सुप्रीम कोर्ट ने संविधान व्याख्या पर दी सफाई
संविधान की धाराओं पर केंद्रित रहेगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि वह केवल संविधान की धाराओं की व्याख्या करेगा और व्यक्तिगत राज्यों या व्यक्तियों से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। यह टिप्पणी राज्यपालों और राष्ट्रपति द्वारा बिलों पर हस्ताक्षर करने की समय-सीमा तय करने से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान की गई।
राज्यपालों की भूमिका पर उठे सवाल
मामले में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने कहा कि अदालत केवल संविधान के अनुच्छेदों पर विचार करेगी। सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि अगर राज्यपाल बिल को रोककर रखते हैं, तो अनुच्छेद 200 की प्रक्रिया प्रभावित होती है। अनुच्छेद 200 राज्यपाल को बिलों पर मंजूरी, पुनर्विचार या राष्ट्रपति के पास भेजने का अधिकार देता है।
केंद्र का तर्क और विवाद की पृष्ठभूमि
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि राज्य सरकारें इस मामले में अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकतीं। यह विवाद तमिलनाडु में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच बिलों पर देरी को लेकर शुरू हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा था कि राज्यपालों के पास बिलों पर जल्दी निर्णय लेने की जिम्मेदारी है।
सुनवाई का महत्व
यह मामला भारतीय संविधान में राज्यपाल और राष्ट्रपति की भूमिका और सीमाओं को स्पष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह तय होगा कि विधेयकों पर निर्णय लेने में समय-सीमा तय करने का अधिकार अदालत के पास है या नहीं।