तिरुपरनकुंद्रम विवाद: धार्मिक टकराव से न्यायपालिका और राजनीति तक पहुंचा विवाद
तमिलनाडु के मदुरै के पास स्थित तिरुपरनकुंद्रम में भगवान मुरुगन के प्रसिद्ध मंदिर के ऊपर की पहाड़ी को लेकर शुरू हुआ धार्मिक विवाद अब राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन गया है। इसे दक्षिण भारत का ‘अयोध्या’ बनने की संभावित जमीन के रूप में देखा जा रहा है, जहां न्यायपालिका, धार्मिक आस्था और द्रविड़ राजनीति आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं।
तिरुपरनकुंद्रम की पहाड़ी पर कार्थिगई दीपम को लेकर विवाद
तिरुपरनकुंद्रम में स्थित मुरुगन मंदिर के ऊपर की पहाड़ी की चोटी को लेकर दो पक्षों के बीच दावा है। हिंदू पक्ष का कहना है कि यह पहाड़ी पवित्र है और यहां सदियों से कार्थिगई दीपम यानी विशाल दीप जलाने की परंपरा चली आ रही है। दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष का दावा है कि पहाड़ी की चोटी पर सिकंदर बादुशा की दरगाह या मस्जिद है और वहां दीप जलाने से सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है और उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।
पिछले सप्ताह कार्थिगई दीपम पर्व के दौरान हिंदू संगठनों ने पहाड़ी की चोटी पर दीप जलाने की अनुमति मांगी, लेकिन पुलिस ने कानून-व्यवस्था का हवाला देकर मंजूरी नहीं दी। इसके बाद दक्षिणपंथी समूहों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं, लाठीचार्ज हुआ और क्षेत्र का माहौल तनावपूर्ण हो गया।
मद्रास हाई कोर्ट का दखल और जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन का फैसला
विवाद मद्रास हाई कोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने तत्काल सुनवाई में हिंदू पक्ष को पहाड़ी की चोटी पर दीप जलाने की अनुमति दे दी। अपने आदेश में उन्होंने कहा कि कुछ लोगों के विरोध के कारण किसी प्राचीन परंपरा को रोका नहीं जा सकता। इस निर्णय ने मामले को नया मोड़ दे दिया और यह सिर्फ स्थानीय विवाद न रहकर देशव्यापी चर्चा का विषय बन गया।
डीएमके और कांग्रेस ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे सांप्रदायिक और पक्षपाती बताया। उनका आरोप है कि जस्टिस स्वामीनाथन ने न्यायिक मर्यादाओं से आगे बढ़कर एक विशेष राजनीतिक विचारधारा को बढ़ावा दिया है।
जज के खिलाफ महाभियोग की मांग
विवाद और गहरा तब हुआ जब डीएमके, कांग्रेस और वामपंथी दलों के सांसदों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग कर दी। पत्र में आरोप लगाया गया कि जज का आचरण एक न्यायाधीश की निष्पक्षता के सिद्धांतों के विरुद्ध है और वे लगातार ऐसे फैसले तथा टिप्पणियां कर रहे हैं जो दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा को लाभ पहुंचाती हैं और राज्य में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाती हैं। इसी आधार पर उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई है।
मोहन भागवत का बयान और संघ की रणनीति
इसी पृष्ठभूमि में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की तमिलनाडु यात्रा विशेष महत्व रखती है। वे संघ के शताब्दी वर्ष समारोह के तहत चार दिन के दौरे पर राज्य में हैं। त्रिची (तिरुचिरापल्ली) में दिए गए एक बयान में उन्होंने तिरुपरनकुंद्रम में कार्थिगई दीपम विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मामला अंततः हिंदुओं के पक्ष में ही सुलझेगा और अगर जरूरत पड़ी तो वे स्वयं भी इस मुद्दे पर सक्रिय रूप से उतरने से पीछे नहीं हटेंगे।
