ट्रम्प बोले- ईरान से समझौता साइन हो चुका:शुक्रवार तक हॉर्मुज पूरी तरह खुल जाएगा; दोबारा हमला करना पड़ा, इसका दुख है
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि ईरान के साथ समझौता पूरी तरह साइन हो चुका है। G7 समिट के लिए फ्रांस पहुंचे ट्रम्प ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ बातचीत में कहा कि हॉर्मुज स्ट्रेट आंशिक रूप से खुल चुका है और शुक्रवार तक पूरी तरह खोल दिया जाएगा।
ट्रम्प ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत अच्छी रही, लेकिन बीच में अमेरिका को दो रात सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी। उन्होंने कहा, “हमारी ईरान के साथ बहुत अच्छी बन रही थी। मुझे दुख हुआ कि हमें दो रात के लिए वापस जाकर हमला करना पड़ा।”
उधर, रॉयटर्स के मुताबिक एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि ट्रम्प, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ समझौते पर डिजिटिल साइन कर चुके हैं।
अधिकारी ने कहा कि समझौते का पूरा ब्योरा अगले 24-48 घंटे में जारी किया जाएगा, जबकि सप्ताह के अंत में तकनीकी स्तर की बातचीत शुरू होगी।
ईरान ने दस्तखत करने से पहले 3 शर्तें रखीं
ईरान-अमेरिका के बीच हुए समझौते का पूरा दस्तावेज अभी जारी नहीं किया गया है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा है कि MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद शुरू होने वाली 60 दिन की अमेरिका-ईरान की बातचीत इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका पहले अपने तीन वादे पूरे करता है या नहीं।
गरीबाबादी के मुताबिक अमेरिका को तीन कदम उठाने होंगे-1. नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करना, 2. युद्ध और सभी सैन्य कार्रइयों को रोकना, 3. ईरान के फ्रीज्ड फंड जारी करना।
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ट्रम्प ने कहा है कि ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों से राहत तभी मिलेगी, जब वह समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारियां पूरी करेगा।
फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ बातचीत के दौरान ट्रम्प ने कहा, "यह पूरी तरह उनके व्यवहार पर निर्भर है। अगर वे वही करेंगे जो उन्हें करना चाहिए, तभी राहत लागू होगी।"
ट्रम्प ने कहा है कि ईरान के साथ हुए समझौते का सबसे अहम हिस्सा यह है कि तेहरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। उन्होंने इस पर सहमति दी है।
ट्रम्प ने बताया कि समझौते को लागू कराने के लिए सख्त निगरानी व्यवस्था होगी। इसके जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि ईरान समझौते की शर्तों का पालन करे। उन्होंने उम्मीद जताई कि इससे दोनों देशों के रिश्तों में सुधार होगा।
हालांकि ट्रम्प ने चेतावनी भी दी कि अगर समझौता सफल नहीं रहा तो हालात फिर पहले जैसे हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “उम्मीद है कि हमारे संबंध अच्छे रहेंगे, और अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम फिर वहीं पहुंच जाएंगे जहां से शुरुआत हुई थी।”
ट्रम्प ने दावा किया है कि हॉर्मुज से तेल टैंकरों का निकलना शुरू हो गया है। उनके मुताबिक, ईरान के साथ समझौते की घोषणा के बाद कई जहाज तेल लेकर इस अहम समुद्री मार्ग से आगे बढ़ रहे हैं। ट्रम्प ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, “कई जहाज, जो तेल से लदे हुए हैं, हॉर्मुज से निकलना शुरू कर चुके हैं।”
डोनाल्ड ट्रम्प G7 शिखर सम्मेलन 2026 में हिस्सा लेने के लिए सोमवार को फ्रांस के एवियन-ले-बैंस पहुंचे। उनके पहुंचने पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच होटल रॉयल में ठहरने की व्यवस्था की गई है।
G7 सम्मेलन के दौरान ट्रम्प कई वैश्विक नेताओं से मुलाकात करेंगे। इनमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं। दोनों नेताओं की द्विपक्षीय बैठक पर खास नजर रहेगी।
अमेरिका ने कहा है कि ईरान के साथ समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ने के बावजूद उसके बंदरगाहों पर लगी सैन्य नाकेबंदी फिलहाल नहीं हटाई जाएगी।
अमेरिकी सेना के मुताबिक, समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होने तक ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों पर प्रतिबंध लागू रहेगा। बयान में कहा गया है, "ईरानी बंदरगाहों की सैन्य नाकेबंदी अभी प्रभावी है। इन बंदरगाहों की ओर आने-जाने वाले सभी समुद्री यातायात पर रोक जारी रहेगी।"
