(इधर न्यायालय की नई तारीख उधर नरोत्तम ने गंगा नहाई..दतिया की सियासत में नई बिसात… उपचुनाव की आहट और वापसी की दस्तक?)राजनीति में किसी बड़े नेता का गंगा स्नान केवल धार्मिक आस्था का विषय भर नहीं माना जाता… खासकर तब… जब उसके आसपास चुनाव… संकट… वापसी और राजनीतिक संभावनाओं की चर्चा चल रही हो… मध्यप्रदेश के पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के संदर्भ में भी यही राजनीतिक व्याख्याएं सामने आ सकती हैं…विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र तोमर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से मुलाकात के बाद नरोत्तम का गंगा स्नान सुर्खियों में है.. इसे पहला संदेश “नई संभावनाओं के बीच सियासत की नई सक्रियता और नई शुरुआत” का माना जा सकता है… भारतीय राजनीतिक प्रतीकों में गंगा स्नान को कई बार पुराने दौर से निकलकर नई ऊर्जा… नई पारी और नई राजनीतिक शुरुआत के संकेत के रूप में पढ़ा जाता है… ऐसे समय में जब दतिया सीट को लेकर उपचुनाव की अटकलें हैं और कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की कानूनी स्थिति चर्चा में है… इसे संभावित वापसी की मानसिक तैयारी के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है… दूसरा संदेश “राजनीतिक धैर्य और प्रतीक्षा” का निकलता है… यानी नेता सार्वजनिक तौर पर बेचैनी नहीं दिखाता… लेकिन संकेत देता है कि समय बदलने का इंतजार है… मानो संदेश हो—“राजनीति में हर हार अंतिम नहीं होती…” तीसरी व्याख्या “शुद्धि या रीसेट” की होती है… राजनीति में हार के बाद नेता अक्सर जनसंपर्क… धार्मिक यात्राओं और प्रतीकात्मक कार्यक्रमों के जरिए अपने समर्थकों को संदेश देते हैं कि संघर्ष जारी है और वापसी की इच्छा जीवित है…चौथा संदेश “मौन राजनीतिक संवाद” का हो सकता है… बिना कुछ कहे समर्थकों और संगठन को यह संकेत देना कि राजनीतिक अध्याय बंद नहीं हुआ… हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये राजनीतिक व्याख्याएं और प्रतीकात्मक अर्थ हैं… तथ्य नहीं… गंगा स्नान व्यक्तिगत आस्था का विषय भी हो सकता है… लेकिन राजनीति में समय और प्रतीक अक्सर चर्चा का हिस्सा बन जाते हैं…नरोत्तम की दतिया सीट पर न्यायालय की नई तारीख यानी यह समय सीमा कुछ सियासी संदेश छोड़ रहे तो साथ ही नरोत्तम का इस मौके पर हरिद्वार में गंगा स्नान भी सियासत में नई संभावनाओं की नई आस का संकेत देते हुए देखे जा सकते.. ✅ राजनीति में संकेत कभी सीधे नहीं आते… वे घटनाओं… समय और परिस्थितियों के बीच छिपे होते हैं… मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों ऐसा ही एक नया संकेत दतिया से निकलता दिख रहा है… एक तरफ दिल्ली हाईकोर्ट में दतिया से कांग्रेस के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती के मामले की सुनवाई फिर टलकर नई तारीख 14 जुलाई तक पहुंच गई…जो यह नया सवाल खड़ा कर गई क्या दतिया उप चुनाव की तारीख का ऐलान अब जल्द कभी भी हो सकता है.. यह अभी सस्पेंस खत्म होने के लिए और इंतजार करना होगा.. दूसरी तरफ मध्यप्रदेश के पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का देव भूमि मैं उत्तराखंड सरकार के मंत्री द्वारा स्वागत अभिनंदन और हरिद्वार में गंगा स्नान करते दिखाई देना… इसे संयोग मानिए या राजनीतिक समय की सूक्ष्म समझ… जिसे नरोत्तम का बढ़ता आत्मविश्वास उनककी सजगता और