#क्रांति_गौड़ जब क्रिकेट के अपने जुनून के चलते पहली बार अकादमी पहुंचीं, उनके पास खेलने के जूते तक नहीं थे। वहां के कोच ने उनकी अद्भुद प्रतिभा को देखते हुए फीस माफ की और 1600 के स्पाइक्स व क्रिकेट किट अपने पैसों से दिलाए। महिला विश्वकप के फाइनल तक का सफर क्रांति के जुनून का ही नतीजा है एक तो सबसे पिछड़े क्षेत्र बुंदेलखंड और वह भी सुदूर घुवारा गांव फिर बनवासी अनुसूचित जनजाति और उसमें से भी किसी लड़की को खेलों में आगे बढ़ना समाज की सोच ही नहीं है । छोटे से गांव घुवारा की 21 साल की क्रांति गौड़ आज उस मुकाम पर हैं, जहां पहुंचने का सपना हर खिलाड़ी देखता है। कभी फटे-पुराने जूतों में दौड़ने वाली इस बेटी ने रविवार को महिला विश्व कप के फाइनल में टीम इंडिया की ओर से बेहतर परफार्मेस किया। जिस समय क्रांति मैदान में थी, उस समय उसके गांव में जश्न का माहौल रहा। परिजनों की आंखों में खुशी के आंसू झलक रहे थे। क्रांति को इस मुकाम तक पहुंचने में काफी संघर्ष करना पड़ा। क्रांति ने इस विश्व कप में 9 विकेट लिए। और उनके बेहतरीन प्रदर्शन से भारत की महिला टीम ने पहली बार विश्व कप जीता है। साल 2012 में क्रांति के पिता एमपी पुलिस में कांस्टेबल थे, चुनाव ड्यूटी के दौरान विवादित घटना के बाद नौकरी से निकाल दिए गए। घर का सहारा अचानक छिन गया। परिवार पर आर्थिक संकट गहराने लगा। भाई मयंक ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, ताकि बहन का क्रिकेट सपना जिंदा रह सके। इसी कठिन दौर में आए कोच राजीव बिलथरे ने क्रांति की प्रतिभा को पहचाना। योग्यता प्रतिभा के आड़े गरीब–अमीर, अगड़ा–पिछड़ा, दलित कुछ नहीं आता, जब जुनून और प्रतिभा निखरती है साधन–संसाधन, पैसा ना होने के बावजूद सबसे अंतिम पंक्ति अनुसूचित जनजाति और बुंदेलखंड के सुदूर गांव की क्रांति जैसी होनहार बेटी समाज के लिए प्रेरणा बनती है आज जब पूरे विश्व में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की जय जय कार हो रही हैं उस समय हम सभी का कर्तव्य बनता हैं कि देश और समाज में अपनी आस पास की प्रतिभावान जिंदगियों को पहचाने और उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिलाने में अपना योगदान प्रदान करे .. सबके साथ और विश्वास से ही देश और समाज का निर्माण होता हैं,आशा है अब किसी क्रांति की मां को अपने जेवर बेचने नहीं पड़ेंगे किसी भी जाती या वर्ग की बात छोड़ कर हमें सिर्फ सनातनी जाति के उत्थान की सोच रखे। वाह क्रांति.... well done performance फूल नहीं चिंगारी है तू भारत की नई है...
देश के सबसे पिछड़े क्षेत्र बुंदेलखंड की बेटी ने कर दिया कमाल....गुदडी के लाल नहीं अब "गुदडी की लाली" की बात