अमेरिकी सेना ने जहाजों को चेतावनी देते हुए कहा कि अगला आधिकारिक निर्देश मिलने तक नाकेबंदी वाले क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश न करें।
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने अमेरिका के साथ हुए समझौते को ईरान की जीत करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह समझौता न सिर्फ ईरान बल्कि क्षेत्र में उसके सहयोगियों (हमास, हिजबुल्लाह और हूती विद्रोहियों) के लिए भी सम्मान का दस्तावेज है।
एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए पजशकियान ने कहा कि बातचीत के दौरान कुछ छोटे मतभेद जरूर थे, लेकिन वे समझौते की राह में बड़ी बाधा नहीं बने।
पजशकियान ने दावा किया कि समझौते पर इजराइल की नाराजगी ही इस बात का संकेत है कि ईरान मजबूत स्थिति में रहा। उन्होंने कहा, "इजराइल की प्रतिक्रिया दिखाती है कि जीत हमारी हुई है।"
अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते का स्विट्जरलैंड ने स्वागत किया है। स्विस विदेश मंत्रालय ने इसे पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और स्थिरता बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि क्षेत्र में शांति और सुरक्षा स्विट्जरलैंड की विदेश नीति की प्राथमिकताओं में शामिल है। उनके मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच बनी सहमति तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक पहल है।
स्विट्जरलैंड ने यह भी बताया कि वह अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान और कतर के साथ लगातार संपर्क में है, ताकि इस सप्ताह के अंत में प्रस्तावित समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर कराए जा सकें। हालांकि स्विस अधिकारियों ने हस्ताक्षर समारोह या उससे जुड़ी तैयारियों के बारे में कोई अतिरिक्त जानकारी देने से इनकार किया है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने पहली बार पुष्टि की है कि अमेरिका के साथ हुए समझौते ज्ञापन (MoU) पर शुक्रवार, 19 जून को हस्ताक्षर किए जाएंगे।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा है कि समझौते के तहत होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही का प्रबंधन ईरान और ओमान मिलकर करेंगे।
बघाई ने कहा कि ईरान जहाजों पर कोई अलग टोल टैक्स लगाने की योजना नहीं बना रहा है।
हालांकि, नौवहन सेवाएं, पर्यावरण संरक्षण, बीमा और अन्य समुद्री सुविधाएं उपलब्ध कराने के बदले जरूरी शुल्क वसूला जाएगा।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि अमेरिका को उम्मीद है कि होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक बिना किसी शुल्क के जहाजों के लिए खुला रहेगा।
CNBC को दिए इंटरव्यू में वेंस ने कहा कि इस मुद्दे पर आगे होने वाली तकनीकी बातचीत में फैसला होगा। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष बाघेर गालिबाफ शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में होने वाले हस्ताक्षर समारोह में शामिल होंगे।
उन्होंने दावा किया कि अमेरिका की ईरान के अलग-अलग सत्ता केंद्रों से बात हुई है और आगे की बातचीत के लिए अच्छा संपर्क बना हुआ है। उन्होंने कहा कि अगर ईरान परमाणु वार्ता में रियायत नहीं देता, तो उसे प्रतिबंधों से राहत नहीं मिलेगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही फिर शुरू हो गई है।
ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कई तेल से लदे जहाज अब स्ट्रेट से निकल रहे हैं और दक्षिणी समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित है।
उन्होंने कहा कि जहाजों के लिए अन्य रास्ते भी उपलब्ध हैं।
हिजबुल्लाह ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते का स्वागत किया है। संगठन ने कहा कि इससे लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्धविराम का रास्ता बना है। हम लेबनान की संप्रभुता के उल्लंघन या उसके लोगों को निशाना बनाने वाले किसी भी हमले को स्वीकार नहीं करेंगे।
संगठन ने लेबनान को समझौते में शामिल किए जाने पर ईरान का धन्यवाद भी किया। उसके मुताबिक, यह कदम दिखाता है कि ईरान जंग खत्म करने के पक्ष में है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि ईरान के पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम को निष्क्रिय किया जाना चाहिए और उसे अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में रखा जाना चाहिए।