समय अनुकूल आने की तत्परता से जोड़कर देखा जा सकता है.. फिलहाल इसे दतिया की राजनीति में दोनों घटनाओं को जोड़कर देखा जाने लगा है… राजनीतिक गलियारों में कहावत चल पड़ी है— “उधर न्यायालय की तारीख बढ़ी और इधर नरोत्तम ने गंगा नहा ली…” सवाल यह नहीं कि गंगा स्नान से राजनीतिक भाग्य बदलते हैं या नहीं… सवाल यह है कि क्या नरोत्तम मिश्रा ने समय की करवट को सबसे पहले पढ़ लिया है… जो न्यायालय के डेवलपमेंट को ध्यान में रखते हुए गंगा दशहरा पर गंगा स्नान की तैयारी पहले ही कर ली थी..2023 विधानसभा चुनाव में दतिया सीट पर नरोत्तम मिश्रा की हार केवल एक सीट हारने की घटना नहीं थी… यह भाजपा की उस राजनीति के लिए झटका थी जिसमें नरोत्तम मिश्रा संगठन… सरकार और सत्ता… तीनों के मजबूत चेहरे माने जाते थे… लंबे समय तक प्रदेश के गृह मंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा को हराकर कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था…कुछ दिन पहले ही राजेंद्र की दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात की तस्वीर भी सामने लाई गई थी.. लेकिन राजनीति में हार अंतिम अध्याय नहीं होती… कई बार हार अगले अध्याय की प्रस्तावना बन जाती है…चुनाव हारने के बाद नरोत्तम मिश्रा सार्वजनिक गतिविधियों में सक्रिय रहे… भोपाल से लेकर दिल्ली तक भाजपा के नेताओं से मुलाकात और राजधानी स्थित उनके आवास पर बड़े-बड़े नेताओं के पहुंचने की तस्वीर उनकी सक्रियता का संदेश देती रही.. इस बीच अपने गृह नगर डबरा में नवग्रह मंदिर निर्माण के अधूरे कार्य को पूरा करवाया.. उस वक्त तक चुनावी राजनीति में उनकी वापसी को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं था… अब अचानक दतिया सीट पर उपचुनाव की संभावनाओं ने नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक सक्रियता को नया अर्थ देना शुरू कर दिया है… कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत नरोत्तम को हराने वाले राजेंद्र भारती की नई मुश्किल और अदालत की तारीख का मतलब और मायने निकले जाना लाजमी है..दतिया के कांग्रेस विधायक रहे राजेंद्र भारती को बैंक फ्रॉड प्रकरण में दिल्ली की एमपी-एमएलए कोर्ट से तीन वर्ष की सजा मिलने के बाद विधानसभा सदस्यता गंवानी पड़ी… कानून साफ है… दो वर्ष या उससे अधिक की सजा जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत सदस्यता समाप्त कर सकती है… इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने सीट रिक्त घोषित कर निर्वाचन आयोग को सूचना भेज दी… यानी प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है…अब सबसे बड़ा सवाल अदालत में राहत का था… यदि उच्च न्यायालय से सजा पर रोक या राहत मिलती तो राजनीतिक तस्वीर बदल सकती थी… लेकिन लगातार टलती सुनवाई ने राजनीतिक संदेश अलग देना शुरू कर दिया है… मंगलवार को सुनवाई फिर टलकर 14 जुलाई तक पहुंच गई…अदालत ने राहत नहीं दी… केवल अगली तारीख दी… राजनीतिक भाषा में इसका अर्थ यह निकाला जा रहा है कि समय निकलता जा रहा है और चुनावी घड़ी आगे बढ़ रही है… हालांकि कानूनी रूप से यह कहना जल्दबाजी होगी कि राजेंद्र भारती की संभावनाएं पूरी तरह समाप्त हो गईं… यदि भविष्य में उच्च न्यायालय सजा पर स्थगन या राहत देता है तो परिस्थितियां बदल सकती हैं… लेकिन फिलहाल राजनीतिक धरातल पर कांग्रेस