** रामलीला से मध्यप्रदेश में वोट चोरी का मुद्दा उठाकर राहुल ने बढ़ाई चुनौती, जीतू-उमंग की सक्रियता के बीच दो पूर्व मुख्यमंत्रियों की भूमिका पर सवाल। ✅ दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की महारैली ने मध्यप्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा सहित कई पूर्व मंत्रियों तथा विधायकों की संयुक्त मौजूदगी ने प्रदेश संगठन की सक्रियता दिखाई। लेकिन दो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की अनुपस्थिति ने सवाल खड़ा किया कि क्या राहुल गांधी की बदलती राजनीति में मध्यप्रदेश कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी की भूमिका सीमित होती जा रही है? इस सवाल को और महत्वपूर्ण राहुल गांधी के उस राजनीतिक आरोप ने बना दिया, जिसमें उन्होंने दूसरे राज्यों के साथ मध्यप्रदेश और 2024 के लोकसभा चुनाव का उल्लेख करते हुए कथित वोट चोरी का मुद्दा उठाया। चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची में गड़बड़ियों को लेकर राहुल के आरोपों ने प्रदेश कांग्रेस के सामने नई राजनीतिक चुनौती रख दी है। हालांकि ये आरोप अभी प्रमाणित निष्कर्ष नहीं हैं और चुनाव आयोग इन्हें खारिज करता रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब राहुल स्वयं मध्यप्रदेश का नाम लेकर चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं, तब प्रदेश के दो सबसे अनुभवी पूर्व मुख्यमंत्री इस मुद्दे को कितनी मजबूती से आगे बढ़ाएंगे? दिग्विजय सिंह लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया, ईवीएम और मतदाता सूची की पारदर्शिता पर सवाल उठाते रहे हैं। फिलहाल वह अपनी पूर्व निर्धारित पदयात्रा के जरिए मध्यप्रदेश में सक्रिय हैं। रामलीला मैदान के आयोजन की घोषणा उनकी यात्रा शुरू होने से पहले हो चुकी थी, इसलिए उनकी अनुपस्थिति राजनीतिक चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है। हालांकि इसे राहुल से दूरी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। बड़ा सवाल यह है कि क्या दिग्विजय अपनी यात्रा को राहुल के उठाए चुनावी मुद्दों से जोड़कर प्रदेश में व्यापक राजनीतिक अभियान का स्वरूप देंगे? उनका अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और जनसंपर्क इस अभियान में कांग्रेस की ताकत बन सकते हैं। कमलनाथ की स्थिति अलग दिखाई देती है। प्रदेश और दिल्ली की सक्रिय राजनीति में उनकी सार्वजनिक मौजूदगी पहले जैसी नहीं रही। पुत्र नकुलनाथ कुछ विशेष अवसरों पर जरूर दिखाई दिए, लेकिन इससे कमलनाथ की भूमिका स्पष्ट नहीं होती। मध्यप्रदेश में लंबे राजनीतिक अनुभव और पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत रखने वाले कमलनाथ क्या राहुल के आरोपों को लेकर खुलकर सामने आएंगे? या उनकी राजनीतिक चुप्पी को संगठन में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत माना जाएगा? दूसरी तरफ जीतू पटवारी और उमंग सिंघार के सामने बड़ा अवसर है। राहुल गांधी के संदेश को प्रदेश में बूथ स्तर तक पहुंचाना, मतदाता सूचियों की जांच को लेकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और कथित गड़बड़ियों के प्रमाण जुटाकर संवैधानिक मंचों पर उठाना उनकी वास्तविक परीक्षा होगी। रामलीला मैदान में मौजूदगी से राजनीतिक संदेश जरूर गया है, लेकिन राहुल की नजर में नेतृत्व की मजबूती का अंतिम पैमाना संगठनात्मक परिणाम होंगे, केवल मंच पर उपस्थिति या भीड़ नहीं। इस पूरे घटनाक्रम में पीढ़ियों के बीच राजनीतिक संतुलन भी महत्वपूर्ण है। राहुल गांधी को नई पीढ़ी की आक्रामकता चाहिए, लेकिन दिग्विजय और कमलनाथ जैसे अनुभवी नेताओं का जनाधार और राजनीतिक अनुभव भी उपयोगी हो सकता है। क्या कांग्रेस इन दोनों ताकतों को साथ लेकर चलेगी या पद, पावर और प्रतिष्ठा की राजनीति में पुराने दिग्गज धीरे-धीरे पीछे छूट जाएंगे? ** रामलीला मैदान से राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश कांग्रेस के लिए केवल मुद्दा नहीं, बल्कि नेतृत्व की नई कसौटी भी तय कर दी है। दिग्विजय के सामने अपनी सक्रियता को व्यापक राजनीतिक संघर्ष से जोड़ने की चुनौती है, तो कमलनाथ के सामने चुप्पी तोड़कर प्रासंगिकता साबित करने का सवाल। जीतू-उमंग के लिए अवसर है कि वे राहुल के संदेश को जमीन पर उतारें। अब मध्यप्रदेश कांग्रेस में असली परीक्षा यह होगी कि कौन राहुल के राजनीतिक अभियान का प्रभावी चेहरा बनता है और कौन केवल अपने पुराने पद, प्रभाव और प्रतिष्ठा के सहारे राजनीति में मौजूद रहता है।
राहुल की रामलीला रैली से दिग्गी राजा और कांग्रेस के नाथ दूर क्यों. कौन पुरानी पीढ़ी को नजरअंदाज कर रहा.. दो टूक ..(गीत दीक्षित)