सवाल दर सवाल हेडिंग (उत्तर प्रदेश में ‘यादव फैक्टर’ और मोहन की दस्तक, तस्वीरों में छिपे सियासी संकेत) उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई बार शब्दों से ज्यादा तस्वीरें बोलती हैं,मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का हालिया उत्तर प्रदेश दौरा भी कुछ ऐसा ही संदेश छोड़ गया..आधिकारिक तौर पर यह दौरा स्वर्गीय प्रतीक यादव को श्रद्धांजलि देने और परिवार के प्रति संवेदना प्रकट करने का था, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस यात्रा की हर तस्वीर, हर मुलाकात और हर संदेश के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं.. जो उत्तर प्रदेश की यादव पॉलिटिक्स में अखिलेश के सामने मोहन को कहीं ना कहीं स्थापित कर रही है..यादव परिवार के बीच पहुंचकर मोहन का संवेदना जताना सिर्फ समाज तक संदेश पहुंचाना और केवल मानवीय पहलू नहीं था, बल्कि भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है जिसमें वह उत्तर प्रदेश की यादव राजनीति में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहती है.. मुलायम सिंह अखिलेश यादव परिवार से ही जुड़ी अपर्णा यादव पहले से भाजपा के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखने वाली नेता मानी जाती हैं..ऐसे में डॉ मोहन यादव की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि भाजपा समाजवादी परिवार और यादव समाज दोनों के भीतर संवाद और राजनीतिक स्पेस तलाश रही है..इस दौरे की सबसे चर्चित तस्वीरों में भाजपा के मध्य प्रदेश प्रभारी और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेता महेंद्र सिंह से मुलाकात भी रही..यह मुलाकात केवल संगठनात्मक शिष्टाचार नहीं मानी जा रही..महेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश की राजनीति और भाजपा संगठन दोनों में मजबूत पकड़ रखते हैं.. मध्य प्रदेश में प्रभारी रहते हुए उनका डॉ मोहन यादव के साथ बेहतर राजनीतिक तालमेल रहा है अब जब उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा के लिए 2029 लोकसभा चुनाव से पहले सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है, तब “महेंद्र — मोहन ट्यूनिंग” के राजनीतिक अर्थ निकाले जाना स्वाभाविक है.. इसके अलावा एक और अहम तस्वीर उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात की रही.. गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल मध्य प्रदेश की भी राज्यपाल रह चुकी हैं और डॉ मोहन यादव के शिक्षा मंत्री कार्यकाल के शुरुआती दौर की महत्वपूर्ण संवैधानिक कड़ी रही हैं..ऐसे में यह मुलाकात केवल औपचारिक नहीं बल्कि राजनीतिक और व्यक्तिगत समीकरणों की निरंतरता का संकेत भी मानी गई..भाजपा की राजनीति में रिश्तों और संवाद का अपना महत्व है और यही कारण है कि इन तस्वीरों ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी.. असल सवाल यह है कि क्या भाजपा उत्तर प्रदेश में डॉ मोहन यादव के चेहरे को रणनीतिक रूप से आगे बढ़ा रही है.. इस बात में दम है और इसके संकेत लगातार दिखाई दे रहे हैं..बिहार, असम, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भाजपा की आक्रामक चुनावी रणनीति और लगातार मिली सफलताओं के बाद अब पार्टी उत्तर प्रदेश को अगले बड़े राजनीतिक युद्धक्षेत्र के रूप में देख रही है..पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल संग अखिलेश और उनकी समाजवादी पार्टी ने जिस तरह खासतौर से यादव— मुस्लिम और पीडीए समीकरण के सहारे भाजपा को चुनौती दी, उसके बाद भाजपा भी यादव समाज के भीतर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश में जुटी है.. डॉ मोहन यादव इस रणनीति में सबसे उपयुक्त चेहरा माने जा रहे हैं वह मुख्यमंत्री हैं, ओबीसी समाज से आते हैं और भाजपा उन्हें “राष्ट्रवादी यादव नेतृत्व” के रूप में स्थापित करने का प्रयास करती दिखाई दे रही है..हालांकि भाजपा की राजनीति में योगी आदित्यनाथ का कद और नेतृत्व निर्विवाद है, लेकिन डॉ मोहन यादव को उत्तर प्रदेश में सक्रिय करना योगी के विकल्प के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक विस्तार की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है..