की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है…यहीं से सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठता है… क्या दतिया उपचुनाव तय मान लिया जाए…? राजनीतिक और प्रशासनिक संकेत बताते हैं कि तस्वीर उसी दिशा में बढ़ रही है… जानकारी यह है कि जिला निर्वाचन अधिकारी यानी दतिया कलेक्टर ने मशीनों के परीक्षण समेत आयोग को तैयारियों की रिपोर्ट भेज दी है… चुनावी मशीनरी की तैयारियां लगभग पूरी बताई जा रही हैं…यह रिपोर्ट छोटी चीज नहीं होती…निर्वाचन आयोग केवल राजनीतिक घटनाक्रम नहीं देखता… वह प्रशासनिक तैयारियों और संवैधानिक समयसीमा पर भी नजर रखता है… जब कोई सीट रिक्त घोषित होती है तो सामान्य तौर पर आयोग परिस्थितियां अनुकूल होने पर छह माह के भीतर चुनाव कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाता है…यहीं जिला निर्वाचन अधिकारी की रिपोर्ट का महत्व बढ़ जाता है… यह रिपोर्ट बताती है कि मतदान केंद्र… मतदाता सूची… सुरक्षा… स्टाफ… लॉजिस्टिक्स और प्रशासनिक व्यवस्थाएं चुनाव योग्य स्थिति में हैं या नहीं…यदि आयोग को लगता है कि कोई बड़ा कानूनी अवरोध नहीं है… तो उपचुनाव की घोषणा अचानक भी हो सकती है… यानी राजनीति की भाषा में कहें तो— “दतिया में चुनावी घंटी बजने से पहले उसकी आवाज सुनाई देने लगी है…” (कांग्रेस की मुश्किल… राजेंद्र भारती के बाद कौन?) दूसरा बड़ा सवाल कांग्रेस के सामने है…यदि राजेंद्र भारती कानूनी राहत नहीं पाते और चुनाव लड़ने पर रोक की स्थिति बनती है… तो कांग्रेस के सामने प्रत्याशी चयन सबसे कठिन चुनौती बन सकती है…क्योंकि दतिया की जीत काफी हद तक राजेंद्र भारती की व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ और स्थानीय समीकरणों से जुड़ी मानी गई थी… ऐसे में कांग्रेस को नया चेहरा खोजना पड़े तो चुनाव केवल सीट बचाने का नहीं… संगठन बचाने का संघर्ष भी बन सकता है…यानी भाजपा जहां संभावित चेहरे को लेकर अपेक्षाकृत स्पष्ट दिखाई देती है… वहीं कांग्रेस विकल्पों की खोज में उलझ सकती है…भाजपा में क्या नरोत्तम का टिकट लगभग तय?यहां सबसे दिलचस्प प्रश्न भाजपा का है… क्या उपचुनाव हुआ तो नरोत्तम मिश्रा ही भाजपा उम्मीदवार होंगे…?राजनीतिक संकेत इसी ओर जाते हैं… कारण भी स्पष्ट हैं… पहला… दतिया में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा वही हैं… दूसरा… हार के बावजूद उनकी राजनीतिक पकड़ खत्म नहीं मानी जाती…तीसरा… यदि भाजपा अपने बड़े नेता की सदन में वापसी चाहती है तो इससे बेहतर अवसर शायद ही मिले…हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व का होगा… लेकिन दतिया उपचुनाव को नरोत्तम मिश्रा की वापसी की संभावित खिड़की के रूप में देखा जा रहा है… (गंगा स्नान… संयोग… संकेत या राजनीतिक प्रतीक?) न्यायालय की नई तारीख के साथ बात सामने आई उस खबर और तस्वीर पर जिसने चर्चा बढ़ाई… नरोत्तम मिश्रा का हरिद्वार जाकर गंगा स्नान किया..