भागीरथपुरा दूषित पानी मामला: मौतें 29, हाईकोर्ट ने सरकारी रिपोर्ट को आई-वॉश कहा
दूषित पानी से एक और मौत, आंकड़ा 29 पर पहुंचा
इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी से जुड़ी मौतों का सिलसिला जारी है। मंगलवार को 63 वर्षीय खूबचंद की मौत हो गई, जिससे क्षेत्र में संदिग्ध रूप से दूषित पानी से जुड़ी मौतों की संख्या 29 हो गई है। परिजनों के अनुसार, खूबचंद पिछले 15 दिनों से उल्टी-दस्त से पीड़ित थे और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से इलाज के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
हाईकोर्ट में लंबी सुनवाई, सरकारी रिपोर्ट पर सख्त टिप्पणी
भागीरथपुरा मामले में दायर जनहित याचिकाओं पर इंदौर हाईकोर्ट की खंडपीठ में ढाई घंटे से अधिक समय तक सुनवाई हुई। शासन की ओर से अदालत में 23 मौतों की रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें 16 मौतें दूषित पानी से होने की बात कही गई, 4 मौतों को लेकर असमंजस व्यक्त किया गया और 3 मौतों को दूषित पानी से असंबंधित बताया गया।
न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने इस रिपोर्ट को अविश्वसनीय करार देते हुए कहा कि इसे केवल ‘आई-वॉश’ माना जा सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि रिपोर्ट में मौतों के स्पष्ट कारण दर्ज नहीं हैं और पर्याप्त वैज्ञानिक तथा दस्तावेजी आधार का अभाव है।
मौतों के आंकड़ों पर विरोधाभास और ‘वर्बल ऑटॉप्सी’ पर सवाल
अदालत के सामने प्रस्तुत आंकड़ों में गंभीर विरोधाभास सामने आया। जहां सरकारी रिपोर्ट में 16 मौतों को जलजनित बीमारी से जोड़ा गया, वहीं याचिकाकर्ताओं ने करीब 30 मौतों का दावा किया। अदालत ने रिपोर्ट में प्रयुक्त ‘वर्बल ऑटॉप्सी’ शब्द पर आपत्ति जताते हुए पूछा कि यह कोई मान्य चिकित्सीय शब्द है या अधिकारियों द्वारा गढ़ा गया शब्द है।
स्वतंत्र जांच आयोग का गठन
हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति से जुड़ा बताते हुए रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एकल सदस्यीय स्वतंत्र जांच आयोग गठित करने के निर्देश दिए हैं। आयोग को सिविल कोर्ट जैसे अधिकार दिए जाएंगे और उसे चार सप्ताह के भीतर अपनी अंतरिम रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करनी होगी।
जल गुणवत्ता जांच और स्वास्थ्य शिविर जारी रखने का आदेश
कोर्ट ने आदेश दिया कि भागीरथपुरा क्षेत्र में दैनिक जल गुणवत्ता जांच और नियमित स्वास्थ्य शिविर लगातार जारी रखे जाएं। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 5 मार्च 2026 की तारीख तय की है।
पानी की टेस्टिंग मानकों पर भी सवाल
नगर निगम की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि पानी की टेस्टिंग की जा रही है। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि निगम केवल 8 मानकों पर पानी की जांच कर रहा है, जबकि वर्ष 2018 में मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने भागीरथपुरा सहित इंदौर के पानी की 34 मानकों पर जांच की थी और पानी को फीकल कंटामिनेटेड पाया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि जब क्षेत्र में अनेक मौतें हो चुकी हैं, तब केवल 8 पैरामीटर पर टेस्टिंग करना पर्याप्त नहीं है और निगम ने जांच की पद्धति भी स्पष्ट नहीं की।
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष विश्वस्तरीय तीन पैरामीटर्स पर पानी की टेस्टिंग के तीन तरीके भी रखे।
