अरावली विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही आदेश पर रोक लगाई
अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा और खनन से जुड़े विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पूर्व आदेश के अनुपालन पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने कहा कि मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की उच्च स्तरीय समिति आवश्यक है।
विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें और अदालत की टिप्पणियां स्थगित
सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली अवकाश पीठ ने निर्देश दिया कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की समिति की रिपोर्ट, उसकी सिफारिशें और उन पर आधारित सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां अगली सुनवाई तक स्थगित रहेंगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल इन सिफारिशों को लागू नहीं किया जाएगा और पहले इनका स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाएगा।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के सामने दलील दी कि कोर्ट के आदेश, सरकार की भूमिका और पूरी प्रक्रिया को लेकर गलत धारणाएं और भ्रम फैलाए जा रहे हैं। इन्हीं को दूर करने के लिए पहले विशेषज्ञ समिति बनाई गई थी, जिसने अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी और जिसे सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में स्वीकार भी किया था।
कोर्ट की मंशा पर गलतफहमी दूर करने की तैयारी
मुख्य न्यायाधीश ने माना कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और उस पर आधारित न्यायालय की कुछ टिप्पणियों का गलत अर्थ निकाला जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि अदालत की मंशा और निष्कर्षों को लेकर चल रहे भ्रम को दूर करने के लिए स्पष्ट स्पष्टीकरण जरूरी है, ताकि यह विवाद और न बढ़े।
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि उच्च स्तर के विशेषज्ञों की एक नई हाई पावर्ड कमेटी गठित की जाए, जो मौजूदा समिति की रिपोर्ट का गहन विश्लेषण कर स्पष्ट और व्यावहारिक सुझाव दे। इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कानूनी और नीतिगत दिशा तय की जाएगी।
खनन गतिविधियों पर पूर्ण रोक जारी
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियां नहीं होंगी। यानी 21 जनवरी 2026 तक खनन पर पूर्ण रोक लागू रहेगी। इससे पहले, विवाद बढ़ने के बाद केंद्र सरकार ने भी पूरे अरावली रेंज में नए खनन पट्टों के जारी करने पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश जारी किए थे।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अपने लिखित बयान में कहा था कि अरावली श्रृंखला की रक्षा और अनियमित खनन गतिविधियों पर रोक लगाना प्राथमिक लक्ष्य है। मंत्रालय के अनुसार यह आदेश राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक फैली सतत भूवैज्ञानिक श्रृंखला की सुरक्षा के उद्देश्य से दिया गया है।
अरावली विवाद की पृष्ठभूमि
20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की समिति की उस सिफारिश को स्वीकार किया था, जिसमें 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली के रूप में मान्यता देने की बात कही गई थी। इससे पहले 1985 से चल रहे गोदावर्मन और एम.सी. मेहता मामले के तहत अरावली को व्यापक पर्यावरणीय संरक्षण प्राप्त था।
नई परिभाषा के बाद राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में व्यापक विरोध प्रदर्शन होने लगे। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने इसे पारिस्थितिकीय आपदा बताते हुए कहा कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली से बाहर करने पर इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खनन का रास्ता खुल जाएगा, जिससे पहाड़ियों के अस्तित्व पर गंभीर खतरा पैदा होगा।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को गलतफहमी बताते हुए दावा किया कि अरावली का संरक्षण पहले की तरह जारी रहेगा और अनियंत्रित खनन की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके बावजूद पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी कि नई परिभाषा से लगभग 1.50 लाख से अधिक छोटी पहाड़ियों पर खनन का जोखिम बढ़ सकता है और पहले से ही अरावली की लगभग 25 प्रतिशत चोटियां खत्म हो चुकी हैं।
आरपी बलवान की याचिका और आगे की कानूनी प्रक्रिया
हरियाणा के वन विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी आरपी बलवान ने भी केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने गोदावर्मन मामले में ही अतिरिक्त याचिका दायर कर अरावली की नई परिभाषा पर आपत्ति उठाई। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राजस्थान सरकार, हरियाणा सरकार और पर्यावरण मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस मामले की विस्तृत सुनवाई शीतकालीन अवकाश के बाद होगी।
इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही आदेश पर रोक लगाने और नई उच्च स्तरीय समिति के गठन का संकेत देने से यह स्पष्ट है कि न्यायालय स्वयं भी इस संवेदनशील पर्यावरणीय मुद्दे पर अधिक गहराई और सावधानी से विचार करना चाहता है।
निष्कर्ष: अरावली संरक्षण पर अंतिम फैसला अभी बाकी
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा, विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों और उनसे जुड़े अपने आदेशों को लागू करने की प्रक्रिया रोक दी है और खनन गतिविधियों पर 21 जनवरी 2026 तक प्रतिबंध बनाए रखा है। अब एक हाई पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी मौजूदा रिपोर्ट का पुनर्मूल्यांकन करेगी, जिसके बाद अदालत अंतिम निर्णय की दिशा तय करेगी।
इस अंतरिम निर्णय से अरावली पर्वतमाला के भविष्य, क्षेत्रीय पारिस्थितिकी, खनन उद्योग और सरकारी नीतियों पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन कैसे स्थापित होगा, यह अब सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई और नई समिति की रिपोर्ट पर निर्भर करेगा।
Adarsh Chaurasiya