भारतीय राजनीति में प्रतीकों का महत्व कम नहीं होता… कोई नेता मंदिर जाता है… कोई साधु-संतों से मिलता है… कोई तीर्थ यात्रा करता है… इन घटनाओं का संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं… कई बार राजनीतिक भी पढ़ा जाता है… नरोत्तम मिश्रा का गंगा स्नान ऐसे समय हुआ जब दतिया उपचुनाव की चर्चा तेज है… क्या यह केवल संयोग है…? संभव है…क्या इसे राजनीतिक प्रतीक के रूप में पढ़ा जा सकता है…? बिल्कुल… राजनीतिक हलकों में व्यंग्यपूर्ण अंदाज में कहा जाने लगा “उधर अदालत ने नई तारीख दी… इधर नरोत्तम ने गंगा में डुबकी लगा ली… शायद राजनीति की नई शुरुआत का संकेत…”हालांकि यह केवल राजनीतिक चर्चा और प्रतीकात्मक व्याख्या है… तथ्य नहीं… (राज्यसभा या विधानसभा… नरोत्तम कौन सा रास्ता चुनेंगे?) दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा रही है कि नरोत्तम मिश्रा का नाम राज्यसभा के संभावित दावेदारों में भी लिया जाता रहा है…मध्य प्रदेश से जो पैनल भेजी गई है उसमें नरोत्तम का नाम शामिल है..लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है… क्या नरोत्तम मिश्रा राज्यसभा के नेता हैं या विधानसभा की राजनीति के…? नरोत्तम की पूरी पहचान विधानसभा… संगठन और आक्रामक राजनीतिक बहसों से बनी है… सदन में विपक्ष पर हमलावर शैली… रणनीतिक जवाब और प्रशासनिक अनुभव उनकी राजनीतिक पूंजी रहे हैं… ऐसे में यदि दतिया उपचुनाव का रास्ता खुलता है तो विधानसभा उनकी पहली पसंद हो सकती है… क्योंकि राज्यसभा उन्हें दिल्ली की राजनीति दे सकती है… लेकिन विधानसभा उन्हें वही मंच देगी जहां वे सबसे प्रभावशाली माने गए…यदि नरोत्तम लौटे तो क्या भूमिका होगी?यह भी बड़ा प्रश्न है,यदि नरोत्तम मिश्रा उपचुनाव जीतकर सदन में लौटते हैं तो क्या वे केवल विधायक रहेंगे…? शायद नहीं… पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के फिर मंत्री बनने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.. क्योंकि संदेश भाजपा सीधे कांग्रेस को देना चाहेगी..प्रदेश की राजनीति में अनुभवी और आक्रामक नेताओं की संख्या सीमित है… भाजपा के भीतर भी नरोत्तम मिश्रा का अनुभव… संगठन पर पकड़ और प्रशासनिक समझ उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है… वे सत्ता पक्ष के रणनीतिक वक्ता… संगठन और सरकार के बीच सेतु… या फिर किसी बड़ी भूमिका में भी दिखाई दे सकते हैं… मंत्री पद की संभावनाओं पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी… लेकिन सदन में उनकी वापसी भाजपा की राजनीतिक आक्रामकता को नया बल दे सकती है… (14 जुलाई की तारीख आखिर क्यों अहम?) अब सबसे अहम प्रश्न… 14 जुलाई…यह नई तारीख केवल अदालत की अगली सुनवाई नहीं… बल्कि राजनीतिक कैलेंडर का संवेदनशील मोड़ बन सकती है… यदि उससे पहले निर्वाचन आयोग चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाता है तो तस्वीर अलग होगी… यदि अदालत से कोई बड़ी राहत आती है तो राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं…यानी दतिया की राजनीति इस समय अदालत… आयोग और रणनीति… तीनों के त्रिकोण में फंसी है…फिलहाल इतना जरूर है कि दतिया की हवा बदलती महसूस हो रही है… कांग्रेस बचाव में दिख रही है… भाजपा संभावनाओं के गणित में… और नरोत्तम मिश्रा प्रतीक्षा की मुद्रा में… राजनीति में कई बार वापसी की पटकथा हार के तुरंत बाद नहीं लिखी जाती… समय लिखता है… दतिया में भी शायद वही समय करवट ले रहा है…और इसलिए सवाल अब यह नहीं कि “नरोत्तम ने गंगा क्यों नहाई…?”सवाल यह है कि क्या दतिया की राजनीति में गंगा स्नान नई शुरुआत का संकेत बन रहा है…?
पंडित नरोत्तम मिश्रा पूर्व गृहमंत्री ने आखिर गंगा क्यों नहाई.. क्या दतिया विधानसभा उप चुनाव की संभावना से जल्द सस्पेंस खत्म होने वाला है..)राकेश अग्निहोत्री ..सवाल दर सवाल)