20 साल बाद उद्धव और राज ठाकरे की पार्टियों में चुनावी गठबंधन
महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव करते हुए शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) अध्यक्ष राज ठाकरे ने ब्रिहन मुंबई नगर निगम चुनाव समेत 29 नगर निगमों में मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। यह गठबंधन करीब दो दशक बाद दोनों के बीच आई दूरी खत्म होने की राजनीतिक घोषणा माना जा रहा है।
बीएमसी समेत 29 नगर निगमों में साथ लड़ेंगी दोनों पार्टियां
बुधवार को हुई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने बताया कि आगामी बीएमसी चुनाव सहित राज्य के 29 नगर निगमों में उनकी पार्टियां गठबंधन के तहत मैदान में उतरेंगी। इन सभी निकायों के लिए मतदान 15 जनवरी को होगा और परिणाम 16 जनवरी को घोषित किए जाएंगे।
संयुक्त घोषणा से पहले दोनों नेता शिवाजी पार्क स्थित बालासाहेब ठाकरे के स्मारक पर पहुंचे और उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों ने संकेत दिया कि महाराष्ट्र की राजनीति में वे खुद को एक साझा विचारधारा की धुरी के रूप में पेश करना चाहते हैं।
उद्धव और राज की बातें: एकजुटता पर जोर
उद्धव ठाकरे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनकी सोच एक है और अगर वे बंटे रहे तो बिखर जाएंगे। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के हित में सभी समान विचार वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट होना चाहिए। राज ठाकरे ने भी इस नए समीकरण को पुरानी दूरियों को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ने की दिशा में कदम बताया।
कुछ महीने पहले ही दोनों नेताओं की सार्वजनिक मुलाकात और गले मिलने की तस्वीरें सामने आई थीं, जिन्हें राजनीतिक हलकों में नई नजदीकियों के संकेत के रूप में देखा गया था। अब गठबंधन की औपचारिक घोषणा ने उन संकेतों को ठोस राजनीतिक गठजोड़ में बदल दिया है।
बीएमसी चुनाव क्यों अहम माना जा रहा है
ब्रिहन मुंबई नगर निगम देश की सबसे समृद्ध नगरपालिका संस्थाओं में से एक है और लंबे समय तक शिवसेना का गढ़ रही है। सत्ता परिवर्तन और शिवसेना में फूट के बाद बीएमसी पर कब्जा साख का सवाल बन चुका है। इसी वजह से उद्धव और राज का साथ आना विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण समीकरण बना सकता है।
उद्धव-राज के बीच दूरी कैसे बढ़ी थी
राज ठाकरे ने 1989 में महज 21 साल की उम्र में शिवसेना की छात्र इकाई भारतीय विद्यार्थी परिषद की कमान संभाली थी। 1993 तक उन्होंने बड़ी संख्या में युवाओं को संगठन से जोड़ा और शिवसेना का मजबूत जमीनी नेटवर्क विकसित करने में योगदान दिया।
2002 तक पार्टी की गतिविधियों में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों अहम भूमिका निभा रहे थे। 2003 में महाबलेश्वर में हुए शिवसेना के अधिवेशन के दौरान बालासाहेब ठाकरे ने उद्धव को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया। इस फैसले के बाद संगठन में उद्धव की पकड़ लगातार बढ़ती गई और पार्टी के प्रमुख फैसलों पर उनका प्रभाव स्पष्ट दिखने लगा।
राज ठाकरे को यह बदलाव रास नहीं आया और धीरे-धीरे मतभेद खुले टकराव में बदलते गए। अंततः 9 मार्च 2006 को राज ठाकरे ने शिवाजी पार्क में अलग पार्टी बनाने की घोषणा की और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की स्थापना की। उन्होंने मनसे को मराठी मानुष की पार्टी बताते हुए दावा किया था कि यही पार्टी आगे चलकर महाराष्ट्र की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाएगी।
नई राजनीतिक तस्वीर और आगे की दिशा
अब, करीब 20 साल बाद, दोनों नेताओं का फिर से एक मंच पर आना महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण गढ़ सकता है। स्थानीय निकाय चुनावों में यह गठबंधन सीधे तौर पर सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन और विशेषकर भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले को और कड़ा कर सकता है।
हाल ही में हुए महाराष्ट्र निकाय चुनावों में महायुति गठबंधन को बड़ी जीत मिली थी और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। ऐसे में बीएमसी और अन्य नगर निगमों के चुनाव में उद्धव-राज गठबंधन की सफलता या विफलता से राज्य की भविष्य की राजनीतिक दिशा काफी हद तक तय हो सकती है।
निष्कर्ष
उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की पार्टियों के बीच गठबंधन केवल चुनावी समायोजन नहीं, बल्कि दो दशक पुराने पारिवारिक और राजनीतिक विवादों पर पुनर्विचार की प्रक्रिया भी है। बीएमसी समेत 29 नगर निगमों में होने वाले चुनाव इस नई एकजुटता की पहली परीक्षा होंगे। परिणाम यह तय करेंगे कि शिवसेना (यूबीटी) और मनसे का यह मिलन महाराष्ट्र की राजनीति में स्थायी मोड़ बनता है या केवल एक चुनावी प्रयोग साबित होता है।
Ravi Yadav