मैक्रों ने कहा कि बचे हुए यूरेनियम भंडार को या तो देश से बाहर ले जाया जाए या उसे इतना डायल्यूट किया जाए कि उसका इस्तेमाल परमाणु हथियारों के लिए न हो सके। फ्रांस यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करेगा कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर कोई शुल्क न लगाए।
मैक्रों के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही सामान्य बनाए रखने के लिए फ्रांस और ब्रिटेन का संयुक्त मिशन जल्द तैनात किया जा सकता है। फ्रांसीसी एयरक्राफ्ट कैरियर दो से तीन दिनों के भीतर क्षेत्र में पहुंच सकता है।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा है कि लेबनान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता अमेरिका के साथ हुए समझौते की प्रमुख शर्तों में शामिल है।
बघाई ने कहा कि समझौते में सभी मोर्चों पर युद्ध खत्म करने और लेबनान की स्वतंत्रता व उसकी सीमाओं का सम्मान करने पर जोर दिया गया है।
लेबनानी सेना ने विस्थापित लोगों से दक्षिणी गांवों और कस्बों में लौटने की जल्दबाजी न करने की अपील की है। सेना का कहना है कि हालात में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन सुरक्षा जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
सोशल मीडिया पर जारी बयान में सेना ने लोगों से कहा कि वे इलाके में तैनात सैन्य इकाइयों के निर्देशों का पालन करें और सुरक्षा संबंधी सलाह को नजरअंदाज न करें।
सेना ने चेतावनी दी कि दक्षिणी लेबनान में अब भी इजराइली हमलों और सैन्य उल्लंघनों का खतरा बना हुआ है, इसलिए नागरिक सतर्क रहें।
अबू धाबी। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते का स्वागत किया है। UAE के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि यह कदम क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा दे सकता है।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि समझौते के सभी प्रावधानों का पूरी तरह पालन होना चाहिए। साथ ही क्षेत्र में तत्काल और व्यापक स्तर पर संघर्ष विराम लागू करने, देशों की संप्रभुता का सम्मान करने और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने पर जोर दिया।
स्विट्जरलैंड के एक राजनयिक अधिकारी ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते पर हस्ताक्षर समारोह आयोजित करने के लिए अब तक कोई आधिकारिक अनुरोध नहीं मिला है।
एक अधिकारी ने कहा कि इतने कम समय में जेनेवा में ऐसा बड़ा आयोजन करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि पड़ोसी फ्रांस के एवियां में चल रहे G7 शिखर सम्मेलन के लिए कई देशों ने जेनेवा स्थित अपने मिशनों को लॉजिस्टिक केंद्र बना रखा है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर औपचारिक अनुरोध मिलता है, तो स्विट्जरलैंड जरूरी इंतजाम करने में सक्षम है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद होर्मुज स्ट्रेट को बारूदी सुरंगें हटाने के लिए खोल दिया जाएगा। इस बीच अमेरिकी नौसेना के पूर्व रियर एडमिरल मार्क मोंटगोमरी ने BBC से कहा कि स्ट्रेट को पूरी तरह सुरक्षित बनाने में कई हफ्तों से लेकर कई महीने तक लग सकते हैं।
मोंटगोमरी के मुताबिक, जहाजों की आवाजाही शुरू होने के बाद तेल बाजार को पूरी राहत मिलने में करीब दो महीने लग सकते हैं। हालांकि शुरुआती असर और कुछ राहत एक हफ्ते के भीतर दिखाई दे सकती है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरिफ ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते को शांति की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया है।
संसद में संबोधन के दौरान शरीफ ने कहा, “आज युद्ध के अंधेरे के बाद अब शांति का सूरज उगा है।”
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने मिस्र, इराक और तुर्किये के विदेश मंत्रियों से अलग-अलग फोन पर बातचीत की।
ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, बातचीत में अमेरिका-ईरान समझौते पर चर्चा हुई। अराघची ने इजराइल के हमलों और लेबनान में जारी सैन्य कार्रवाई को तुरंत रोकने की जरूरत पर जोर दिया।
बयान के अनुसार, तीनों देशों के विदेश मंत्रियों ने क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा के लिए जारी कूटनीतिक प्रयासों का स्वागत किया।
कुवैत ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते का स्वागत किया है। साथ ही पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थ के रुप में भूमिका की भी सराहना की। कुवैत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि यह समझौता आपसी सम्मान और भरोसा बढ़ाने में मदद करेगा।
