मध्य प्रदेश की राज्यसभा की तीसरी सीट पर भाजपा के उम्मीदवार उतारने के फैसले से चुनाव की स्थिति बन गई है.. तो इसका असर केवल राज्यसभा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसकी राजनीतिक गूंज विधानसभा तक सुनाई दे सकती है, कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले का संकेत दे दिया है, जबकि भाजपा ने अब तक उम्मीदवार के नाम से बचते हुए अपने अंतिम पत्ते खोलने से पहले चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया है.. नाम वापस लेने के बाद स्थिति स्पष्ट होगी ,ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि मतदान की नौबत आती है और कांग्रेस या अन्य दलों के विधायक क्रॉस वोटिंग करते हैं अथवा पार्टी व्हिप और अनुशासन के खिलाफ जाते हैं, तो क्या प्रदेश में नए विधानसभा उपचुनावों का रास्ता खुल सकता है? इससे अब इंकार नहीं किया जा सकता..यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दतिया विधानसभा सीट से जुड़े मामले पर न्यायालय में सुनवाई चल रही है और जुलाई तक स्थिति स्पष्ट होने की संभावना जताई जा रही है..दूसरी ओर, मोहन सरकार के गठन के बाद हुए विजयपुर और बुधनी उपचुनावों ने यह संकेत दिया है कि उपचुनाव अब पहले जैसे एकतरफा नहीं रह गए हैं, बुधनी में भाजपा ने जीत दर्ज की, लेकिन जीत का अंतर अपेक्षा से कम रहा,विजयपुर में मंत्री रहते रामनिवास रावत को हार का सामना करना पड़ा.. अमरवाड़ा में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए कमलेश शाह चुनाव तो जीत गए, लेकिन जीत का अंतर बेहद सीमित रहा..मध्य प्रदेश की राजनीति में उपचुनाव का सबसे बड़ा अध्याय वर्ष 2020 में लिखा गया था, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस के 22 विधायकों ने इस्तीफा देकर कमलनाथ सरकार गिरा दी थी, इसके बाद हुए उपचुनावों में अधिकांश बागी विधायक भाजपा के टिकट पर दोबारा विधानसभा पहुंचे और शिवराज सरकार की वापसी का आधार बने,हालांकि उन सभी नेताओं की राजनीतिक स्थिति आज भी समान नहीं है, कुछ मंत्री बने, कुछ संगठन में सक्रिय हैं और कुछ का प्रभाव पहले की तुलना में सीमित हुआ है, इसी राजनीतिक इतिहास के कारण राज्यसभा चुनाव के हर अंकगणित को विधानसभा के भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है.. तीसरी सीट पर मुकाबला रोचक होता है और कोई विधायक राजनीतिक जोखिम उठाता है, तो उसके सामने सदस्यता, दल-बदल कानून और संभावित उपचुनाव जैसे कई प्रश्न खड़े होंगे, चुनाव अभी लगभग ढाई वर्ष दूर हैं, इसलिए किसी भी विधायक के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा।,बड़ा सवाल क्या राज्यसभा की तीसरी सीट का चुनाव मध्य प्रदेश की राजनीति में उपचुनावों की नई पटकथा लिखेगा, या फिर सभी दल जोखिम से बचते हुए संख्या बल के मौजूदा समीकरण को बनाए रखेंगे.. ✅ राजनीतिक विश्लेषण बॉक्स (असली परीक्षा विधानसभा में?) क्रॉस वोटिंग या बगावत की स्थिति में सदस्यता पर संकट खड़ा हो सकता है.. दलबदल कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई उपचुनाव का रास्ता खोल सकती है.. भाजपा यदि तीसरी सीट पर उम्मीदवार उतारती है तो कांग्रेस के लिए डैमेज कंट्रोल सबसे बड़ी चुनौती होगी.. कांग्रेस के किसी भी विधायक के टूटने का असर केवल संख्या बल पर नहीं, बल्कि नेतृत्व की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा.. भाजपा के लिए उपचुनाव अवसर भी बन सकते हैं और जोखिम भी, क्योंकि हाल के उपचुनावों में जीत का अंतर लगातार घटा है.. ✅ अमरवाड़ा उपचुनाव 2024 कमलेश शाह ( बीजेपी ) से जीते 3027 वोटों