सुप्रीम कोर्ट ने महाकाल लोक भूमि अधिग्रहण चुनौती याचिका खारिज, कब्जेदार को राहत नहीं

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सुप्रीम कोर्ट ने महाकाल लोक भूमि अधिग्रहण चुनौती याचिका खारिज, कब्जेदार को राहत नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने महाकाल लोक परिसर भूमि अधिग्रहण के खिलाफ याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन स्थित महाकाल लोक परिसर के पार्किंग क्षेत्र का विस्तार करने के लिए की गई भूमि अधिग्रहण कार्यवाही को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने यह निर्णय मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती करने वाली याचिका पर सुनवाई

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 11 जनवरी को पारित मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी उसी रुख को बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से मना कर दिया।

मस्जिद हटाए जाने से जुड़ी पहले की कार्यवाही

इसी भूमि अधिग्रहण कार्यवाही से जुड़े मामले में सात नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग याचिका भी खारिज कर दी थी। उस याचिका में उज्जैन में एक मस्जिद के पुनर्निर्माण के निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। यह मस्जिद भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही के बाद हटाई गई थी।

लगभग 200 साल पुरानी तकिया मस्जिद को जनवरी में उस भूमि के अधिग्रहण के बाद हटा दिया गया, जिस पर वह बनी हुई थी। अधिकारियों ने महाकाल लोक परिसर के पार्किंग स्थल का विस्तार करने के लिए इस भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी।

सामाजिक प्रभाव आकलन पर दलील और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने से पहले सामाजिक प्रभाव आकलन के अनिवार्य प्रावधान का पालन नहीं किया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता केवल कब्जेदार था और वह जमीन का मालिक नहीं था।

निष्कर्ष: याचिकाकर्ता को राहत नहीं

पीठ की इस टिप्पणी के बाद शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही महाकाल लोक परिसर के पार्किंग क्षेत्र के विस्तार के लिए की गई भूमि अधिग्रहण कार्यवाही पर हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रहा और याचिकाकर्ता को किसी तरह की राहत नहीं मिली।

Pushpendra Chaubey