मुआवजे पर अदालत की चिंता
मुआवजे के मुद्दे पर याचिकाकर्ता ने बताया कि मृतकों के परिजनों को दी गई 2-2 लाख रुपये की राशि रेडक्रॉस सोसायटी द्वारा दी जा रही है और शासन की ओर से अभी तक कोई मुआवजा नहीं दिया गया। यह भी कहा गया कि अन्य हादसों में शासन 4-4 लाख रुपये तक का मुआवजा देती है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। अदालत ने इस मुद्दे को भी जांच के दायरे में शामिल करने के संकेत दिए हैं।
पिछली सुनवाई में कारणों पर उठे थे सवाल
इससे पहले 20 जनवरी को हुई पिछली सुनवाई में भी घटना के कारणों को लेकर कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया था। तब शासन की ओर से पानी दूषित होने का कारण पास स्थित पुलिस चौकी के टॉयलेट को बताया गया था, जिस पर अदालत ने सवाल किया था कि क्या मात्र इसी कारण से पानी इतनी मात्रा में दूषित हो सकता है कि लोगों की जान चली जाए। अदालत ने यह भी पूछा था कि क्या पानी में किसी केमिकल के पाए जाने के सबूत हैं।
शासकीय अधिवक्ता ने संभावित कारणों में से एक के रूप में कुछ स्थानों पर बोरवेल का पानी दूषित होने और उसके मुख्य जल लाइन में मिलने की बात कही थी। दूसरी ओर, वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बगड़िया ने दलील दी थी कि भागीरथपुरा कान्ह नदी के किनारे स्थित है, जहां से दूषित पानी बोरिंग में गया और फिर सीवरेज तथा नर्मदा लाइन में मिल गया, जिससे यह स्थिति बनी। हालांकि, अभी तक अदालत के समक्ष इस पूरे प्रकरण का कोई ठोस और निर्णायक कारण प्रस्तुत नहीं किया जा सका है।
मौतों पर विवाद और विरोध प्रदर्शन
भागीरथपुरा में अब तक कई मौतों को लेकर विवाद बना हुआ है। कांग्रेस नेता राजाराम बोरासी की मौत को लेकर परिजनों ने दावा किया था कि उनकी जान दूषित पानी के कारण गई, जबकि स्वास्थ्य विभाग ने मेडिकल रिपोर्ट जारी कर इस दावे से इनकार कर दिया था। विरोधस्वरूप परिजनों ने 24 जनवरी को अर्थी रखकर प्रदर्शन किया, जिसमें स्थानीय नेताओं की मौजूदगी भी रही।
इसी तरह, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन ने कुछ अन्य मृतकों की मौत को डायरिया से हुई मौत मानने से इनकार किया है। इन मामलों ने भी स्थानीय स्तर पर असंतोष और अविश्वास का माहौल पैदा किया है।
स्थानीय आक्रोश और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
दूषित पानी से हुई कथित मौतों के बाद क्षेत्र में कई बार विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं। एक मामले में मृतक बद्री प्रसाद के परिजनों ने भागीरथपुरा पुल के पास शव रखकर चक्काजाम किया और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के खिलाफ नारेबाजी की। इन घटनाओं ने पूरे मामले पर राजनीतिक और सामाजिक बहस को और तेज कर दिया है।
निष्कर्ष: अदालत की निगरानी में आगे की जांच
इंदौर हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान सरकारी रिपोर्टें इस गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का पर्याप्त और विश्वसनीय चित्र प्रस्तुत नहीं करतीं। स्वतंत्र जांच आयोग के गठन, विस्तृत जल गुणवत्ता परीक्षण, नियमित स्वास्थ्य शिविर और मुआवजे की जांच जैसे कदम अब न्यायिक निगरानी में आगे बढ़ेंगे। अगली सुनवाई में आयोग की अंतरिम रिपोर्ट और शासन के कदमों पर अदालत आगे की दिशा तय करेगी।
Janmejay Chaturvedi