SIR प्रक्रिया में साधु-संत, प्रवासी मजदूर और आम मतदाता की मुश्किलें
देश भर में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया ने उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में नए विवाद और व्यावहारिक समस्याएं खड़ी कर दी हैं। अयोध्या के साधु-संतों से लेकर लखनऊ में असम से आए मजदूरों और रामपुर की बुजुर्ग महिला तक, कई वर्ग इस प्रक्रिया के नियमों और कड़ाई का असर झेल रहे हैं।
अयोध्या के साधु-संतों के वोट खतरे में
अयोध्या के निर्वाणी अनी अखाड़ा के महंत सीताराम दास ने SIR फॉर्म में अपने पिता के स्थान पर गुरु महंत त्रिभुवन दास जी और मां के कॉलम में जानकी माता का नाम भर दिया। संन्यासी परंपरा के अनुसार उन्होंने वास्तविक माता-पिता के बजाय गुरु और देवी-देवताओं को ही अपना अभिभावक माना है।
महंत सीताराम दास जैसे लगभग 15 हजार साधु-संत अयोध्या में रहते हैं, जिनमें से ज्यादातर ने फॉर्म में माता-पिता की जगह रामायण काल या देवी-देवताओं के नाम दर्ज किए हैं। कई ने मां के नाम की जगह सीता, कौशल्या, जानकी, दुर्गा और सरस्वती जैसे नाम लिखे हैं। निर्वाचन प्रक्रिया के नजरिए से यह जानकारी अधूरी मानी जा रही है, जिससे उनके नाम मतदाता सूची से हटने का खतरा पैदा हो गया है।
एक वरिष्ठ भाजपा नेता मानते हैं कि साधु-संत परंपरा और नियमों के बीच यह टकराव पार्टी के लिए भी बड़ा राजनीतिक संकट बन सकता है, क्योंकि परंपरागत रूप से ये वर्ग भाजपा का वोट बैंक माना जाता है। वे संतों से अपील कर रहे हैं कि वे फॉर्म में अपने वास्तविक माता-पिता के नाम लिखें, हालांकि अब तक बहुत कम लोगों ने यह बदलाव किया है।
अयोध्या के मेयर का कहना है कि इस मुद्दे पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी से बात की गई है और शहर के लिए विशेष निर्देश जारी हुए हैं, फिलहाल किसी बड़े व्यवधान की बात आधिकारिक तौर पर नहीं मानी जा रही है।
विशेषज्ञों की राय: साधु और घुमंतू समुदायों के लिए अलग विकल्प
वरिष्ठ पत्रकार वी.एन. दास के अनुसार SIR के दौरान सबसे अधिक समस्या उन लोगों को आ रही है, जिन्होंने अपना मूल स्थान छोड़कर मठों, मंदिरों या दूसरे शहरों में बसना शुरू किया है। इनमें बचपन से अखाड़ों में रहने वाले साधु-संत और असंगठित क्षेत्र के कामगार प्रमुख हैं।
अयोध्या के कई संन्यासी बचपन में ही घर छोड़कर मठों में आ गए और दशकों से वहीं रह रहे हैं। ऐसे लोगों को आज अपने असली माता-पिता के नाम तक ठीक से याद नहीं हैं, इसलिए उनसे वही जानकारी मांगना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि SIR फॉर्म में साधु-संतों और घूमंतू समुदाय के लिए अलग विकल्प जोड़े जाएं और यदि 2003 के वोटर रिकॉर्ड न मिलें तो आधार, पैन या अस्थायी पते को प्रमाण मानकर उनका पंजीकरण किया जाए।
चुनाव अधिकारियों की सफाई
अयोध्या के डिप्टी डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर का कहना है कि SIR फॉर्म में माता-पिता के नाम और अन्य विवरण देना नियमों के तहत जरूरी है, लेकिन जिन साधुओं के लिए यह संभव नहीं है, उनके हस्ताक्षर को ही पर्याप्त प्रमाण माना जाएगा। उनसे मां के नाम के लिए अलग से प्रमाणपत्र देने की मांग नहीं की जाएगी।
फॉर्म की जांच उप जिलाधिकारी स्तर पर की जाती है, जहां 2003 की मतदाता सूची के रिकॉर्ड से मतदाता और उसके अभिभावकों का मिलान कराया जाता है। अगर कोई त्रुटि या संदेह होता है तो संबंधित व्यक्ति को नोटिस देकर स्पष्टीकरण मांगा जाता है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार यदि किसी मतदाता को SIR फॉर्म या बूथ लेवल अधिकारी से शिकायत है, तो वे 1950 हेल्पलाइन पर फोन करके या सीधे निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी और जिला निर्वाचन अधिकारी से मिलकर अपनी बात रख सकते हैं।
लखनऊ में असम से आए मजदूरों पर 'घुसपैठिया' का आरोप
SIR प्रक्रिया के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जिलाधिकारियों को घुसपैठियों की पहचान कर सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए। इसके बाद लखनऊ नगर निगम की टीम गुडंबा थाना क्षेत्र की फूलबाग कॉलोनी पहुंची, जहां झुग्गियों में रहने वाले असम के लगभग 50 मजदूर परिवारों को जगह खाली करने का नोटिस दे दिया गया।
