सुप्रीम कोर्ट: पत्नी से खर्च का हिसाब मांगना अपने आप में क्रूरता नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि पति घर के आर्थिक फैसले खुद लेता है या पत्नी से खर्चों का हिसाब मांगता है, तो मात्र इस आधार पर उसे आपराधिक क्रूरता का आरोपी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि इसे अपराध मानने के लिए गंभीर मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न का ठोस सबूत होना जरूरी है।
तेलंगाना के पति-पत्नी के विवाद से जुड़ा मामला
यह मामला तेलंगाना के एक दंपति से जुड़ा था, जिनके बीच लंबे समय से अनबन चल रही थी। पत्नी ने मार्च 2023 में अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और क्रूरता की एफआईआर दर्ज करवाई। उसका आरोप था कि पति घर के पैसों पर पूरा नियंत्रण रखता है, हर खर्च का ब्योरा एक्सेल शीट में दर्ज करने के लिए मजबूर करता है और आर्थिक निर्णयों में उसे कोई भूमिका नहीं देता।
पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि उसे अमेरिका में सॉफ्टवेयर कंसल्टेंट की नौकरी छोड़कर घर पर रहने के लिए बाध्य किया गया और बच्चे के जन्म के बाद उसके वजन को लेकर ताने दिए गए। उसके अनुसार, यह व्यवहार उसके साथ मानसिक क्रूरता था और इसी आधार पर उसने आपराधिक कार्रवाई की मांग की।
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी प्रक्रिया
अप्रैल 2023 में यह मामला तेलंगाना हाईकोर्ट पहुंचा, जहां पति ने एफआईआर रद्द करने की मांग की। हालांकि, हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया। इसके बाद पति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिस पर जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की दो जजों की बेंच ने सुनवाई की।
सुप्रीम कोर्ट ने सारे आरोपों और रिकॉर्डों को देखते हुए कहा कि यह स्थिति भारतीय समाज की एक सामान्य हकीकत को दिखाती है, जहां कई घरों में पुरुष आर्थिक जिम्मेदारी अपने हाथ में रखते हैं। केवल इतनी बात से इसे दंडनीय अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, जब तक इसके कारण महिला को गंभीर मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न न हुआ हो।
जजों की टिप्पणियां: गलत व्यवहार बनाम आपराधिक क्रूरता
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि पति ने गर्भावस्था या बच्चे के जन्म के बाद पत्नी की पर्याप्त रूप से देखभाल नहीं की, या उसके वजन को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की, तो यह निश्चित तौर पर असंवेदनशील और गलत व्यवहार है। यह पति के स्वभाव और सोच पर सवाल उठाता है, लेकिन केवल इसी आधार पर उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत आपराधिक क्रूरता का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
बेंच ने स्पष्ट कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निकालने या आपसी रिश्तों के हिसाब-किताब चुकाने के साधन के रूप में नहीं होना चाहिए। घरेलू जीवन में होने वाले हर विवाद या तकरार को आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता, क्योंकि इससे कानून के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचता है और न्याय प्रणाली पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है।
धारा 498A और नई भारतीय न्याय संहिता की धारा 85
आईपीसी की धारा 498A का उद्देश्य विवाहित महिलाओं को पति या ससुराल पक्ष द्वारा की जाने वाली क्रूरता से सुरक्षा प्रदान करना था। इसके तहत शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न, दहेज की मांग, या जान-माल को खतरे में डालने जैसी गंभीर परिस्थितियां अपराध मानी जाती हैं।
हालांकि, समय के साथ विभिन्न अदालतों ने यह रुख स्पष्ट किया कि हर घरेलू झगड़ा, सामान्य तनाव या पैसों को लेकर मतभेद अपने आप में 498A के तहत अपराध नहीं बन जाता। अब लागू भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 में भी इसी सिद्धांत को दोहराया गया है। इसमें कहा गया है कि वही स्थितियां दंडनीय हैं, जिनमें महिला को गंभीर मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जबकि सामान्य पारिवारिक तनाव, रोजमर्रा की खटपट या बिना ठोस सबूत के आरोपों पर आपराधिक मामला नहीं चलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष और निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले का आकलन करते हुए पाया कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप, भले ही पति के आचरण पर सवाल उठाते हों, परंतु वे आपराधिक क्रूरता की कानूनी परिभाषा को पूरा नहीं करते। खर्चों का हिसाब मांगना, आर्थिक फैसलों पर नियंत्रण रखना या वजन को लेकर ताने मारना निंदनीय हो सकता है, लेकिन प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर इसे गंभीर आपराधिक उत्पीड़न नहीं माना जा सकता।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने पुनः जोर देकर कहा कि दहेज उत्पीड़न और क्रूरता से जुड़े कानूनों का उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों की रक्षा करना है, न कि हर वैवाहिक विवाद को आपराधिक रूप देकर कानून का दुरुपयोग करना।
इस फैसले से संदेश गया है कि आर्थिक निर्णयों को लेकर मतभेद, घर के खर्चों का हिसाब-किताब, या सामान्य वैवाहिक तनाव तब तक अपराध नहीं माने जाएंगे, जब तक उनके कारण पत्नी को साबित रूप से गंभीर मानसिक या शारीरिक नुकसान न हो। अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाने और आपराधिक कानूनों के जिम्मेदार उपयोग पर जोर दिया।
Sharad Shrivastava