से जीत दर्ज की थी कांग्रेस प्रत्याशी धीरन शाह को हराया था 2023 के मुकाबले 22059 वोटों का अंतर रहा कमलेश शाह ( कांग्रेस ) से 25086 वोटों से जीते थे ✅ विजयपुर उपचुनाव – 2024 मुकेश मल्होत्रा ( कांग्रेस ) से जीते 7364 वोटों से जीत दर्ज हुई थी बीजेपी प्रत्याशी रामनिवास रावत को हराया था 2023 के मुकाबले 10695 वोटों का अंतर रहा रामनिवास रावत ( कांग्रेस ) से 18059 वोटों से जीते थे ✅ बुधनी उपचुनाव – 2024 रमाकांत भार्गव ( बीजेपी ) से जीते 13901 वोटों से जीत दर्ज हुई थी कांग्रेस प्रत्याशी राजकुमार पटेल को हराया था 2023 के मुकाबले 91073 वोटों का अंतर रहा शिवराज सिंह चौहान 1,04,974 वोटों से जीते थे ✅✅ Box अलग (भाजपा नेक फैसला ले लिया चुनाव लड़ेगी लेकिन उम्मीदवार पर सस्पेंस अंतिम समय में ही खत्म होगा ) (मुख्यमंत्री निवास के मंथन के बाद बढ़ा तीसरी सीट का रोमांच, हाई कमान पर सबकी नजर) इंट्रो मध्य प्रदेश की राज्यसभा की तीसरी सीट को लेकर सियासी उत्सुकता अपने चरम पर पहुंच गई है, कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार घोषित कर चुनावी तैयारी लगभग पूरी कर ली है, जबकि भाजपा अब भी अपने अंतिम फैसले को लेकर सस्पेंस बनाए हुए है, नामांकन के अंतिम दिन से ठीक पहले मुख्यमंत्री निवास पर हुई बैठकों और मंथन ने राजनीतिक हलकों में इस चर्चा को और बल दिया है कि भाजपा तीसरी सीट के विकल्प को लेकर गंभीरता से विचार कर रही है.. दूसरे दौर की महत्वपूर्ण बैठक रात को हुई और पार्टी ने स्पष्ट संकेत दे दिए वह चुनाव लड़ेगी.. ऐसे में प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा कांग्रेस को यह सीट अब निर्विरोध नहीं देगी और मुकाबले का रास्ता चुन कर कांग्रेस की घेराबंदी करेगी.. भाजपा तीसरी सीट पर उम्मीदवार उतारती है तो कांग्रेस के सामने अपने विधायकों और समर्थक मतों को एकजुट बनाए रखने की चुनौती खड़ी होगी.. तब यह चुनाव केवल संख्या बल का नहीं बल्कि दोनों दलों की राजनीतिक प्रबंधन क्षमता, नेतृत्व की स्वीकार्यता और संगठनात्मक अनुशासन की भी परीक्षा बन जाएगा, वहीं भाजपा के लिए भी यह फैसला सामान्य राजनीतिक कदम नहीं होगा, क्योंकि पार्टी की चुनावी शैली हमेशा मजबूत अंकगणित और स्पष्ट रणनीति पर आधारित रही है.. ऐसे में उम्मीदवार उतारने का अर्थ होगा कि भाजपा ने संभावनाओं और राजनीतिक संदेशदोनों पहलुओं का आकलन किया है,दूसरी ओर यदि भाजपा अंतिम समय में चुनावी मुकाबले से पीछे हटती है तो उसके भी राजनीतिक मायने निकाले जाएंगे, तब सवाल उठेंगे कि लंबे समय तक सस्पेंस बनाए रखने के पीछे रणनीति क्या थी, क्या वह जरूरी समर्थन नहीं जुटा पाई.. फिलहाल कांग्रेस अपने उम्मीदवार के नामांकन की तैयारी में जुटी है और भाजपा के अंतिम फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं, सोमवार को यही फैसला तय करेगा कि तीसरी सीट पर मुकाबला होगा या यह चुनाव बिना संघर्ष के संपन्न हो जाएगा.. यदि चुनाव हुआ तो फिर परिणाम के लिए 18 जून का इंतजार करना होगा.. ✅✅ Bkx .(तीसरी सीट पर भाजपा का दांव, राष्ट्रीय रणनीति से जुड़ा सवाल) राज्यसभा की तीसरी सीट पर भाजपा की संभावित दावेदारी को केवल मध्य प्रदेश की राजनीति के चश्मे से नहीं देखा जा सकता.. केंद्र में एनडीए सरकार राज्यसभा में अपनी संख्या लगातार बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है.. ऐसे में प्रत्येक अतिरिक्त सीट राष्ट्रीय महत्व रखती है, कई राज्यों में भाजपा की चुनावी रणनीति से इसे जोड़कर देखा जाए और यदि भाजपा उम्मीदवार उतारती है तो यह संकेत होगा कि पार्टी कांग्रेस को निर्विरोध जीत का अवसर देने के पक्ष में नहीं है और वह विपक्ष की एकजुटता की वास्तविक परीक्षा लेना चाहती है.. इधर बदलते प्रदेश नेतृत्व खासतौर से ..