ये मजदूर कचरा बीनने और उठाने का काम करते हैं। असम के गोलपाड़ा जिले की रहने वाली कुलसुम निसा जैसी महिलाओं का नाम वहां की वोटर लिस्ट में दर्ज है और उनके पास आधार कार्ड और एनआरसी से जुड़े दस्तावेज भी हैं। कुलसुम का आरोप है कि नगर निगम और मेयर ने बिना उनकी बात सुने उन्हें बांग्लादेशी और रोहिंग्या कहकर डांटा और झुग्गियां खाली करने को कहा।
पास के ही रहने वाले इनताज अली भी कचरा उठाकर रोजी कमाते हैं और किराए पर झुग्गी में रहते हैं। वे स्वयं को असम के नागरिक और भारतीय वोटर बताते हैं। उनका वोटर आईडी गोलपाड़ा के बहाती गांव का है और वे मौका मिलने पर वहीं मतदान करते हैं। SIR के ताजा फॉर्म भरे गए हैं या नहीं, उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं है, क्योंकि वे पिछले कई महीनों से लखनऊ में ही काम कर रहे हैं।
लखनऊ की मेयर का पक्ष है कि फूलबाग बस्ती में रहने वाले कई लोग वैध कागजात नहीं दिखा पाए, इसलिए उन्हें जगह खाली करनी होगी। इससे यह सवाल और तीखा हो गया है कि SIR प्रक्रिया और घुसपैठियों की पहचान की कार्रवाई कहीं वैध प्रवासी मजदूरों पर ही तो नहीं भारी पड़ रही।
रामपुर की 80 वर्षीय नूरजहां पर मामला दर्ज
SIR के नियमों की सख्त व्याख्या का एक और मामला रामपुर से सामने आया है, जहां 80 वर्षीय नूरजहां पर गलत जानकारी देने का केस दर्ज कर लिया गया। उनके दोनों बेटे पिछले पांच साल से कुवैत में हैं, लेकिन नूरजहां ने SIR फॉर्म में उन्हें मतदाता के रूप में दर्ज करा दिया और विदेश में होने की जानकारी अलग से नहीं दी।
BLO द्वारा डेटा ऑनलाइन अपलोड करने पर यह बात सामने आई और जिलाधिकारी के निर्देश पर नूरजहां तथा उनके दोनों बेटों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई। अब वे सरकार से गुहार लगा रही हैं कि उनकी उम्र और अनजाने में हुई गलती को देखते हुए मामले को खत्म किया जाए।
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने संसद में यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि SIR के नियमों के मुताबिक कोई भी व्यक्ति अपने परिवार के सदस्य का फॉर्म भर सकता है, बशर्ते रिश्ते की सही जानकारी दी जाए। नूरजहां ने खुद को मां के रूप में सही बताया और कोई जालसाजी नहीं की, फिर भी उन पर केस चलाया जा रहा है।
चार करोड़ गायब वोटर और बढ़ती डेडलाइन
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दावा है कि राज्य की मतदाता सूची से लगभग चार करोड़ मतदाता गायब हैं, जिनमें से 90 प्रतिशत भाजपा समर्थक हो सकते हैं। राज्य की अनुमानित आबादी और मतदाताओं की संख्या का गणित यह दिखाता है कि करीब 16 करोड़ मतदाता होने चाहिए, जबकि SIR प्रक्रिया में लगभग 12 करोड़ नाम सामने आए हैं।
इन आंकड़ों और चल रही कठिनाइयों को देखते हुए चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया की डेडलाइन कई राज्यों में बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश में 31 दिसंबर तक, जबकि अंडमान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में 23 दिसंबर तक यह प्रक्रिया जारी रहेगी। गुजरात और तमिलनाडु में SIR पहले ही पूरी हो चुकी है।
निष्कर्ष: तकनीकी प्रक्रिया बनाम सामाजिक जमीनी हकीकत
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को साफ और अद्यतन करना है, लेकिन इसकी सख्त प्रक्रियाएं और एक जैसी शर्तें सभी समुदायों और परिस्थितियों पर समान रूप से लागू नहीं हो पा रही हैं। अयोध्या के साधु-संतों की धार्मिक परंपरा, असम से आए प्रवासी मजदूरों की आजीविका और रामपुर की बुजुर्ग नूरजहां जैसे मामलों ने दिखा दिया है कि कागज और जमीन के बीच बड़ा अंतर है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि चुनाव आयोग मतदाता की पहचान के लिए अधिक लचीले विकल्प, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विशेष प्रावधान और मानवीय दृष्टिकोण अपनाए, तो SIR जैसी प्रक्रियाएं अपने मूल लक्ष्य—सभी योग्य नागरिकों को मताधिकार सुनिश्चित करने—के ज्यादा करीब पहुंच सकती हैं, बजाय इसके कि वे खुद ही नए विवाद और भय का कारण बन जाएं।
Bhavanesh Soni