मध्य प्रदेश में जहरीले कफ सिरप कांड का हैरान करने वाला खुलासा

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मध्य प्रदेश में जहरीले कफ सिरप कांड का हैरान करने वाला खुलासा

मध्य प्रदेश में जहरीले कफ सिरप कांड का खुलासा

मध्य प्रदेश के परासिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 25 बच्चों की मौत का कारण बने कोल्ड्रिफ कफ सिरप से जुड़ा एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस मामले में आरोपी डॉक्टर प्रवीण सोनी ने कोर्ट में दिए गए मेमोरेंडम बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने कमीशन के बदले इस दवा को प्रिस्क्राइब किया था। इसके अलावा, कई दवाइयां डॉक्टर की पत्नी और भतीजे की दुकान पर बेची जाती थीं, जिससे मासूमों के स्वास्थ्य के साथ समझौता किया गया।

वकील का तर्क और डॉक्टर का बचाव

डॉ. प्रवीण सोनी के वकील ने कोर्ट में यह दावा किया कि उनके मुवक्किल निर्दोष हैं और उन्हें तकनीकी आधार पर फंसाया गया है। वकील ने कहा कि इस दवा की विशेष खेप में निर्माता कंपनी द्वारा अमानक पदार्थ मिलाया गया था, जिसकी जानकारी डॉक्टर को नहीं थी। कोर्ट को बताया गया कि डॉक्टर ने करीब 35-40 साल से मेडिकल प्रैक्टिस की है और जानबूझकर गलत दवा प्रिस्क्राइब नहीं की। उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को भी बिना पर्याप्त आधार का बताया गया।

सरकारी वकील का विरोध और कोर्ट का फैसला

हालांकि, सरकारी वकील ने डॉक्टर की जमानती याचिका पर ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि डॉक्टर को यह जानकारी थी कि फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (FDC) वाली दवाएं 4 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को नहीं दी जानी चाहिए, फिर भी उन्होंने इसे जारी रखा। सरकारी वकील ने यह भी बताया कि डॉक्टर ने कंपनी से 10% कमीशन लेने की बात स्वीकार की है और दवा के स्टॉकिस्ट उनके परिवार के सदस्य थे।

सरकारी वकील के तर्कों के बाद कोर्ट ने डॉक्टर की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि घटना की जानकारी होने के बावजूद डॉक्टर ने संबंधित दवा का उपयोग जारी रखा, जो स्वास्थ्य महानिदेशालय द्वारा जारी गाइडलाइन का उल्लंघन है। यह अपराध गंभीर प्रकृति का है, और जांच अभी पूरी नहीं हुई है। कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि अभियुक्त साक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है।

जांच का दायरा बढ़ा

मध्य प्रदेश में जहरीले कफ सिरप कांड की जांच अब दवा कंपनी के मालिक, डॉक्टर, होलसेलर और केमिस्ट तक पहुंच गई है। खाद्य और औषधि प्रशासन विभाग (FDA) ने एक रिपोर्ट पुलिस को सौंपी है, जिसमें दवा दुकानदारों पर सबूत छिपाने का आरोप लगाया गया है। पुलिस अब इन लोगों को मामले में सह-आरोपी बनाने की तैयारी कर रही है।

निष्कर्ष

यह मामला न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश में चिकित्सा जगत के लिए एक चेतावनी है। डॉक्टर द्वारा कमीशन के बदले दवा प्रिस्क्राइब करना एक गंभीर नैतिक और कानूनी उल्लंघन है। कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच पूरी होने तक जमानत देने से इनकार कर दिया। यह घटना बताती है कि स्वास्थ्य प्रणाली में पारदर्शिता और नैतिकता बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है।