## राहुल की हुंकार, जीतू-उमंग की परीक्षा कब? इंट्रो सत्ता की सरगर्मी, सियासत की सरहदें और संघर्ष के सवाल जब एक साथ सामने आते हैं, तब राजनीति के रंग ही नहीं, रिश्ते और रास्ते भी बदलते हैं। सत्ता के समीकरण में सवाल सिर्फ सिंहासन का नहीं, संगठन की शक्ति, सड़क के संघर्ष और सियासी संकल्प का भी है। दिल्ली की दहाड़ भोपाल में कितनी गूंजेगी? राहुल की रणभेरी पर जीतू-उमंग कितना जोर दिखाएंगे? मोहन की मजबूत मोर्चाबंदी के सामने कांग्रेस का कौन-सा कदम कारगर होगा? नारों की नुमाइश, नेताओं की निष्ठा और नतीजों की नब्ज टटोलते हुए सवाल यही है कि सियासी संदेश संघर्ष में कब बदलेगा? ### दिल्ली की दहाड़, भोपाल में कितनी धार? दिल्ली के रामलीला मैदान से राहुल गांधी ने एक बार फिर मध्यप्रदेश का नाम लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव और विभिन्न राज्यों में कथित वोट चोरी के गंभीर आरोप लगाए। उनका दावा है कि चुनावी व्यवस्था में गड़बड़ियों ने जनादेश को प्रभावित किया। हालांकि ये आरोप अभी प्रमाणित निष्कर्ष नहीं हैं और चुनाव आयोग इन्हें खारिज करता रहा है। लेकिन राहुल के इस बयान ने मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति में एक नया सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। क्या प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार राहुल के आरोपों को प्रमाणों के साथ जनता के बीच स्थापित कर पाएंगे? राहुल गांधी भोपाल और इंदौर में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराकर प्रदेश कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं को सक्रिय होने का संदेश दे चुके हैं। अब रामलीला मैदान से मध्यप्रदेश का नाम लेकर उन्होंने जिम्मेदारी और बढ़ा दी है। आखिर राष्ट्रीय नेतृत्व बार-बार राजनीतिक जमीन तैयार करे और प्रदेश संगठन केवल उसके संदेश को दोहराता रहे, तो विपक्ष की वास्तविक ताकत कैसे बढ़ेगी? ### नारे नहीं, प्रमाण बनेंगे पहली कसौटी जीतू-उमंग के सामने पहला विकल्प है कि कांग्रेस लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रवार मतदाता सूचियों की जांच के लिए विशेष समितियां बनाए। पुराने और नए मतदाता आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन हो, शिकायतों के प्रमाण जुटाए जाएं और निर्वाचन आयोग के सामने ठोस तथ्य रखे जाएं। यदि आरोप सही हैं तो उनकी कानूनी लड़ाई लड़ी जाए। अन्यथा केवल राजनीतिक नारों से जनता का विश्वास हासिल करना मुश्किल होगा। ### मोहन की मजबूती, कांग्रेस की चुनौती मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार प्रशासनिक फैसलों, निवेश, रोजगार और विकास योजनाओं के माध्यम से सरकार की सक्रिय छवि प्रस्तुत कर रहे हैं। कांग्रेस के सामने किसानों की उपज का मूल्य, खाद की उपलब्धता, युवाओं की बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता, आदिवासी अधिकार, महंगाई और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे मुद्दे मौजूद हैं। लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस इन्हें स्थायी जनांदोलन में क्यों नहीं बदल पा रही? जीतू पटवारी की आक्रामक शैली और उमंग सिंघार की सदन में सक्रियता को एक साझा रणनीति की जरूरत है। सरकार के प्रत्येक बड़े दावे की तथ्यात्मक समीक्षा और जनता के सवालों पर लगातार संघर्ष ही कांग्रेस को विश्वसनीय विकल्प बना सकता है। ### जीतू-उमंग के सामने अब कौन-सा रास्ता? रामलीला मैदान की रैली से पहले दोनों नेताओं ने कार्यकर्ताओं से दिल्ली पहुंचने की अपील की थी। अब चुनौती उस लामबंदी को मध्यप्रदेश के जिलों और बूथों तक पहुंचाने की है। प्रदेश कांग्रेस को समयबद्ध अभियान, जिला स्तर पर जनसुनवाई, मतदाता सहायता केंद्र और विधानसभा में मुद्दों की निरंतर पैरवी का रास्ता अपनाना होगा। दिग्विजय सिंह और कमलनाथ जैसे अनुभवी नेताओं का सहयोग भी महत्वपूर्ण होगा। संगठन की नई पीढ़ी और पुराने जनाधार के बीच समन्वय के बिना भाजपा के मजबूत संगठनात्मक ढांचे को चुनौती देना आसान नहीं है। ### सत्ता के समीकरण आखिर क्या कहते हैं? सत्ता के समीकरण का निष्कर्ष यही है कि राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश कांग्रेस को केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि जवाबदेही का अवसर दिया है। मोहन यादव के सामने जीतू-उमंग की चुनौती तभी प्रभावी होगी, जब वे कथित वोट चोरी के आरोपों को प्रमाणों की कसौटी पर कसेंगे और जनहित के मुद्दों को सड़क से सदन तक लगातार उठाएंगे। रामलीला मैदान में उपस्थिति राजनीतिक प्रतिबद्धता का प्रदर्शन था, लेकिन उससे जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। असली परीक्षा अब भोपाल, इंदौर, गांवों और बूथों पर होगी। सवाल यही है कि राहुल की रणभेरी पर जीतू-उमंग संघर्ष का शंखनाद कब करेंगे?
( रामलीला से मध्यप्रदेश में वोट चोरी का आरोप लगाकर राहुल ने बढ़ाई चुनौती, मोहन सरकार के मुकाबले जीतू-उमंग को अब साबित करनी होगी अपनी राजनीतिक ताकत) सत्ता का समीकरण...(महेंद्र विश्वकर्मा)