मंत्रालय ने यह भी कहा कि देशों के आंतरिक मामलों में दखल न देने, बल प्रयोग से बचने, क्षेत्रीय सहयोगी समूहों को समर्थन रोकने और होर्मुज स्ट्रेट में स्वतंत्रता बनाए रखने जैसे मुद्दों पर आगे प्रगति होनी चाहिए।
अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की घोषणा के बाद ईरानी सेना ने कहा कि हमारी ताकत और जवाबी कार्रवाई के कारण दुश्मनों के पास समझौते की राह अपनाकर झुकने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
सरकारी न्यूज एजेंसी IRNA के मुताबिक, ईरानी सेना का दावा है कि जनता और सैनिकों के मजबूती से डटे रहने की वजह से अमेरिका और इजराइल पीछे हटने पर मजबूर हो गए।
इजराइल के रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने कहा है कि उनकी सेना दक्षिणी लेबनान से पीछे नहीं हटेगी। उन्होंने कहा कि लेबनान, सीरिया और गाजा में बनाए गए सुरक्षा क्षेत्रों में इजराइली सेना अनिश्चितकाल तक तैनात रहेगी।
काट्ज ने कहा कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी सरकार की नीति स्पष्ट है। सेना इन इलाकों में बनी रहेगी ताकि इजराइल की सीमाओं और वहां रहने वाले लोगों को जिहादी गुटों से सुरक्षित रखा जा सके।
उन्होंने कहा कि इन सुरक्षा क्षेत्रों से स्थानीय निवासियों को हटाया जाएगा और जमीन के ऊपर तथा नीचे मौजूद सभी आतंकी ढांचों को नष्ट किया जाएगा। सीमा से सटे गांवों में जिन घरों का इस्तेमाल आतंकी ठिकानों के रूप में हुआ, उन्हें भी ध्वस्त किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि नेतन्याहू ने यह बात अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को भी साफ कर दी है। उन्होंने खुद अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ से इस मुद्दे पर बात की है।
भारत अमेरिका और ईरान के बीच पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त करने को लेकर बनी सहमति का स्वागत करता है। इस संघर्ष के कारण दुनिया भर में गंभीर आर्थिक परेशानी पैदा हुई और कई देशों में लोगों की जान गई।
भारत को उम्मीद है कि इस सहमति को लागू करने से क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाल होगी तथा समुद्री मार्गों पर व्यापार और जहाजों की आवाजाही सामान्य रूप से जारी रह सकेगी।
हमें उम्मीद है कि बाकी बचे मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ेगी और आखिरकार एक स्थायी समझौते तक पहुंचा जाएगा।
अमेरिका-ईरान समझौते की घोषणा के बाद दक्षिणी लेबनान के कई निवासी अपने गांवों की ओर लौटते दिखाई दिए। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि इजराइली सेना (IDF) सभी लोगों को वापस लौटने की अनुमति देगी या नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक, अलग-अलग गांवों में नियम अलग हो सकते हैं और कुछ इलाकों में लोगों की वापसी पर अब भी पाबंदियां रह सकती हैं।
अमेरिकी और ईरानी समझौते में लेबनान का जिक्र होने के बावजूद इजराइल दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना नहीं हटाएगा। द जेरूसलम पोस्ट के मुताबिक, इजराइली सेना से जुड़े एक सूत्र ने कहा कि ईरान की मांगों के बावजूद इस मुद्दे पर इजराइल का रुख नहीं बदलेगा।
इससे पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा था कि अमेरिका-ईरान समझौते में लेबनान भी शामिल है और यहां पर सैन्य कार्रवाई को तुरंत रोकने पर सहमति बनी है। हालांकि समझौते के अंतिम रूप लेने से कुछ घंटे पहले ही इजराइल ने बेरूत के दहियेह इलाके पर हमला किया था।
हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई। उन्होंने इसे तुरंत रोकने को कहा था।
इजराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतमार बेन ग्वीर ने अमेरिका-ईरान पीस डील पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का यह समझौता इजराइल पर लागू नहीं होता और इजराइल इसकी शर्तों का हिस्सा नहीं है।
बेन ग्वीर ने कहा-
इजराइल अमेरिका के अधीन नहीं है। हम एक आजाद और संप्रभु देश हैं। वह इस समझौते का पक्षकार नहीं है और यह देश की सुरक्षा की गारंटी नहीं देता।
ग्विर के मुताबिक, इजराइली सेना ने दक्षिणी लेबनान में जिन इलाकों पर कब्जा किया है, वहां से पीछे नहीं हटना चाहिए।
ईरान के साथ पीस डील के ऐलान के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने व्हाइट हाउस के साउथ लॉन में अल्टीमेट फाइटिंग चैम्पियनशिप यानी UFC मुकाबला देखा।
ट्रम्प के जन्मदिन पर हो रहे इस आयोजन पर UFC ने इस करीब 6 करोड़ डॉलर (567 करोड़ रुपए) खर्च किए। ये अब तक का सबसे महंगा UFC आयोजन माना जा रहा है।