भाजपा शायद यह संदेश देना चाहती है कि अखिलेश यादव ही यादव राजनीति के अकेले प्रतिनिधि नहीं हैं..डॉ मोहन यादव के बयान भी इसी दिशा की ओर संकेत करते दिखाई दिए, जहां उन्होंने व्यक्तिगत संवेदना के साथ सामाजिक समरसता, संगठन और राष्ट्रीय नेतृत्व की सोच को महत्व दिया..यही कारण है कि उनका यह उत्तर प्रदेश दौरा केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम बनकर नहीं रह गया, बल्कि भाजपा की भविष्य की सामाजिक और चुनावी रणनीति की एक झलक भी बन गया.. ✅✅✅ उत्तर प्रदेश में ‘यादव फैक्टर’ पर भाजपा की नई पटकथा और डॉ. मोहन यादव की बढ़ती भूमिका उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयान, मुलाकातें और प्रतीकात्मक मौजूदगी अक्सर भविष्य की बड़ी रणनीतियों का संकेत होती हैं... मोदी शाह और संघ के खिलाफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के हालिया बयान पर भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया, समाजवादी पार्टी के खिलाफ लगातार बढ़ते हमले, मायावती की चुप्पी और इसी बीच मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का लखनऊ पहुंचकर स्वर्गीय प्रतीक यादव को श्रद्धांजलि देना इन घटनाओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता... कड़ियों को जोड़ें तो यूपी इलेक्शन की बीजेपी स्क्रिप्ट की शुरुआत नजर आने लगी.. राजनीति में कई बार व्यक्तिगत कार्यक्रम भी राजनीतिक संदेश छोड़ जाते हैं... डॉ. मोहन यादव का मुख्य कार्यक्रम भले श्रद्धांजलि देने का रहा हो, लेकिन जिस तरह उन्होंने उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और भाजपा के प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह से मुलाकात की, उसने राजनीतिक गलियारों में कई नए सवाल खड़े कर दिए... सबसे बड़ा सवाल यही कि क्या भाजपा अब हिंदुत्व और डबल इंजन के विकास के साथ सामाजिक समीकरणों को दुरुस्त करने के लिए उत्तर प्रदेश में “यादव बनाम यादव” की रणनीति को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने की तैयारी में है... (भाजपा की नई सामाजिक रणनीति) लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने यह महसूस किया कि उत्तर प्रदेश में उसका सबसे बड़ा राजनीतिक मुकाबला सिर्फ कांग्रेस से नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के सामाजिक समीकरणों से है... अखिलेश यादव ने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को जिस तरह धार दी, उसने भाजपा को नई सामाजिक रणनीति पर सोचने के लिए मजबूर किया...यहीं से डॉ. मोहन यादव का महत्व बढ़ता दिखाई देता है... भाजपा लंबे समय से यह कोशिश करती रही है कि यादव समाज को पूरी तरह समाजवादी पार्टी के प्रभाव से बाहर निकाला जाए... इसके लिए पार्टी को ऐसा चेहरा चाहिए था जो ओबीसी राजनीति में स्वीकार्य हो, प्रशासनिक अनुभव रखता हो और हिंदुत्व तथा संगठन दोनों के बीच संतुलन बना सके... मोहन यादव मध्य प्रदेश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का चेहरा बनचुके.. मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव तेजी से उसी भूमिका में उभरते दिखाई दिए हैं... भाजपा उन्हें सिर्फ एक राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्रीय ओबीसी चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट कर रही है... यादव पॉलिटिक्स बीजेपी का नया टारगेट माना जा सकता है.. (असम से बंगाल तक ‘मोहन मॉडल’) भाजपा की हालिया चुनावी रणनीतियों पर नजर डालें तो डॉ. मोहन यादव को कई राज्यों में सक्रिय भूमिका दी गई... बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों तक उन्हें प्रचार और संगठनात्मक बैठकों में आगे रखा गया...