भागवत ने संकेत दिया कि तमिलनाडु में हिंदुओं की जागृति इच्छित परिणाम लाने के लिए पर्याप्त है और यदि मामले को आगे बढ़ाने की आवश्यकता हुई तो राज्य में सक्रिय हिंदू संगठन उन्हें आगे की रणनीति बताएंगे। उनके इस बयान को दक्षिण भारत में संघ की बदलती रणनीति और आक्रामक रुख के रूप में देखा जा रहा है।
अमित शाह की टिप्पणी और राजनीतिक पृष्ठभूमि
इसी बीच, संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने भी इस मुद्दे का जिक्र किया, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक तापमान और बढ़ गया। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने मामले की पृष्ठभूमि में हिंदुओं के अधिकारों की चर्चा की, जिसके बाद विपक्ष द्वारा जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की कोशिश को भी एक बड़े राजनीतिक टकराव की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
क्या तिरुपरनकुंद्रम ‘दक्षिण का अयोध्या’ बन सकता है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी और आरएसएस तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए लंबे समय से ऐसे भावनात्मक मुद्दे की तलाश में थे, जो जातिगत समीकरणों से ऊपर उठकर धर्म आधारित वोट ध्रुवीकरण कर सके। तिरुपरनकुंद्रम में धार्मिक स्थल, दो समुदायों के दावे और न्यायालयी दखल जैसे सभी तत्व मौजूद हैं, जो इसे बड़े आंदोलन का रूप दे सकते हैं।
अयोध्या और काशी की तरह यहां भी एक ही स्थान पर दो धर्मों के दावों और विवाद की स्थिति है। साथ ही, भगवान मुरुगन तमिल हिंदुओं के सबसे पूजनीय देवताओं में से हैं और मुरुगन से जुड़े किसी मुद्दे पर तमिल भावनाएं प्रबल हो जाती हैं। अदालत का हस्तक्षेप और जज के खिलाफ महाभियोग की मांग ने हिंदू संगठनों को लामबंद होने का अवसर भी प्रदान किया है।
डीएमके और कांग्रेस की राजनीतिक चिंता
डीएमके और कांग्रेस के लिए यह मामला सिर्फ धार्मिक विवाद नहीं, बल्कि राजनीतिक चुनौती भी बनता दिख रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, डीएमके को आशंका है कि यदि यह मुद्दा और भड़कता है, तो उसका पारंपरिक अल्पसंख्यक और ओबीसी वोट बैंक तो उसके साथ रह सकता है, लेकिन मुरुगन भक्तों का एक हिस्सा उससे दूर हो सकता है।
इसी वजह से डीएमके सरकार एक तरफ पुलिस के जरिए सख्त कार्रवाई कर रही है, वहीं दूसरी ओर कानूनी मोर्चे पर जजों को घेरने की कोशिश भी जारी है। विपक्षी दलों द्वारा जस्टिस स्वामीनाथन पर महाभियोग की मांग को इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
आगे की राह और संभावित असर
तिरुपरनकुंद्रम विवाद ने तमिलनाडु की राजनीति में एक ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है, जिसके जल्द शांत होने के आसार दिखाई नहीं देते। विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा 2026 के विधानसभा चुनावों तक राज्य की राजनीति और सामाजिक माहौल को प्रभावित कर सकता है।
एक ओर धार्मिक अधिकार और सांप्रदायिक सौहार्द का सवाल उठ रहा है, दूसरी ओर न्यायपालिका की निष्पक्षता, न्यायिक सक्रियता और राजनीतिक दबावों पर भी बहस तेज हो गई है। आरएसएस प्रमुख के सख्त बयान, गृहमंत्री की संसद में टिप्पणी, हाई कोर्ट के फैसले पर सवाल और महाभियोग की मांग—इन सबने मिलकर तिरुपरनकुंद्रम को क्षेत्रीय विवाद से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना दिया है।
Lokendra Mishra