इजराइल की डेमोक्रेट्स पार्टी के चीफ याइर गोलान ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते की आलोचना करते हुए इसे इजराइल के लिए खराब बताया है।
गोलान ने कहा कि इजराइली वायुसेना और सैनिकों ने जो सैन्य सफलताएं हासिल की थीं, वे इस समझौते के बाद बेकार हो गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस पूरी प्रक्रिया में कमजोर, अलग-थलग और बेअसर नजर आए।
उन्होंने कहा कि यह कई वर्षों की नाकामियों का नतीजा है। नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ जीत का वादा किया था लेकिन हालात ऐसे बने कि वह पहले से ज्यादा मजबूत हो चुका है और इजराइल की स्थिति कमजोर हो गई है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में सोमवार से शुरू हो रहे G7 समिट में अमेरिका और ईरान के बीच हुए प्रारंभिक समझौते के बाद के हालात पर चर्चा होगी।
15 से 17 जून तक चलने वाले इस समिट में UAE, कतर और मिस्र भी शामिल होंगे। रिपोर्ट के मुताबिक G7 देश यह समझने की कोशिश करेंगे कि अमेरिका-ईरान समझौते को कैसे लागू किया जाएगा और इसका पश्चिम एशिया की सुरक्षा, ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या असर पड़ेगा।
अमेरिका के डेमोक्रेट सांसद क्रिस मर्फी ने कहा है कि अगर ईरान के साथ कोई अंतिम समझौता होता है, तो वह तेहरान के सामने ‘सरेंडर’ जैसा लगेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे समझौते का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि युद्ध जारी रहने से अमेरिका और कमजोर होगा।
मर्फी का कहना है कि मौजूदा हालात में लंबी जंग अमेरिका के हितों को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी। इसलिए अगर समझौते के जरिए संघर्ष खत्म होता है, तो यह विकल्प युद्ध जारी रखने से बेहतर होगा।
ईरान की फुटबॉल टीम विश्व कप खेलने के लिए अमेरिका पहुंच गई है। जब दोनों देश पीस डील का ऐलान कर रहे थे, तभी ईरानी टीम लॉस एंजिलिस पहुंची। ईरान मंगलवार को न्यूजीलैंड के खिलाफ अपना पहला मैच खेलेगा।
पीस डील के ऐलान से युद्ध बढ़ने की आशंका तो कम हुई हैं, लेकिन टीम से जुड़ा विवाद अभी भी खत्म नहीं हुआ है।
ईरान के स्ट्राइकर मेहदी तारेमी ने कहा कि दोनों देशों के बीच तनाव का असर टीम पर पड़ा है। टीम की तैयारियां भी प्रभावित हुई हैं। वीजा संबंधी दिक्कतों की वजह से ईरानी टीम को अपना विश्व कप बेस कैंप अमेरिका की बजाय मेक्सिको में बनाना पड़ा।
जब ईरान की टीम लॉस एंजिलिस में मैदान पर उतरेगी, तब शहर में रहने वाले बड़ी संख्या में ईरानी मूल के लोग विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि खिलाड़ियों का कहना है कि उनका मकसद राजनीति नहीं, बल्कि फुटबॉल के जरिए ईरानियों को एकजुट करना है।
ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच तैयार किए गए 14 पॉइंट वाले मसौदे (MoU) के तहत अमेरिका बातचीत शुरू होने से पहले ईरान की 12 अरब डॉलर की जमी हुई संपत्तियां जारी करेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, समझौते में 60 दिन की बातचीत के दौरान कुल 24 अरब डॉलर की ईरानी संपत्तियां जारी करने का प्रावधान है। इनमें से आधी रकम, यानी 12 अरब डॉलर, बातचीत शुरू होने से पहले ईरान को उपलब्ध कराई जाएगी।
मेहर के अनुसार, MoU पर हस्ताक्षर के बाद 60 दिन की नई बातचीत शुरू होगी, जिसमें परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और अन्य लंबित मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा रहा है। ईरान लगातार दावा करता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और इसका मकसद बिजली उत्पादन के अलावा जरूरी नागरिक जरूरतें हैं। लेकिन अमेरिका और इजराइल इस दावे को नहीं मानते। उनका कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहा है।
2015 का परमाणु समझौता क्या था?
2015 में हुए परमाणु समझौते के तहत ईरान ने यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) का स्तर 3.67% तक सीमित रखने पर सहमति दी थी।
3.67% संवर्धित यूरेनियम का इस्तेमाल परमाणु बिजलीघरों के ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
परमाणु हथियार बनाने के लिए आमतौर पर 90% या उससे अधिक संवर्धित यूरेनियम की जरूरत होती है।
ट्रम्प के फैसले के बाद क्या बदला?
2018 में ट्रम्प ने अमेरिका को 2015 के परमाणु समझौते से बाहर निकाल लिया।
इसके बाद ईरान ने धीरे-धीरे यूरेनियम संवर्धन का स्तर बढ़ाना शुरू कर दिया।
ईरान ने खुले तौर पर 3.67% की सीमा से ऊपर जाना शुरू किया।
ईरान कितनी दूर पहुंच गया था?