मोहन-हेमंत की जोड़ी के लिए बड़ा राजनीतिक इम्तिहान माना जा रहा.. मोहन हेमंत की जोड़ी कितनी कॉन्फिडेंट और क्या वह जोखिम लेगी..मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के लिए भी यह चुनाव नेतृत्व से ज्यादा व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से जुड़ा माना जाएगा.. हाई कमान के ग्रीन सिग्नल के बाद भाजपा ने इसके स्पष्ट संकेत दे दिए.. शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर नरोत्तम मिश्रा भूपेंद्र सिंह के दौर में चुनावी प्रबंधन के कई अनुभवी चेहरे भाजपा की रणनीति का हिस्सा रहे हैं, लेकिन अब संगठन और सत्ता की कमान नए नेतृत्व के हाथों में है, ऐसे में तीसरी सीट पर कोई भी निर्णय सीधे तौर पर मोहन-हेमंत नेतृत्व की राजनीतिक क्षमता और संगठनात्मक पकड़ का आकलन करेगा..भाजपा की राजनीति में दबाव बनाने की रणनीति नई नहीं है..भाजपा का राजनीतिक ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि पार्टी कई बार ऐसे चुनाव केवल जीतने के लिए नहीं बल्कि विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में लाने के लिए भी लड़ती रही है.. जिसे भाजपा को मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाने का फायदा भी मिला और जीत भी मिली.. कांग्रेस के सामने भी सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि यदि मुकाबला हुआ तो क्या वह अपने सभी विधायकों और समर्थकों को पूरी तरह एकजुट रख पाएगी, भाजपा इसी सवाल को राजनीतिक बहस का विषय बनाना चाहती है.. उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन प्रदेश अध्यक्षजीतू पटवारी के बयान उनके दावे और एक जुटता के साथ विधानसभा का अंकगणित भाजपा की सबसे बड़ी मजबूरी भी..हालांकि भाजपा की राजनीति का एक दूसरा पक्ष भी है, पार्टी सामान्यतः मजबूत अंकगणित के बिना बड़ा जोखिम लेने से बचती रही है, इसलिए यदि उम्मीदवार मैदान में उतरता है तो यह माना जाएगा कि भाजपा के पास केवल राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि संख्या प्रबंधन को लेकर भी कोई भरोसा या रणनीति मौजूद है.. अन्यथा पार्टी अनावश्यक जोखिम उठाने से परहेज कर सकती है.. (..कांग्रेस ने मीनाक्षी के जरिए दिया राहुल गांधी का संदेश) ..कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाकर स्पष्ट संकेत दिया है कि यह केवल प्रदेश कांग्रेस का फैसला नहीं बल्कि राहुल गांधी की राजनीतिक प्राथमिकताओं का हिस्सा है, मीनाक्षी लंबे समय से राहुल गांधी की विश्वसनीय टीम का हिस्सा रही हैं..ऐसे में उनकी उम्मीदवारी के जरिए विधायकों और नेताओं को संदेश दिया गया है कि चुनाव पर शीर्ष नेतृत्व की सीधी निगरानी है, इस राहुल गांधी की कांग्रेस के अंदर बढ़ती धमक से जोड़कर देखा जा सकता है.. यह चुनाव जिस पर उसका हक बनता है जीतू और उमंग के लिए नेतृत्व साबित करने का मौका होगा.. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के लिए यह चुनाव संगठनात्मक परीक्षा जैसा है, यदि कांग्रेस पूरी एकजुटता के साथ सीट निकाल लेती है तो यह नए नेतृत्व की स्वीकार्यता का प्रमाण होगा.. लेकिन यदि कहीं कोई असंतोष या क्रॉस वोटिंग सामने आती है तो सबसे पहले सवाल नेतृत्व की क्षमता पर ही उठेंगे.. (कमलनाथ और दिग्विजय की मौजूदगी बढ़ा रही कांग्रेस का भरोसा) कांग्रेस के लिए राहत की बात यह है कि वरिष्ठ नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह इस चुनाव में मीनाक्षी नटराजन के समर्थन में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं,इससे संगठन के भीतर सकारात्मक संदेश गया है, वरिष्ठ और युवा नेतृत्व के बीच समन्वय की तस्वीर कांग्रेस के लिए राजनीतिक मजबूती का आधार बन सकती है, तो यह बात भी सच है की तीसरी सीट पर चुनाव यदि भाजपा लड़ती है तो उसकी नजर कमलनाथ समर्थकों पर ही टिकेगी .. सवाल क्या कांग्रेस को अपनों से झटका नहीं लग सकता?