# रामलीला में एकता, राहुल की स्वीकार्यता कितनी? ✅* मोदी विरोध में विपक्षी दिग्गजों की एकजुटता, लेकिन आप और सीजेपी की दूरी ने उठाए सवाल; राहुल की स्वीकार्यता, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं और गठबंधन की असली परीक्षा✅ | राजनीति के राज राकेशअग्निहोत्री.. ✅ दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया ब्लॉक की महारैली ने विपक्षी राजनीति की एक दिलचस्प तस्वीर पेश की। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और दूसरे दिग्गज एक मंच पर नजर आए। अलग-अलग पार्टियां, अलग-अलग महत्वाकांक्षाएं, लेकिन निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। इस राजनीतिक एकजुटता के बीच दो तस्वीरें ऐसी भी थीं, जिन्होंने गठबंधन की मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए। कॉकरोच जनता पार्टी ने समर्थन देकर मंच से दूरी बनाई, जबकि आम आदमी पार्टी ने पहले ही अपनी अलग राजनीतिक लाइन स्पष्ट कर दी। क्या यह विपक्ष के लिए चेतावनी है या बदलती राजनीति में स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की रणनीति? भीड़ का गणित, भाजपा का पलटवार महारैली में दस लाख लोगों के जुटने का दावा किया गया, लेकिन भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने खाली कुर्सियों की तस्वीरें दिखाकर इसे फ्लॉप बताया। भाजपा के मुताबिक 28 हजार कुर्सियों में पांच से सात हजार खाली थीं। दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। फिर भी भीड़ के गणित से अलग मंच पर प्रमुख विपक्षी नेताओं की मौजूदगी महत्वपूर्ण थी। राहुल गांधी ने कहा कि जनता ने अपना संदेश दे दिया है। उनके इस बयान का राजनीतिक अर्थ है कि विपक्ष प्रदर्शन को केवल संख्या नहीं, लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के व्यापक अभियान के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। राहुल की हुंकार, क्या विपक्ष की सहमति? राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और जेल जाने की भविष्यवाणी करते हुए चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए। मध्यप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों और 2024 के लोकसभा चुनाव को कथित वोट चोरी से जोड़ा। हालांकि आरोप प्रमाणित न्यायिक निष्कर्ष नहीं हैं। भाजपा ने याद दिलाया कि ज्ञानेश कुमार 2024 में मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं थे। इस विवाद के बावजूद राहुल का आक्रामक भाषण विपक्षी आंदोलन को राष्ट्रीय स्वरूप देने की कोशिश दिखाई दिया। ममता-अखिलेश का साथ, अपने राजनीतिक हित ममता बनर्जी ने बंगाल में चुनावी गड़बड़ियों के आरोप लगाए। अखिलेश यादव ने उत्तरप्रदेश में 2027 में भाजपा की विदाई का दावा किया। तेजस्वी यादव ने संघर्ष को महाभारत बताया, जबकि फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने मताधिकार तथा संवैधानिक अधिकारों पर जोर दिया। खड़गे ने केंद्र सरकार पर मतदाताओं के अधिकार छीनने का आरोप लगाया। इन भाषणों में भाजपा विरोध साझा था, लेकिन क्षेत्रीय हित अलग थे। ममता की प्राथमिकता बंगाल, अखिलेश की उत्तरप्रदेश और तेजस्वी की बिहार की राजनीति है। तीनों राहुल के साथ खड़े दिखाई दिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने अपनी नेतृत्व संबंधी महत्वाकांक्षाएं छोड़ दी हैं। सीजेपी का समर्थन, मंच से दूरी क्यों? कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कथित वोट चोरी के खिलाफ आंदोलन का समर्थन किया, लेकिन अपनी स्वतंत्र और तटस्थ पहचान बनाए रखने के लिए रामलीला मैदान के राजनीतिक मंच से दूरी रखी। ममता बनर्जी से उनकी मुलाकात ने भी अलग राजनीतिक संकेत दिया। यह कांग्रेस विरोध से अधिक आंदोलन को किसी एक दल के नियंत्रण से बाहर रखने की रणनीति दिखाई देती है। सवाल है कि जब युवाओं के बीच सक्रिय संगठन मुद्दे पर साथ हैं, लेकिन नेतृत्व के मंच पर नहीं, तो क्या राहुल उन्हें व्यापक राजनीतिक आंदोलन में जोड़ पाएंगे? आप की अलग राह, भाजपा को कितना फायदा? आम आदमी पार्टी का रुख अधिक स्पष्ट है। सांसद संजय सिंह ने कहा कि उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है, इसलिए रैली में शामिल नहीं होगी। दिलचस्प यह कि आप भी एसआईआर और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगभग वही आरोप और मांगें उठा रही है। अर्थात मुद्दे पर सहमति है, लेकिन राजनीतिक मंच पर असहमति। यही स्थिति भाजपा के लिए रणनीतिक रूप से मुफीद हो सकती है। विपक्षी मतों का विभाजन, अलग-अलग आंदोलन और साझा नेतृत्व का अभाव सत्तापक्ष को चुनावी लाभ पहुंचा सकते हैं। हालांकि केवल मंच से दूरी को भाजपा के समर्थन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। आप और सीजेपी दोनों अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान तथा जनाधार सुरक्षित रखना चाहते हैं। क्या मोदी के सामने राहुल सर्वमान्य चेहरा? रामलीला मैदान में राहुल गांधी विपक्ष के प्रमुख राष्ट्रीय चेहरे के रूप में उभरे, लेकिन सर्वमान्य नेता होने का दावा अभी जल्दबाजी होगा। ममता, अखिलेश और दूसरे नेताओं ने उनके अभियान का समर्थन किया, पर प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में कोई औपचारिक सहमति नहीं दी। गठबंधन की वास्तविक परीक्षा चुनावी तालमेल, साझा कार्यक्रम और नेतृत्व संबंधी समझौते में होगी। राजनीति के रंग यही कहते हैं कि रामलीला मैदान ने विपक्ष की एकता और उसकी सीमाएं दोनों उजागर कर दीं। राहुल का राजनीतिक कद बढ़ता दिखाई देता है, लेकिन आप और सीजेपी की दूरी बताती है कि मुद्दों की साझेदारी नेतृत्व की स्वीकार्यता की गारंटी नहीं है। मोदी सरकार के खिलाफ एकजुटता विपक्ष की जरूरत है, मगर क्षेत्रीय दलों और स्वतंत्र संगठनों की अपनी पहचान भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भाजपा के लिए विपक्ष का बिखराव अवसर बन सकता है, जबकि राहुल के लिए सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग राजनीतिक हितों को एक साझा राष्ट्रीय रणनीति में बदलना है। असली सवाल अब यह नहीं कि रामलीला मैदान में कितने नेता पहुंचे, बल्कि यह है कि अगली राजनीतिक लड़ाई में कितने नेता एक साथ टिकेंगे।
रामलीला में 'एकता' राहुल की स्वीकार्यता कितनी..? मोदी विरोध में विपक्षी दिग्गजों की एक जुटता लेकिन आप और सीजेपी की दूरी ने उठाए सवाल.. राजनीति के राज.. (राकेश अग्निहोत्री)