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के मुताबिक जून 2025 तक ईरान 60% तक यूरेनियम संवर्धन कर रहा था।
उसके पास 60% संवर्धित यूरेनियम का करीब 400 किलोग्राम भंडार था।
यह स्तर परमाणु हथियार के लिए जरूरी 90% से नीचे है, लेकिन नागरिक उपयोग के लिए जरूरी स्तर से काफी ज्यादा है।
अमेरिका के साथ पीस डील को लेकर ईरान में कट्टरपंथी धड़ा आलोचना कर रहा है। इसे लेकर राष्ट्रपति मसदू पजशकियान ने एक्स पर एक पोस्ट लिखा।
उन्होंने लिखा-
यह अफसोस की बात है कि देश के लिए काम कर रहे लोगों को गद्दार कहा जा रहा है। आलोचना करना लोगों का अधिकार है, लेकिन जो लोग कानून के तहत देश के हित में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, उन्हें बदनाम करना सही नहीं है।
अमेरिका और ईरान दोनों के लिए यह पीस डील राहत की तरह है। BBC के मुताबिक अमेरिका-ईरान के बीच समझौता ऐसे समय में हुआ है जब दोनों पक्षों पर दबाव लगातार बढ़ रहा था।
एक तरफ अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं, जिसका असर महंगाई पर पड़ रहा था। दूसरी तरफ ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से प्रतिबंधों की मार झेल रही थी। ऊपर से अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के कारण उसके बंदरगाहों और व्यापार पर और ज्यादा दबाव पड़ रहा था।
दोनों पक्ष अपनी-अपनी जनता के सामने इसे जीत के रूप में पेश करना चाहते हैं। इसके लिए ट्रम्प को ऐसा समझौता चाहिए जिसमें ईरान कम से कम 20 वर्षों तक परमाणु संवर्धन (यूरेनियम एनरिचमेंट) न करने की गारंटी दे।
वहीं ईरान की सबसे बड़ी मांग व्यापक प्रतिबंध राहत और विदेशों में फंसे अरबों डॉलर के तेल राजस्व तक पहुंच हासिल करना है।
इजराइल ने अब तक अमेरिका-ईरान के बीच हुए समझौते पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। टाइम्स ऑफ इजराइल की रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारी इस डील को लेकर बहुच चिंतित हैं।
इजराइल ने अमेरिका के साथ मिलकर युद्ध शुरू किया था, लेकिन समझौते पर हुई बातचीत में उसे शामिल नहीं किया गया। यही वजह है कि समझौते की कई शर्तों को लेकर इजराइल असहज माना जा रहा है।
रिपोर्टों के मुताबिक समझौते में शामिल प्रावधान उन प्रमुख मकसदों को पूरा नहीं करते, जिन्हें अमेरिका और इजराइल ने युद्ध शुरू करते समय तय किया था।
तब अमेरिका-इजराइल का मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करना, उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को कमजोर करना, ईरान के प्रॉक्सी संगठनों को मिलने वाली फंडिंग और हथियार मुहैया बंद कराना और ईरानी शासन पर इतना दबाव बनाना शामिल था कि सत्ता में बदलाव की स्थिति पैदा हो सके।
CNN ने सूत्रों के हवाले बताया है कि अमेरिका और ईरान के अधिकारी समझौते पर डिजिटल तरीके से हस्ताक्षर कराने की तैयारी कर रहे हैं। उनका मानना है कि आमने-सामने बैठक कराने में सुरक्षा और व्यवस्थाओं से जुड़ी कई मुश्किलें आ सकती हैं। साथ ही, ऐसी बैठक से बातचीत के बीच में अटकने या समझौता पटरी से उतरने का जोखिम भी बढ़ सकता है।
एक अमेरिकी अधिकारी ने शुक्रवार को बताया कि मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर होने के बाद बातचीत का नया 60 दिन का चरण शुरू होगा। इस दौरान दोनों पक्ष इस बात पर चर्चा करेंगे कि समझौते की शर्तों को जमीन पर कैसे लागू किया जाए और बाकी बचे विवादित मुद्दों को कैसे सुलझाया जाए।
ट्रम्प ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा कि समझौते पर या तो वह इलेक्ट्रॉनिक तरीके से हस्ताक्षर करेंगे या फिर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस व्यक्तिगत रूप से हस्ताक्षर करेंगे।
इससे पहले जेडी वेंस ने फॉक्स न्यूज से कहा कि जेनेवा में साइनिंग प्रोग्राम को लेकर अभी काम चल रहा है। वह खुद वहां जा सकते हैं। सब कुछ ठीक रहा तो खुद राष्ट्रपति भी वहां ट्रम्प भी वहां जा सकते हैं।
अमेरिकी सेना को निर्देश मिला है कि अगर शुक्रवार को ईरान के साथ पीस डील (MoU) पर साइन हो जाते हैं, तो उसी दिन होर्मुज स्ट्रेट में जारी अमेरिकी नाकेबंदी हटा दी जाए। यह जानकारी एक अमेरिकी अधिकारी ने दी है।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने रविवार को समझौते की घोषणा करते हुए कहा था कि वह ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को तुरंत हटाने की मंजूरी दे रहे हैं। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि होर्मुज स्ट्रेट शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद खोला जाएगा, ताकि वहां मौजूद संभावित बारूदी सुरंगों को हटाया जा सके।