यह सवाल अभी भी बना हुआ है, मध्य प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस का इतिहास बताता है कि कई बार पार्टी विपक्ष से ज्यादा अपनी आंतरिक परिस्थितियों से परेशान रही है.. 2020 का घटनाक्रम अभी भी राजनीतिक स्मृति का हिस्सा है.. यही कारण है कि कांग्रेस इस बार किसी भी तरह की ढिलाई के मूड में नहीं दिखाई दे रही.. .(राहुल गांधी का अनुशासन मॉडल भी दांव पर) ..राहुल गांधी पिछले कुछ समय से संगठनात्मक फैसलों में स्पष्टता और अनुशासन पर जोर दे रहे हैं, उम्मीदवार चयन से लेकर संगठन विस्तार तक यह संदेश दिया गया है कि शीर्ष नेतृत्व के फैसलों को लेकर सार्वजनिक असहमति की गुंजाइश सीमित होगी, ऐसे में राज्यसभा चुनाव कांग्रेस के भीतर इस नए अनुशासन मॉडल की भी परीक्षा बन सकता है, (भाजपा के लिए अवसर, कांग्रेस के लिए चुनौती) कांग्रेस के खिलाफ भाजपा का उम्मीदवार सामने आता है भले ही वह अंतिम समय में नामांकन दाखिल करें यदि भाजपा मुकाबला खड़ा करती है तो उसके पास कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने का अवसर होगा, भाजपा की परेशान पॉलिटिक्स गौर करने लायक होगी, वह जीतने के लिए उम्मीदवार खड़ा कर रही है या फिर कोई और लक्ष्य को लेकर उसने यह फैसला लियाहै.. वहीं कांग्रेस के सामने चुनौती होगी कि वह यह साबित करे कि पार्टी अब पुराने दौर वाली अस्थिरता से बाहर निकल चुकी है और उसके विधायक तथा नेतृत्व एकजुट हैं, (..कांग्रेस के लिए अवसर, भाजपा के लिए जोखिम) दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए यह चुनाव जीतू पटवारी और उमंग सिंघार को मजबूत नेतृत्व के रूप में स्थापित करने का अवसर भी है,लेकिन यदि भाजपा चुनौती खड़ी करती है और कांग्रेस को अपेक्षा से अधिक संघर्ष करना पड़ता है तो विपक्ष इसे कांग्रेस की कमजोरी के रूप में प्रचारित करेगा, वहीं भाजपा यदि चुनाव लड़कर अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा पाती है तो उसे भी अपने फैसले का राजनीतिक जवाब देना पड़ सकता है..राज्यसभा की तीसरी सीट पर चुनाव हुआ तो परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण उसका राजनीतिक संदेश होगा, यह चुनाव बताएगा कि भाजपा में मोहन यादव और हेमंत खंडेलवाल की जोड़ी कितनी प्रभावी है, और कांग्रेस में जीतू पटवारी, उमंग सिंघार तथा राहुल गांधी की स्वीकार्यता कितनी मजबूत हो चुकी है.. (एक सीट, कई राजनीतिक निष्कर्ष) ..कुल मिलाकर तीसरी सीट का मुकाबला केवल एक सांसद चुनने की प्रक्रिया नहीं होगा,यह भाजपा और कांग्रेस दोनों के वर्तमान नेतृत्व, संगठनात्मक क्षमता, संख्या प्रबंधन और राजनीतिक विश्वसनीयता की परीक्षा बनेगा, इसलिए तीसरी सीट पर बना सस्पेंस जितना चुनावी है, उससे कहीं अधिक राजनीतिक संदेशों से जुड़ा हुआ है.. राज्यसभा की तीसरी सीट पर चुनाव रोचक होने से इनकार नहीं किया जा सकता.. यहीं से दतिया और भी सीट पर उपचुनाव का रास्ता भी प्रशस्त हो सकता है..
*मीनाक्षी के खिलाफ भाजपा उतारेगी उम्मीदवार.. तीसरी सीट राज्यसभा की खोलेगी क्या विधानसभा उपचुनाव का रास्ता.. (सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री)*