एमपी की वर्ल्ड चैंपियन बेटियां, फिर भी बिना सम्मान

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एमपी की वर्ल्ड चैंपियन बेटियां, फिर भी बिना सम्मान

एमपी की ब्लाइंड वर्ल्ड चैंपियन बेटियों को सम्मान और नौकरी का इंतजार

पहले ब्लाइंड विमेंस टी-20 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम ने इतिहास रचते हुए खिताब जीता, लेकिन मध्य प्रदेश की तीन बेटियां सुनीता सराठे, सुषमा पटेल और दुर्गा येवले अब भी सरकारी सम्मान और नौकरी से वंचित हैं। एक तरफ अन्य राज्य अपनी खिलाड़ियों पर इनामों की बारिश कर रहे हैं, दूसरी तरफ मध्य प्रदेश में इन चैंपियनों को केवल फोन पर बधाइयों तक ही सीमित रखा गया है।

भारतीय टीम की ऐतिहासिक जीत में एमपी की अहम भूमिका

ब्लाइंड महिला टी-20 विश्व कप का आयोजन पहली बार हुआ, जिसमें भारत, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका समेत छह टीमों ने हिस्सा लिया। भारतीय टीम ने क्रिकेट एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड इन इंडिया के बैनर तले खेलते हुए पूरे टूर्नामेंट में एक भी मैच नहीं हारा। फाइनल मुकाबला श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में हुआ, जहां नेपाल द्वारा दिए गए 115 रनों के लक्ष्य को भारत ने 12.1 ओवर में तीन विकेट खोकर हासिल कर लिया।

नर्मदापुरम की ऑलराउंडर सुनीता सराठे ने फाइनल में थ्रो से नेपाल का पहला विकेट गिराकर जीत की नींव रखी। पूरे टूर्नामेंट में उन्होंने सबसे ज्यादा विकेट लेने के साथ छह रन आउट किए। बैतूल की विकेटकीपर दुर्गा येवले ने तीन रन आउट और दो स्टंपिंग की, जबकि दमोह की ऑलराउंडर सुषमा पटेल का भी प्रदर्शन बेहतरीन रहा। पहले ही विश्व कप में इन खिलाड़ियों ने ट्रॉफी भारत लाकर राज्य और देश दोनों का नाम रोशन किया।

अन्य राज्यों में इनाम, एमपी में खामोशी

ओडिशा सरकार ने अपनी खिलाड़ियों को 11 लाख रुपये और नौकरी, कर्नाटक ने 10 लाख रुपये और नौकरी, जबकि आंध्र प्रदेश ने 15 लाख रुपये की घोषणा की है। यही नहीं, आंध्र प्रदेश के डिप्टी सीएम पवन कल्याण ने सुनीता, सुषमा और दुर्गा का भव्य सम्मान किया और उन्हें पांच-पांच लाख रुपये का पुरस्कार भी दिया।

इसके विपरीत, मध्य प्रदेश सरकार ने अब तक न तो किसी सम्मान समारोह की घोषणा की, न किसी आर्थिक पुरस्कार की और न ही नौकरी देने का फैसला किया है। खिलाड़ियों के अनुसार, स्थानीय विधायक और सांसदों ने केवल फोन पर बधाई दी, लेकिन मिलने तक नहीं पहुंचे।

कोच और खिलाड़ियों का भेदभाव का आरोप

क्रिकेट एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड मध्य प्रदेश के जनरल सेक्रेटरी और कोच सोनू गोलकर का कहना है कि इसी तरह की उपलब्धि पर क्रिकेटर क्रांति गौड़ को तुरंत एक करोड़ रुपये की सम्मान राशि और अन्य सुविधाएं दी गईं, जबकि ब्लाइंड महिला खिलाड़ियों के लिए इतनी संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई। गोलकर ने आरोप लगाया कि दिव्यांग खिलाड़ियों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है और उनके लिए विशेष खेल नीति के बिना स्थिति नहीं सुधरेगी।

उन्होंने कहा कि वह खुद तीन विश्व कप खेल चुके हैं, लेकिन किसी भी नेता का व्यक्तिगत फोन तक नहीं आया। अब जब इन लड़कियों के लिए आवाज उठानी पड़ी है तो पीछे नहीं हटेंगे, क्योंकि ये भी इसी देश की बेटियां हैं और इन्हें समान सम्मान मिलना चाहिए।

खिलाड़ियों की पीड़ा: सम्मान नहीं, तो भेदभाव महसूस

सुनीता सराठे ने बताया कि उन्होंने टूर्नामेंट में दो विकेट और छह रन आउट किए, फिर भी राज्य सरकार ने न उन्हें बुलाया, न किसी सम्मान की घोषणा की। उन्हें यह देखकर अच्छा लगा कि साधारण खिलाड़ियों को तुरंत सम्मान मिलता है, लेकिन उन्हें लगता है कि उनकी विकलांगता देखकर ही उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।

दुर्गा येवले ने कहा कि वे गांवों से निकलकर यहां तक पहुंची हैं और पूरा परिवार उन पर निर्भर है। अगर नौकरी मिल जाए तो जीवन बदल सकता है, नहीं तो यह उपेक्षा बहुत तकलीफदेह होगी। सुषमा पटेल ने भी कहा कि यह उनका पहला विश्व कप था और वे खिताब जीतकर लौटी हैं, फिर भी सरकार चुप है जबकि सामान्य खिलाड़ियों को तुरंत बुलाकर सम्मानित किया जाता है।

क्रांति गौड़ को मिला बड़ा सम्मान, तुलना से बढ़ी नाराजगी

हाल ही में महिला विश्व कप विजेता टीम की सदस्य क्रांति गौड़ को जबलपुर में आयोजित एक राज्य स्तरीय समारोह में मुख्यमंत्री द्वारा एक करोड़ रुपये की राशि और अन्य वादों के साथ सम्मानित किया गया था। खिलाड़ियों और कोच का कहना है कि इस उदाहरण के बाद ब्लाइंड खिलाड़ियों के साथ हो रहा अंतर और अधिक साफ दिखाई दे रहा है, जिससे उन्हें भेदभाव की भावना हो रही है।

समाज की सोच बदली, पर व्यवस्था पीछे

सुनीता सराठे के अनुसार, जब वे गांव में क्रिकेट खेलती थीं तो लोग ताना मारते थे कि दृष्टिबाधित लड़की कैसे क्रिकेट खेलेगी। आज विश्व कप जीतने के बाद वही लोग मिठाई बांटकर उनकी तारीफ कर रहे हैं। समाज की सोच भले ही बदल रही हो, लेकिन सरकारी व्यवस्था और नीतियां अभी भी दिव्यांग खिलाड़ियों के सम्मान और अधिकारों के मामले में पीछे दिखाई देती हैं।

निष्कर्ष: समान सम्मान और नीति की मांग

ब्लाइंड विमेंस टी-20 वर्ल्ड कप जीतकर लौटीं मध्य प्रदेश की बेटियां सम्मान, सुरक्षा और स्थायी नौकरी की उम्मीद लगाए बैठी हैं। वे चाहती हैं कि मुख्यमंत्री उन्हें बुलाकर सम्मानित करें और दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए स्पष्ट स्पोर्ट्स पॉलिसी बनाई जाए, ताकि भविष्य में किसी भी चैंपियन को अपनी उपलब्धियों के बावजूद भेदभाव और उपेक्षा का सामना न करना पड़े।

Vivek Singh