अमेरिका ने यह नौसैनिक नाकेबंदी अप्रैल के मध्य में लगाई थी, जब युद्ध शुरू हुए करीब छह सप्ताह हो चुके थे। हालांकि अमेरिकी अधिकारी ने यह भी कहा कि फिलहाल यही योजना है, लेकिन शुक्रवार तक हालात बदल भी सकते हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की शर्तों को लेकर नया विवाद सामने आ गया है। अमेरिका ने ईरान के उस दावे को खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद 60 दिन की वार्ता शुरू होने से पहले ईरान को उसके जमे हुए अरबों डॉलर के फंड जारी कर दिए जाएंगे।
एक अमेरिकी अधिकारी ने CNN से कहा, "यह पूरी तरह गलत है। जब तक ईरान अपनी कमिटमेंट को लागू नहीं करेगा, तब तक कोई भी फंड जारी नहीं किया जाएगा।"
अमेरिका की यह प्रतिक्रिया ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगले चरण की बातचीत तभी शुरू होगी जब वॉशिंगटन पहले अपने कई वादे पूरे करेगा। इनमें ईरान के विदेशों में फ्रीज्ड 24 अरब डॉलर के फंड जारी करना भी शामिल है।
दोनों देशों के बयानों से साफ है कि समझौते की व्याख्या को लेकर अभी भी मतभेद बने हुए हैं। ईरान का कहना है कि अमेरिका को पहले अपने वादे पूरे करने होंगे, जबकि अमेरिका का कहना है कि पहले ईरान को अपनी कमिटमेंट पर अमल करना होगा।
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने के समझौते की घोषणा के बाद एशिया-प्रशांत क्षेत्र के शेयर बाजारों में बहुत तेजी देखी गई।
जापान का प्रमुख शेयर सूचकांक निक्केई 225 सुबह के कारोबार में 5% से ज्यादा उछल गया। दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स 5.7% चढ़ा।
ताइवान का ताइएक्स 2.7% बढ़ा, जबकि ऑस्ट्रेलिया का ASX 200 करीब 1.5% मजबूत हुआ।
अमेरिकी शेयर बाजारों के फ्यूचर्स में भी तेजी रही। S&P 500 से जुड़े फ्यूचर्स करीब 1% और तकनीकी कंपनियों पर आधारित नैस्डैक फ्यूचर्स 1.6% तक चढ़ गए।
अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते का दुनिया के कई देशों और नेताओं ने स्वागत किया है।
कतर के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने उम्मीद जताई कि सभी पक्ष अच्छी भावना के साथ आगे बढ़ेंगे, ताकि शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने इस समझौते को एक अहम कदम बताया।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब समेत मध्यस्थता में शामिल देशों की सराहना की।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने समझौता ज्ञापन को जल्द और पूरी तरह लागू करने की अपील की।
तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन ने भी समझौते का स्वागत किया, लेकिन साथ ही सभी पक्षों से तनाव बढ़ाने वाले बयानों, उकसावे वाली गतिविधियों और किसी भी भड़काऊ कार्रवाई से बचने की अपील की।
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीजी ने सभी पक्षों से इस अवसर का उपयोग बातचीत और कूटनीति के जरिए स्थायी शांति स्थापित करने के लिए करने की अपील की।
अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अगर ईरान समझौते की शर्तों का पालन करता है, तो अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह समझौता अगले 50 वर्षों के लिए मिडिल ईस्ट की तस्वीर बदल सकता है।
फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में वेंस ने कहा कि इस समझौते का सबसे बड़ा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ईरान के पास कभी परमाणु हथियार न हो। उन्होंने कहा कि समझौते के जरिए ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने, हासिल करने या खरीदने की किसी भी कोशिश से रोका जाएगा।
वेंस ने यह भी बताया कि ट्रम्प सरकार अभी यह तय कर रही है कि 19 जून को जिनेवा में होने वाले समझौते के हस्ताक्षर समारोह में कौन-कौन शामिल होगा। उन्होंने कहा, "मेरा वहां जाने का पूरा इरादा है, लेकिन यह भी संभव है कि राष्ट्रपति ट्रम्प खुद समारोह में मौजूद रहें।"
