मध्य प्रदेश की पंचायतों में 70 हजार विकास कार्य नियमों की भेंट
मध्य प्रदेश की 23 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में लगभग 70 हजार विकास कार्य फिलहाल नियमों और प्रक्रियागत अड़चनों के कारण अधर में लटके हुए हैं। यह स्थिति भोपाल में हाल ही में आयोजित पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के एक कार्यक्रम के बाद सामने आई, जहां बड़ी संख्या में सरपंचों ने अपनी समस्याएं रखीं।
निर्माण सामग्री और वित्तीय नियमों से अटके स्थानीय विकास कार्य
सरपंचों ने बताया कि 5वें और 15वें वित्त आयोग के तहत मिली राशि से भी वे आवश्यक विकास कार्य नहीं करा पा रहे हैं। छोटी पुलिया, गांवों में सीसी रोड, तालाब और स्टॉप डैम जैसे कार्यों पर विशेष रूप से असर पड़ा है। कई पंचायतों में निर्माण कार्य के दौरान मिट्टी, मुरम या रेत उठाने पर रोक होने के कारण परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ पा रही हैं।
सरपंचों ने विभाग से मांग की है कि स्थानीय स्तर पर निर्माण के लिए आवश्यक मिट्टी, मुरम और रेत उठाने की अनुमति दी जाए, ताकि प्राथमिक जरूरतों वाले काम पूरे किए जा सकें।
15वें वित्त आयोग की टाइड राशि के उपयोग पर भी विवाद
एक अन्य बड़ी समस्या 15वें वित्त आयोग की टाइड राशि से जुड़ी है, जिसे किसी विशेष काम के लिए निर्धारित कर दिया गया है। सरपंचों ने आग्रह किया है कि इस राशि को अन्य जरूरी कार्यों के लिए भी उपयोग करने की अनुमति दी जाए।
ज्यादातर पंचायतों में जल जीवन मिशन के काम चल रहे हैं और आयोग से मिली निधि में भी नल-जल से संबंधित मद को प्राथमिकता दी जा रही है। सरपंचों के अनुसार, इससे या तो राशि उपयोग न हो पाने के कारण लैप्स हो जाती है या फिर मजबूरी में उसी मद में काम दिखाकर खर्च की जाती है।
जिला और जनपद पंचायत अध्यक्षों की नाराजगी
राज्य के सभी 55 जिला पंचायत और 313 जनपद पंचायत अध्यक्ष भी हालिया बदलावों से नाराज हैं। उनका कहना है कि वर्तमान हालात में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था का वास्तविक अधिकार संरचना कमजोर हो गया है।
भोपाल में आयोजित तीन दिवसीय "आत्मनिर्भर पंचायत-समृद्ध मध्य प्रदेश" कार्यक्रम के बाद जिला और जनपद पंचायत अध्यक्षों की ऑनलाइन बैठक हुई, जिसमें उन्होंने विरोध अभियान चलाने का मन बनाया। जिला पंचायत संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष अरविंद धाकड़ ने कहा कि बेहतर होगा कि सरकार त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था समाप्त करके सिर्फ ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंचों के चुनाव कराए, क्योंकि वर्तमान में उनके पास काम कराने के लिए पर्याप्त अधिकार और फंड नहीं बचे हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि पहले जिला पंचायत सीईओ और जनपद पंचायत सीईओ की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट लिखने का अधिकार उनसे लिया गया, और अब बजट भी सीधे ग्राम पंचायतों को दिया जा रहा है। उनके अनुसार, इससे जिला और जनपद स्तर पर चुने गए प्रतिनिधियों के पास अपने क्षेत्र में काम कराने के लिए नाममात्र का भी फंड नहीं है।
सीएम हेल्पलाइन पर बाहरी शिकायतों को लेकर आपत्ति
सरपंचों ने एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए मांग की कि उनकी ग्राम पंचायतों में बाहरी व्यक्तियों द्वारा मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के माध्यम से की जाने वाली शिकायतों पर रोक लगाई जाए। उनका कहना है कि यदि शिकायत ग्राम पंचायत के किसी निवासी द्वारा की जाती है तो उसे स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन पंचायत क्षेत्र से बाहर के व्यक्ति की शिकायतें स्वीकार न की जाएं।
विभागीय जानकारी के अनुसार, वर्तमान में लगभग 50 हजार से अधिक शिकायतें ऐसी हैं, जो संबंधित पंचायत क्षेत्र से बाहर के लोगों ने दर्ज कराई हैं।
विभाग में विचार-विमर्श, निर्णय की प्रतीक्षा
पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा रखी गई इन तीन प्रमुख मांगों—निर्माण सामग्री की अनुमति, 15वें वित्त आयोग की टाइड राशि के उपयोग में लचीलापन, और बाहरी शिकायतों पर रोक—पर विभाग स्तर पर विचार चल रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन पर शीघ्र ही निर्णय लिए जाने की संभावना जताई जा रही है, जबकि पंचायत प्रतिनिधि उम्मीद कर रहे हैं कि इससे रुके हुए विकास कार्यों को गति मिल सकेगी।
Pushpendra Chaubey