ED अधिकारियों पर FIR पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, ममता सरकार से जवाब तलब
प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में I-PAC रेड से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया है। अदालत ने राज्य सरकार द्वारा ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगा दी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
एफआईआर पर 3 फरवरी तक रोक, एजेंसी के काम में दखल न देने की हिदायत
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने कहा कि राज्य सरकार ED के कार्य में दखल न दे और एजेंसी को स्वतंत्र रूप से जांच करने दी जाए। अदालत ने 3 फरवरी को अगली सुनवाई तक ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगाने का आदेश दिया। न्यायालय ने टिप्पणी की कि इस मामले में कुछ बड़े सवाल उठते हैं और यदि इनका समाधान न हुआ तो अराजक स्थिति पैदा हो सकती है। अदालत ने यह भी पूछा कि यदि केंद्रीय एजेंसियां किसी गंभीर अपराध की ईमानदारी से जांच कर रही हों तो क्या उन्हें राजनीतिक कारणों से रोका जा सकता है।
I-PAC रेड, मनी लॉन्ड्रिंग केस और ED के आरोप
ED ने 8 जनवरी को तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आईटी हेड और पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के डायरेक्टर प्रतीक जैन के घर और कंपनी से जुड़े कई ठिकानों पर छापा मारा था। एजेंसी का कहना है कि यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी से जुड़े 2,742 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग केस की जांच के तहत की गई। CBI ने इस मामले में 27 नवंबर 2020 को एफआईआर दर्ज की थी, जिसके आधार पर ED ने 28 नवंबर 2020 से अपनी जांच शुरू की।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने अदालत में बताया कि कोयले का भुगतान नकद में किया जाता था, समन का जवाब नहीं मिला और करीब 20 करोड़ रुपये हवाला चैनल के जरिए I-PAC तक पहुंचने का आरोप है। इसी के चलते 8 जनवरी को कंपनी के 10 ठिकानों पर तलाशी की गई। उन्होंने यह भी कहा कि कार्रवाई से पहले अधिकारियों को ईमेल के माध्यम से जानकारी दी गई थी और एजेंसी को राजनीतिक गतिविधियों में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
ममता बनर्जी की मौजूदगी और सबूतों को लेकर विवाद
ED का आरोप है कि 8 जनवरी की तलाशी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बंगाल पुलिस के अधिकारियों के साथ प्रतीक जैन के घर पहुंचीं और अपने साथ कुछ सबूत लेकर चली गईं। इस पर अदालत ने गंभीरता से सवाल उठाए। सुनवाई में यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि ED कुछ जब्त करना चाहती, तो कानूनी प्रक्रिया के तहत जब्ती कर सकती थी। अदालत ने कहा कि इस पूरे प्रकरण की जांच जरूरी है और राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट को नोटिस जारी करने से नहीं रोक सकती।
कोर्टरूम में बहस: ED बनाम बंगाल सरकार की दलीलें
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले ED से पूछा कि वह I-PAC के ठिकानों पर किस उद्देश्य से गई थी और किस जांच के तहत कार्रवाई की जा रही थी। सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि यह छापेमारी अवैध कोयला घोटाले की जांच का हिस्सा थी और एक हवाला चैनल की पहचान की गई है। उन्होंने कहा कि I-PAC को लगभग 20 करोड़ रुपये नकद के रूप में हवाला के जरिए ट्रांसफर होने की बात सामने आई है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या यह वही I-PAC है जिससे पहले प्रशांत किशोर जुड़े थे, जिस पर सॉलिसिटर जनरल ने हां में जवाब दिया।
पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि कोयला घोटाले में आखिरी बयान फरवरी 2024 में दर्ज किया गया था और तब से ED ने कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की। उन्होंने सवाल उठाया कि चुनावों के समय अचानक छापेमारी क्यों की गई, जबकि I-PAC के पास पार्टी से संबंधित कई जानकारियां और चुनावी डेटा मौजूद हैं। उनके अनुसार I-PAC के डायरेक्टर प्रतीक जैन के लैपटॉप में चुनाव से जुड़ी सारी जानकारी थी और ED उसे जब्त करना चाहती थी। उन्होंने यह भी कहा कि ममता बनर्जी केवल उनका लैपटॉप और आईफोन लेकर गई थीं और रेड में हस्तक्षेप नहीं किया।
अदालत ने सिब्बल के इस दावे से असहमति जताई और कहा कि अगर ED का इरादा जब्ती का होता तो वह कानून के मुताबिक जब्त कर सकती थी, लेकिन रिकॉर्ड के अनुसार कुछ भी जब्त नहीं किया गया। साथ ही, अदालत ने मजाकिया लहजे में यह टिप्पणी भी की कि यदि चुनाव के दौरान मनी लॉन्ड्रिंग होती है तो इसमें ED की क्या गलती हो सकती है।
कलकत्ता हाईकोर्ट की कार्यवाही और ताजा घटनाक्रम
I-PAC रेड मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट पहले ही तृणमूल कांग्रेस की याचिका खारिज कर चुका है। TMC ने आरोप लगाया था कि ED ने 8 जनवरी को प्रतीक जैन के ऑफिस पर रेड के दौरान कुछ कागजात जब्त किए थे, जबकि जांच एजेंसी ने अदालत में कहा कि पार्टी दफ्तर से कुछ भी जब्त नहीं किया गया।
8 जनवरी को कोलकाता में गुलाउडन स्ट्रीट स्थित प्रतीक जैन के घर और सॉल्टलेक स्थित दफ्तर पर सुबह छह बजे से छापेमारी शुरू हुई। बाद में कोलकाता पुलिस कमिश्नर वहां पहुंचे और कुछ समय बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी उनके घर पहुंचीं। बाहर निकलते समय उनके हाथ में एक हरी फाइल दिखाई दी। इसके बाद वे I-PAC के ऑफिस भी गईं और सार्वजनिक तौर पर आरोप लगाया कि गृहमंत्री उनकी पार्टी के दस्तावेज उठवा रहे हैं। ED ने उसी दिन बताया कि पश्चिम बंगाल में छह और दिल्ली में चार ठिकानों पर छापेमारी की गई।
9 जनवरी को तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली से कोलकाता तक विरोध प्रदर्शन किया। ममता बनर्जी ने ईडी पर दो एफआईआर दर्ज कराईं और कोलकाता में मार्च निकाला। इस दौरान उन्होंने दावा किया कि उनके पास गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ पेन ड्राइव में सबूत हैं और आरोप लगाया कि कोयला घोटाले की रकम दिल्ली में बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं तक पहुंचती है। उन्होंने यह भी कहा कि सुवेंदु अधिकारी ने कोयला घोटाले के पैसे का इस्तेमाल किया और वह रकम अमित शाह को भेजी गई। इन आरोपों के बाद सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को मानहानि का नोटिस भेजकर 72 घंटे के भीतर सबूत पेश करने की मांग की।
चुनाव से पहले ED की सक्रियता पर उठते सवाल
यह पूरा मामला ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में मार्च-अप्रैल 2026 में चुनाव होने हैं और I-PAC तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनावी रणनीति तैयार कर रही है। I-PAC एक पॉलिटिकल कंसल्टेंसी कंपनी है जो विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए बड़े पैमाने पर चुनावी अभियानों पर काम करती है। इस पृष्ठभूमि में ED की कार्रवाई की टाइमिंग को लेकर राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं, हालांकि सुप्रीम कोर्ट फिलहाल केवल यह देख रहा है कि जांच एजेंसी के काम में किसी प्रकार की बाधा डाली गई या नहीं, और इसी संदर्भ में उसने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है।
अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार के जवाब और ED के आरोपों के आधार पर आगे की कानूनी दिशा तय करेगा। तब तक के लिए ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर लगी रोक जारी रहेगी और एजेंसी को कोयला तस्करी और संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच जारी रखने की अनुमति रहेगी।
Bhavanesh Soni