कांग्रेस के नाथ और राजा:कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच आखिर दरार क्यों..(गीत दीक्षित की दो टूक)

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कांग्रेस के नाथ और राजा:कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच आखिर दरार क्यों..(गीत दीक्षित की दो टूक)

अपने-अपने बेटों को राजनीति में लाने के लिए पूरा जोर लगा रहे दिग्गज .. नाथ और दिग्गी की "दोस्ती" में क्यों पड़ी "दरार!" भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस में इन दिनों राजनीति सिर्फ विरोधियों से नहीं, भीतर के असंतोष से भी लड़ी जा रही है। हाल ही में वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा एक पॉडकास्ट में पांच साल पुरानी ‘बंद कमरे’ की बातचीत को सार्वजनिक करना, ना केवल एक निजी बात को सार्वजनिक करने का मामला है, बल्कि इसके राजनीतिक निहितार्थ भी गहरे हैं। दिग्विजय ने सीधे-सीधे कहा कि 2020 में कांग्रेस सरकार गिरने के लिए वह नहीं, बल्कि कमलनाथ ज़िम्मेदार थे, क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया को उन्होंने ही पार्टी से दूर किया। इस बयान ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में एक बार फिर भूचाल ला दिया है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की दोस्ती कोई सामान्य राजनीतिक रिश्ता नहीं थी, बल्कि लगभग 45 साल पुराना साथ था। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि दोनों एक-दूसरे पर सार्वजनिक मंचों से तीखे हमले कर रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण पार्टी में घटता-बढ़ता प्रभाव भी है। कमलनाथ विधानसभा और लोकसभा चुनाव में हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष पद गंवा चुके हैं, और उनके बेटे नकुलनाथ को भी कोई संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं मिली है। वहीं दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन को राहुल गांधी ने जिलाध्यक्ष बनाकर एक स्पष्ट संदेश दिया है। राजनीतिक सक्रियता के मामले में भी दिग्विजय सिंह पूरी तरह मैदान में हैं—चाहे आदिवासियों के हक की बात हो या किसी कार्यकर्ता के समर्थन में न्याय यात्रा। दूसरी ओर कमलनाथ अब अपने गढ़ छिंदवाड़ा तक सीमित नजर आते हैं। यही कारण है कि अब दोनों नेता न केवल खुद के लिए, बल्कि अपने-अपने बेटों के लिए भी संगठन और राजनीति में जगह बनाने की होड़ में हैं। सिंधिया प्रकरण को दोबारा हवा देना भी एक सोचा-समझा राजनीतिक दांव माना जा रहा है, ताकि नेतृत्व की विफलता की जिम्मेदारी किसी और पर डाली जा सके। यह बयान राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व को यह संकेत देने का प्रयास भी हो सकता है कि नेतृत्व में बदलाव की जरूरत है। मध्य प्रदेश कांग्रेस पहले ही भारी राजनीतिक दबाव और जनाधार की कमी से जूझ रही है। ऐसे में शीर्ष नेताओं की आपसी टकराहट पार्टी को और अधिक कमजोर कर सकती है। सवाल यह है कि क्या यह टकराव स्थायी विभाजन में बदलेगा या कोई मध्य रास्ता निकलेगा?