इसके पीछे केवल औपचारिकता नहीं बल्कि स्पष्ट राजनीतिक गणित दिखाई देता है... भाजपा जानती है कि आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति में ओबीसी नेतृत्व का महत्व और बढ़ेगा... नरेंद्र मोदी पहले से ही पिछड़ा वर्ग की राजनीति के सबसे बड़े राष्ट्रीय चेहरे हैं, लेकिन राज्यों में क्षेत्रीय सामाजिक नेतृत्व भी उतना ही जरूरी हो गया है... यही कारण है कि भाजपा अब उत्तर भारत में “ओबीसी प्लस हिंदुत्व” मॉडल को नए चेहरों के साथ मजबूत करने की कोशिश कर रही है... डॉ. मोहन यादव इसी प्रयोग का हिस्सा माने जा रहे हैं... (उत्तर प्रदेश में क्यों अहम है ‘मोहन फैक्टर’?) उत्तर प्रदेश में यादव समाज लंबे समय से समाजवादी पार्टी की मुख्य ताकत रहा है... हालांकि पिछले कुछ चुनावों में भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी वोटों पर मजबूत पकड़ बनाई, लेकिन यादव मतदाता का बड़ा हिस्सा अब भी अखिलेश यादव के साथ खड़ा दिखाई देता है...भाजपा की रणनीति अब केवल गैर-यादव पिछड़ों तक सीमित नहीं दिखती... पार्टी यादव समाज में भी सेंध लगाने की कोशिश कर रही है... यही वजह है कि भाजपा लगातार ऐसे यादव नेताओं को आगे बढ़ा रही है जिनकी छवि आक्रामक हिंदुत्व और प्रशासनिक नेतृत्व दोनों की हो...डॉ. मोहन यादव यहां भाजपा के लिए उपयोगी चेहरा बन सकते हैं... वह एक मुख्यमंत्री हैं, शिक्षित हैं, संगठन से निकले नेता हैं और सबसे अहम उनका राजनीतिक उदय अचानक नहीं बल्कि वैचारिक पृष्ठभूमि से हुआ है... भाजपा इसे“समाजवादी परिवारवाद बनाम भाजपा का संगठनात्मक नेतृत्व” के रूप में भी पेश कर सकती है... मुख्यमंत्री बनने के बाद मध्य प्रदेश में यादव वोट बैंक भाजपा की ताकत बन चुका है.. (प्रतीक यादव प्रकरण और राजनीतिक संदेश) अखिलेश यादव खासतौर से मुलायम यादव परिवार से जुड़े स्वर्गीय प्रतीक यादव के परिवार से मुलाकात को केवल संवेदना तक सीमित मानना राजनीतिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा... प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव पहले ही भाजपा के करीब मानी जाती हैं और पार्टी उन्हें सॉफ्ट हिंदुत्व तथा यादव समाज के बीच एक सेतु के रूप में देखती रही है... ऐसे समय में डॉ. मोहन यादव का वहां पहुंचना भाजपा की उस रणनीति को मजबूती देता दिखता है जिसमें वह समाजवादी परिवार के भीतर भी अपने लिए संवाद और सहानुभूति की जगह बनाना चाहती है...राजनीति में प्रतीकात्मकता का महत्व बहुत बड़ा होता है... भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि यादव समाज केवल समाजवादी पार्टी की जागीर नहीं है... भाजपा भी उस समाज के भीतर सम्मान और प्रतिनिधित्व देने का दावा कर रही है... (योगी-अखिलेश मुकाबले में तीसरा यादव चेहरा?) उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से योगी आदित्यनाथ बनाम अखिलेश यादव की सीधी धुरी पर घूमती रही है... एक तरफ हिंदुत्व और कानून व्यवस्था का मॉडल, दूसरी तरफ सामाजिक न्याय और ओबीसी राजनीति का दावा... लेकिन भाजपा यदि डॉ. मोहन यादव को उत्तर प्रदेश में ज्यादा सक्रिय करती है तो यह मुकाबला नई दिशा ले सकता है... भाजपा का उद्देश्य शायद योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को चुनौती देना नहीं बल्कि उसे सामाजिक विस्तार देना हो सकता है...योगी की छवि एक मजबूत हिंदुत्ववादी नेता की है, जबकि डॉ. मोहन यादव को भाजपा ओबीसी प्रतिनिधित्व के रूप में आगे रख सकती है... इससे पार्टी यादव समाज के भीतर मनोवैज्ञानिक प्रभाव बनाने की कोशिश कर सकती है...यानी भाजपा का संभावित संदेश यह हो सकता है कि “अखिलेश ही यादव राजनीति का एकमात्र चेहरा नहीं हैं...” भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम निकट भविष्य में जब सामने आएगी तो उत्तर प्रदेश के चुनाव की पटकथा और उसमें दूसरे नेताओं की सोशल इंजीनियरिंग गौर करने लायक होगी.. (मायावती की चुप्पी और बदलते समीकरण) इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य में बसपा सुप्रीमो मायावती की रणनीतिक चुप्पी भी महत्वपूर्ण है... कांग्रेस के साथ संवाद की खबरों को उन्होंने जिस तरह नजरअंदाज किया, उससे साफ है कि वह अभी खुलकर किसी गठबंधन की दिशा में नहीं बढ़ना चाहतीं... राहुल गांधी का अमेठी रायबरेली दौरे के दौरान भाजपा नेतृत्व खासतौर से मोदी साहब के साथ संघ को भी सीधे निशाने पर लेना यदि कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है.. तो भाजपा हिंदुत्व के साथ सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत करने के लिए मोहन यादव को फ्रंट पर लाकर बाद चेहरा बना सकती है.. ऐसे मेंमायावती का यह “साइलेंट मूव” भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों के लिए मायने रखता है... यदि बसपा पूरी ताकत से चुनावी मैदान में उतरती है तो सबसे ज्यादा असर विपक्षी वोटों पर पड़ सकता है... भाजपा इसी स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश करेगी... भाजपा यदि यादव समाज के भीतर भी कुछ प्रतिशत समर्थन बढ़ाने में सफल होती है तो उत्तर प्रदेश का पूरा चुनावी गणित बदल सकता है... भाजपा की लंबी रणनीति भाजपा अब केवल चुनाव जीतने वाली पार्टी नहीं बल्कि सामाजिक पुनर्संरचना करने वाली राजनीतिक शक्ति की तरह काम कर रही है... पार्टी जातीय पहचान को पूरी तरह नकारती नहीं बल्कि उसे अपने व्यापक राष्ट्रवादी नैरेटिव में समाहित करने की कोशिश करती है...डॉ. मोहन यादव का उदय इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है... भाजपा उन्हें केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रख रही... जिस तरह उन्हें राष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय किया जा रहा है, उससे साफ संकेत मिलता है कि आने वाले विधानसभा चुनावों और 2029 की राजनीति में उनकी भूमिका और बढ़ सकती है... (क्या यह कहना अभी जल्दबाजी होगी?) समीकरण यदि तेजी से बदल रहे हैं तो बीजेपी की सियासी जमावट के लिए अभी थोड़ा इंतजार करना होगा.. योगी मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद नितिन नवीन की नई टीम उसमें उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी और मोदी मंत्रिमंडल में एडजस्टमेंट गौर करने लायक होगा..फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश में डॉ. मोहन यादव को अखिलेश यादव के मुकाबले सीधे उतारने का फैसला कर लिया है... लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि भाजपा भविष्य की सामाजिक लड़ाई के लिए नए चेहरे और नए समीकरण तैयार कर रही है... राजनीति में कई बार संकेत ही सबसे बड़ा संदेश होते हैं... लखनऊ की मुलाकातें, श्रद्धांजलि कार्यक्रम की टाइमिंग, भाजपा नेतृत्व का बढ़ता भरोसा और राष्ट्रीय स्तर पर डॉ. मोहन यादव की सक्रियता—ये सभी घटनाएं किसी बड़ी रणनीतिक तैयारी की ओर इशारा करती हैं...उत्तर प्रदेश की राजनीति में आने वाले समय में यदि भाजपा “यादव फैक्टर” को नए अंदाज में पेश करती है तो डॉ. मोहन यादव उसका प्रमुख चेहरा बन सकते हैं... और तब यह लड़ाई केवल योगी बनाम अखिलेश नहीं बल्कि “यादव राजनीति की नई परिभाषा” की लड़ाई भी बन सकती है... बॉक्स (उत्तर प्रदेश पहुंचे मोहन ने लिया राहुल को निशाने पर ) उत्तर प्रदेश की चुनावी सरगर्मियों के बीच मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का राहुल गांधी पर हमला केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि भाजपा की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है... लखनऊ दौरे, यादव परिवार से मुलाकात और भाजपा नेताओं के साथ संवाद के बीच मोहन यादव ने राहुल गांधी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “नेता प्रतिपक्ष के मुंह से ऐसी भाषा दुर्भाग्यपूर्ण है... यह समूचे लोकतंत्र का अपमान है... उन्हें तुरंत इस्तीफा देना चाहिए...” भाजपा इसे कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव बनाने में इस्तेमाल कर रही है... खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा जहां ओबीसी और यादव राजनीति को नए ढंग से साधने में जुटी है, वहीं डॉ मोहन यादव को आक्रामक यादव चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है... ऐसे में उनका बयान केवल प्रतिक्रिया नहीं बल्कि यूपी की चुनावी रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है...
उत्तर प्रदेश से मोहन ने निशाने पर लिया राहुल को क्यों.. (सवाल दर सवाल) राकेश अग्निहोत्री मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का उत्तर प्रदेश दौरा.. सामाजिक सरोकार.. संवेदनाएं व्यक्त करने के साथ सियासी संदेश देने के लिए भी याद किया जाएगा.. राहुल ग