चेहरा कौन होगा?...यही सवाल सबसे बड़ा है...भाजपा की राजनीति अब सामाजिक विस्तार के दौर में है... ओबीसी... आदिवासी... दलित... महिला और युवा नेतृत्व को अधिक स्थान देने की रणनीति ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं... ऐसे में ब्राह्मण नेतृत्व को अपनी पुरानी राजनीतिक भूमिका से आगे बढ़कर नई भूमिका तलाशनी होगी... शायद यही कारण है कि विधानसभा से संसद तक पहुंचने वाले कई ब्राह्मण चेहरे दिखाई तो देते हैं... लेकिन सत्ता और संगठन के निर्णायक केंद्रों में उनकी संख्या सीमित महसूस होती है... कल के पास विरासत थी... आज के पास अनुभव है... लेकिन कल के नेतृत्व के पास क्या होगा? मध्य प्रदेश भाजपा के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है... क्योंकि ब्राह्मण समाज को केवल वोट बैंक समझना अब पुराना राजनीतिक गणित होगा... और उसे पूरी तरह किनारे करना भी भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से आसान नहीं होगा... एक दौर था जब भाजपा का ब्राह्मण वोट बैंक पर कब्जा था, कुछ चेहरों को सामने रखकर बीजेपी मध्य प्रदेश विधानसभा की हर सीट पर कांग्रेस के मुकाबले इस बड़े वोट बैंक का समर्थन हासिल करती रही.. जिसका प्रभाव और दूसरे वर्ग समुदाय पर भी पार्टी की ताकत बनता रहा.. दतिया उपचुनाव में ब्राह्मण वोट भाजपा की हार का भी एक कारण बना.. ऐसे में 2028 की राजनीति में पार्टी को नए सामाजिक समीकरणों के साथ पुराने समर्थक वर्गों का भरोसा भी बनाए रखना होगा... इसलिए आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा ब्राह्मण नेतृत्व को केवल चुनावी चेहरों के रूप में देखती है... या फिर नई पीढ़ी के लिए सत्ता, संगठन और राष्ट्रीय राजनीति में दीर्घकालीन नेतृत्व की सीढ़ी भी तैयार करती है... क्योंकि फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है... चेहरे बहुत हैं... चुनाव जीतने वाले भी हैं... संगठन में काम करने वाले भी हैं... लेकिन निर्णायक भूमिका वाले कितने हैं? और शायद इसी सवाल की वजह से मध्य प्रदेश भाजपा का ब्राह्मण नेतृत्व आज अलग-थलग नहीं तो कम से कम अपनी अगली भूमिका को लेकर बेचैन जरूर दिखाई देता है...