ईरानी सरकारी मीडिया मेहर न्यूज के अनुसार, दोनों देशों के बीच पीस डील का मसौदा 14 प्वाइंट्स का है। हालांकि व्हाइट हाउस ने अभी तक MoU के डिटेल्स पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
ट्रम्प का कहना है कि ईरान के साथ युद्ध रोकने का समझौता हो गया है, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है। उनके मुताबिक आने वाले हफ्तों में ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम पर ऐसा समझौता करना होगा जिससे अमेरिका संतुष्ट हो। अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिका फिर से सख्त कदम उठा सकता है।
न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए फोन इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा कि पहला ऑप्शन यह होगा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू कर दे। या फिर दूसरा ऑप्शन यह होगा कि अमेरिका ‘मिडिल ईस्ट का संरक्षक’ बन जाएगा। इसके बदले अमेरिका, मिडिल ईस्ट की आय का 20% हिस्सा लेगा।
हालांकि ट्रम्प ने यह नहीं बताया कि यह व्यवस्था व्यवहार में कैसे लागू होगी। मिडिल ईस्ट कोई एक देश नहीं है, बल्कि कई देशों का एक इलाका है। इसलिए पूरे क्षेत्र की आय का 20% लेने का कोई मौजूदा अंतरराष्ट्रीय ढांचा नहीं है। न ही किसी अरब देश या खाड़ी देश ने ऐसे किसी प्लान का समर्थन किया है।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने रविवार को कहा कि ईरान के साथ हुए समझौते से आखिरकार यह तय होगा कि होर्मुज स्ट्रेट हमेशा के लिए बिना किसी टैक्स के खुला रहेगा। न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक फोन इंटरव्यू में ट्रम्प ने इस अहम समुद्री मार्ग के दोबारा खुलने को समझौते की बड़ी उपलब्धि बताया।
हालांकि युद्ध शुरू होने से पहले भी ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर कोई टोल या टैक्स नहीं लगाता था। इसलिए ट्रम्प जिस टोल-फ्री सिस्टम की बात कर रहे हैं, वह वास्तव में युद्ध से पहले की सामान्य स्थिति को बहाल करने जैसा है, कोई नई व्यवस्था नहीं।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। युद्ध से पहले दुनिया के करीब 20% तेल और बड़ी मात्रा में गैस की आपूर्ति इसी रास्ते से होती थी। संघर्ष के दौरान यह मार्ग वैश्विक बाजारों के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन गया था। इसी वजह से इसके दोबारा खुलने को तेल बाजार और वैश्विक व्यापार के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा है।
अमेरिका-ईरान ने करीब 107 दिन बाद युद्ध खत्म करने के लिए शांति समझौते पर सहमति जताई है। इस घोषणा के बाद इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में 4% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई।
सोमवार को एशियाई कारोबार के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली। क्रूड ऑयल का भाव 4.39 फीसदी टूटकर 81.15 डॅालर प्रति बैरल पर आ गया।
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक दोनों देश इस समझौते को अपनी-अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करना चाहते हैं। लेकिन कई सबसे कठिन मुद्दे अब भी हल नहीं हुए हैं। इनमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य और तेहरान पर लगे प्रतिबंधों में राहत जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन पर आगे की बातचीत में फैसला किया जाएगा।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने अपने बयान में कहा कि समझौते के तहत सभी मोर्चों पर सैन्य अभियान तुरंत रोके जाएंगे। इसमें लेबनान भी शामिल है, जहां इजराइल और ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्लाह के बीच लड़ाई चल रही है। अमेरिका-ईरान वार्ता का हिस्सा नहीं रहे इजराइल ने अभी तक इस समझौते पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
रविवार को दिन में ऐसा लग रहा था कि समझौता खतरे में पड़ सकता है। इसकी वजह इजराइल का लेबनान पर हमला करना था।
ईरान नहीं चाहता था कि अमेरिका के साथ हुए समझौते का ऐलान ट्रम्प के जन्मदिन पर हो। इसलिए उसने घोषणा को कुछ घंटों के लिए टाल दिया।
आखिरकार समझौते की घोषणा ईरान में आधी रात के कुछ मिनट बाद की गई। इससे ईरान में तारीख सोमवार हो गई, जबकि अमेरिका में अभी भी रविवार था। यानी ट्रम्प के जन्मदिन पर समझौते का ऐलान होने से ईरान ने काफी हद तक बचाव कर लिया।
Vivek Singh