✅रामलीला के जवाब में भाजपा का पंजाब दांव!..सवाल दर सवाल (राकेश अग्निहोत्री) पार्ट 2.. (: राहुल की प्रेशर पॉलिटिक्स के जवाब में भाजपा ने 1984 के सिख विरोधी दंगों का मुद्दा उठाया, शाह से नितिन नवीन और हरदीप पुरी तक की सक्रियता ने बढ़ाए सियासी सवाल, क्या पंजाब चुनाव के लिए तैयार हुई नई जमीन?) ✅ दिल्ली के रामलीला मैदान में राहुल गांधी की हुंकार से पहले ही भाजपा ने अपनी काउंटर पॉलिटिक्स की बिसात बिछा दी थी। इंडिया गठबंधन जहां कथित वोट चोरी, चुनाव आयोग और संविधान की रक्षा को लेकर सत्ता को घेरने की तैयारी कर रहा था, वहीं भाजपा ने एक नवंबर की तारीख को 1984 के सिख विरोधी दंगों की स्मृति से जोड़कर कांग्रेस को उसके अतीत के कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया। सवाल यह है कि क्या भाजपा की यह रणनीति केवल राहुल गांधी की महारैली की सुर्खियां बांटने तक सीमित थी या फिर पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर एक बड़े राजनीतिक अभियान की भूमिका तैयार की गई? भाजपा की काउंटर पॉलिटिक्स की प्रासंगिकता सबसे पहले उसकी टाइमिंग में दिखाई देती है। राहुल गांधी जिस दिन लोकतंत्र और संविधान बचाने का संदेश दे रहे थे, उसी दिन भाजपा कांग्रेस शासन के दौरान हुई सिख विरोधी हिंसा और पीड़ितों को न्याय के सवाल को सामने ला रही थी। राजनीतिक दृष्टि से यह दो अलग-अलग मुद्दों के बीच नैतिक जवाबदेही की प्रतिस्पर्धा थी। कांग्रेस वर्तमान चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठा रही थी, जबकि भाजपा कांग्रेस के ऐतिहासिक रिकॉर्ड पर जवाब मांग रही थी। दोनों पक्ष जनता के सामने अपने मुद्दे को लोकतंत्र और न्याय से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहते थे। इस रणनीति की तैयारी भी सामान्य नहीं दिखाई दी। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने चंडीगढ़ से कांग्रेस पर हमला बोलकर पंजाब को राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की सक्रियता ने संगठनात्मक स्तर पर इस मुद्दे को महत्व दिया। दिल्ली में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और अन्य भाजपा नेताओं की मौजूदगी ने विरोध को सड़क तक पहुंचाया। अलग-अलग स्थानों से एक ही राजनीतिक संदेश देने की कोशिश बताती है कि भाजपा केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि समानांतर राजनीतिक विमर्श खड़ा करना चाहती थी। इस पूरे घटनाक्रम में हरदीप सिंह पुरी की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। मध्यप्रदेश से राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर चुके पुरी को दिल्ली में सिख समाज से जुड़े मुद्दे पर सामने लाना राजनीतिक रूप से उपयोगी कदम माना जा सकता है। भाजपा ने इसके जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि सिख विरोधी दंगों की स्मृति केवल कांग्रेस पर आरोप लगाने का विषय नहीं, बल्कि आज भी राजनीतिक जवाबदेही का सवाल है। लेकिन भाजपा की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पंजाब दिखाई देता है। वहां आम आदमी पार्टी की सरकार है, कांग्रेस प्रमुख विपक्षी ताकतों में शामिल है और भाजपा अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की चुनौती से जूझ रही है। ऐसे समय इंडिया गठबंधन की रामलीला महारैली से आम आदमी पार्टी की दूरी ने विपक्षी एकजुटता की सीमाओं को भी उजागर किया। भाजपा के लिए यह अवसर था कि वह कांग्रेस को ऐतिहासिक मुद्दे पर घेरते हुए पंजाब में अपनी अलग राजनीतिक पहचान स्थापित करे। हालांकि आप की अनुपस्थिति को भाजपा के पक्ष में राजनीतिक समर्थन नहीं माना जा सकता। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा अपनी काउंटर पॉलिटिक्स से क्या हासिल कर पाई? तत्काल प्रभाव की दृष्टि से उसने राहुल गांधी की महारैली के समानांतर राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा में अपनी जगह बनाने की कोशिश की। कांग्रेस के आरोपों के जवाब में एक अलग मुद्दा सामने रखा और अपने समर्थकों को राजनीतिक प्रतिवाद का आधार दिया। इस सीमा तक रणनीति को आंशिक सफलता कहा जा सकता है। लेकिन क्या इससे रामलीला मैदान का राजनीतिक प्रभाव कम हुआ, कांग्रेस की आक्रामकता कमजोर पड़ी या पंजाब में भाजपा का जनाधार बढ़ा? इन सवालों का अभी निर्णायक उत्तर नहीं है। भाजपा के सामने चुनौती यह भी है कि पंजाब का मतदाता केवल ऐतिहासिक स्मृतियों के आधार पर राजनीतिक फैसला नहीं करेगा। नशाखोरी, किसानों की समस्याएं, रोजगार, कानून-व्यवस्था और आर्थिक विकास जैसे सवाल भी चुनावी विमर्श तय करेंगे। यदि भाजपा 1984 के मुद्दे को वर्तमान पंजाब की चुनौतियों से जोड़कर व्यापक राजनीतिक कार्यक्रम तैयार करती है तो उसे संगठनात्मक लाभ मिल सकता है। अन्यथा यह रणनीति तत्काल सुर्खियों तक सीमित रह सकती है। 1 नवंबर को यह भी संदेश निकल कर आया कि राहुल गांधी की प्रेशर पॉलिटिक्स के जवाब में भाजपा ने काउंटर पॉलिटिक्स की प्रासंगिकता स्थापित करने का प्रयास जरूर किया है। तैयारी में बड़े चेहरे, संवेदनशील मुद्दा, सटीक तारीख और दिल्ली से पंजाब तक राजनीतिक संदेश देने की योजना दिखाई दी। पहला लक्ष्य, विपक्ष की सुर्खियों को चुनौती देना, कुछ हद तक पूरा हुआ। दूसरा लक्ष्य, कांग्रेस को ऐतिहासिक जवाबदेही के सवाल पर घेरना, राजनीतिक बहस का हिस्सा बना। लेकिन तीसरा और सबसे बड़ा लक्ष्य, पंजाब में इस मुद्दे को चुनावी समर्थन में बदलना, अभी बाकी है। भाजपा ने राजनीतिक मुकाबले में अपनी समानांतर लकीर खींच दी है, लेकिन उसकी वास्तविक सफलता का फैसला भाषणों और विरोध मार्च से नहीं, पंजाब की जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता से होगा। सवाल यही है कि यह काउंटर पॉलिटिक्स भविष्य की चुनावी रणनीति का आधार बनेगी या रामलीला की महारैली के साथ ही इसकी राजनीतिक गूंज भी कमजोर पड़ जाएगी।
✅रामलीला के जवाब में भाजपा का पंजाब दांव!.. मैदान में अमित शाह.. नितिन नवीन और हरदीप पुरी, रेखा गुप्ता ने किया पलटवार सवाल दर सवाल (राकेश अग्निहोत्री) पार्ट 2..