मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बार फिर एक सवाल तेजी से तैर रहा है कि क्या कांग्रेस अपने सबसे अनुभवी और संकटमोचक चेहरे कमलनाथ को राज्यसभा भेजने की तैयारी कर रही है? कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकाअर्जुन खरगे से बुधवार शाम कमलनाथ की मुलाकात के बाद अटकलों का बाजार गर्म है..चर्चा यह भी है कि यदि ऐसा होता है तो संसद के उच्च सदन में कमलनाथ की मौजूदगी केवल एक सीट भरने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह कांग्रेस की राष्ट्रीय और मध्यप्रदेश की आंतरिक राजनीति दोनों के लिए बड़ा संदेश होगी. दरअसल, मध्यप्रदेश कांग्रेस इस समय केवल भाजपा से नहीं, बल्कि अपने भीतर के असंतोष, गुटबाजी और समन्वय संकट से भी जूझ रही है..ऐसे समय में कांग्रेस आलाकमान को ऐसा चेहरा चाहिए जो संगठन, विधायकों और नेतृत्व के बीच भरोसे का पुल बन सके..यही कारण है कि कमलनाथ का नाम सबसे आगे दिखाई देता है..राजनीति में अनुभव, संगठन पर पकड़, संसदीय समझ और चुनावी प्रबंधन ये गुण शायद ही किसी दूसरे नेता में एक साथ दिखाई देते हों..कमलनाथ केवल मध्यप्रदेश के नेता नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं..जिसने दिल्ली से लेकर गांव तक राजनीति को करीब से जिया है..10 बार लोकसभा सांसद रहना,चार बार केंद्रीय मंत्री की जिम्मेदारी संभालना और फिर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में सरकार चलाना..यह अनुभव उन्हें कांग्रेस के भीतर एक अलग स्थान देता है..संसद संचालन, रणनीतिक प्रबंधन और राजनीतिक संकटों से निपटने की उनकी क्षमता कांग्रेस के लिए आज भी उपयोगी मानी जाती है. 2018 का विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है..जब भाजपा को सत्ता से बाहर करना लगभग असंभव माना जा रहा था, तब कमलनाथ ने संगठन, जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दों और बूथ प्रबंधन के जरिए कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया। भाजपा आज जिस बूथ मैनेजमेंट और पेज प्रमुख मॉडल को अपनी ताकत बताती है, उसका प्रयोग कमलनाथ छिंदवाड़ा में वर्षों पहले कर चुके थे..यही वजह है कि उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि “परफेक्ट पॉलिटिकल मैनेजर” माना जाता है. यदि कमलनाथ राज्यसभा जाते हैं तो यह केवल उनकी व्यक्तिगत वापसी नहीं होगी, बल्कि कांग्रेस की रणनीतिक जरूरत भी होगी..दिल्ली में बैठे आलाकमान अच्छी तरह जानते हैं कि मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में संगठन को संभालने के लिए केवल आक्रामक भाषण नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन, अनुभव और भरोसेमंद प्रबंधन चाहिए..कमलनाथ शायद उसी जरूरत का सबसे मजबूत जवाब हैं..मध्यप्रदेश की राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि कुछ नेता चुनाव लड़ते हैं और कुछ नेता चुनाव “मैनेज” करते हैं..कमलनाथ उन चुनिंदा नेताओं में गिने जाते हैं जो राजनीति को केवल भाषणों से नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति और रिश्तों से चलाना जानते हैं..यही वजह है कि राज्यसभा की संभावित राह में कांग्रेस को कमलनाथ केवल एक सांसद नहीं, बल्कि संकटमोचक के रूप में दिखाई दे रहे हैं..और वो तब जब कर्नाटक में एक नया पॉलिटिकल ट्विस्ट देखने मिल रहा है..वो भी यह कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने इस्तीफे का ऐलान कर दिया तो डीके शिवकुमार को आशीर्वाद भी दिया..ऐसे में यह भी माना जा रहा कि..कमलनाथ के अलावा अब एक और अनुभवी और वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया को कांग्रेस राज्यसभा के सदन में ले जाएगी..और इन सीनियर नेताओं की जोड़ी वहां नजर आएगी... राज्यसभा चुनाव के गणित ने भी कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है..वर्तमान स्थिति में कांग्रेस के पास लगभग 62 विधायक हैं, जबकि एक सीट जीतने के लिए 58 वोट आवश्यक माने जा रहे हैं..यानी कांग्रेस के पास केवल सीमित बढ़त है..दूसरी ओर भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत के साथ अतिरिक्त विधायक भी हैं..ऐसे में कांग्रेस को सबसे ज्यादा डर इस बात का है कि कहीं चुनावी हलचल के दौरान टूट-फूट या क्रॉस वोटिंग का खतरा न पैदा हो जाए..मध्यप्रदेश में कई विधायकों की संगठन और नेता प्रतिपक्ष को लेकर नाराजगी की खबरें पहले ही सुर्खियों में हैं..ऐसे माहौल में कांग्रेस ऐसा चेहरा चाहती है जिसकी बात विधायक भी मानें और जिस पर दिल्ली नेतृत्व भी भरोसा करे। कमलनाथ इस कसौटी पर सबसे मजबूत दिखाई देते हैं..पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पहले ही राज्यसभा न जाने की बात कह चुके हैं..ऐसे में कांग्रेस के पास विकल्प सीमित हैं..पार्टी को ऐसे नेता की जरूरत है जो टकराव नहीं, समन्वय की राजनीति में माहिर हो..और कमलनाथ में यह गुण जरूर दिखाई देता है..आदिवासी नेतृत्व को आगे बढ़ाने से लेकर महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा, किसानों की आय और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दों पर उनका काम उन्हें बहुआयामी नेता की छवि देता है..
.बड़ी खबर.. राज्यसभा चुनाव 'कमलनाथ'..केवल सांसद नहीं..कांग्रेस के संकटमोचक बनेंगे? (महेंद्र विश्वकर्मा)