ढाका में एस. जयशंकर और पाकिस्तानी स्पीकर की मुलाकात, खालिदा जिया को अंतिम विदाई
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री को अंतिम श्रद्धांजलि
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी प्रमुख खालिदा जिया का 80 वर्ष की उम्र में ढाका में निधन हो गया। वे पिछले करीब 20 दिनों से अस्पताल में वेंटिलेटर पर थीं। उनके निधन पर बांग्लादेश सरकार ने तीन दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है। इस दौरान सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा और सभी सरकारी कार्यक्रम स्थगित रहेंगे।
खालिदा जिया का पार्थिव शरीर एवरकेयर अस्पताल से उनके बड़े बेटे और बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान के गुलशन स्थित घर लाया गया, जहां परिवार, करीबी रिश्तेदारों और पार्टी नेताओं ने उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दी। इसके बाद जनाजे के लिए पार्थिव शरीर मानिक मिया एवेन्यू और फिर संसद परिसर क्षेत्र ले जाया गया।
भारत के विदेश मंत्री की विशेष यात्रा
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर अचानक तय यात्रा पर ढाका पहुंचे। भारत सरकार का मानना है कि खालिदा जिया की राजनीतिक विरासत भारत-बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित करती रही है, इसलिए इसी भावना के तहत जयशंकर को इस दुखद अवसर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा गया।
ढाका पहुंचने के बाद जयशंकर ने बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान से मुलाकात की और उन्हें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निजी पत्र सौंपा। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर मुलाकात की तस्वीरें साझा कर लिखा कि उन्होंने भारत सरकार और भारतीय जनता की ओर से संवेदनाएं व्यक्त कीं तथा भरोसा जताया कि खालिदा जिया के विचार भविष्य में दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत करने का रास्ता दिखाएंगे।
भारत–पाकिस्तान नेताओं की दुर्लभ मुलाकात
खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के स्पीकर सदार अयाज सादिक भी ढाका पहुंचे। यहां उनकी मुलाकात विदेश मंत्री एस. जयशंकर से हुई और दोनों ने हाथ मिलाया। मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहला मौका था जब भारत और पाकिस्तान के वरिष्ठ नेताओं ने आमने-सामने आकर हाथ मिलाया, इसलिए इस मुलाकात को कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इसके विपरीत, हाल ही में एशिया कप क्रिकेट के दौरान भारतीय टीम ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ मिलाने से परहेज किया था और सीरीज जीतने के बाद भी भारतीय खिलाड़ियों ने एसीसी प्रमुख और पाक मंत्री मोहसिन नकवी से ट्रॉफी लेने से इनकार कर दिया था। इसी पृष्ठभूमि में ढाका में हुआ यह राजनीतिक हैंडशेक प्रतीकात्मक रूप से अधिक चर्चा में है।
ऐतिहासिक जनाजा और सुरक्षा व्यवस्था
खालिदा जिया के जनाजे में अनुमानित 10 लाख लोग शामिल हुए, जिसे बांग्लादेशी मीडिया देश के इतिहास के सबसे बड़े जनाजों में से एक बता रहा है। अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार डॉ. मुहम्मद यूनुस, अन्य सलाहकार, विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता, विदेशी प्रतिनिधि और समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग अंतिम विदाई देने पहुंचे।
ढाका में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए। बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश की 27 प्लाटून शहर के अहम इलाकों, जैसे एवरकेयर अस्पताल, जातीय संसद भवन क्षेत्र और जिया गार्डन में तैनात की गईं। गुलशन स्थित तारिक रहमान के आवास और जनाजा मार्ग पर भी पुलिस व सुरक्षा बलों की भारी तैनाती रही ताकि किसी तरह की अव्यवस्था न हो।
नमाज-ए-जनाजा मानिक मिया एवेन्यू और संसद परिसर क्षेत्र में अदा की गई। इसके बाद उन्हें जिया उद्यान में उनके पति और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान की कब्र के पास दफनाया गया। बड़ी संख्या में लोग काले बैज पहनकर शोक व्यक्त करते नजर आए और विभिन्न जिलों से हजारों समर्थक अंतिम दर्शन के लिए ढाका पहुंचे।
खालिदा जिया का राजनीतिक सफर
खालिदा जिया का जन्म 1945 में हुआ था। वे किसी राजनीतिक परिवार से नहीं थीं। 1960 में उनकी शादी सैनिक अधिकारी जियाउर रहमान से हुई, जो बाद में बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में एक अहम चेहरा बने और 1977 में देश के राष्ट्रपति पद तक पहुंचे। उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी की स्थापना की, लेकिन 30 मई 1981 को एक सैन्य विद्रोह के दौरान उनकी हत्या कर दी गई।
पति की मौत के बाद बिखरती बीएनपी को बचाने के लिए नेताओं ने खालिदा को आगे आने के लिए मनाया। शुरुआती अनिच्छा के बाद उन्होंने 1984 में पार्टी की कमान संभाली। 1991 में जब बांग्लादेश में पहली बार वास्तविक लोकतांत्रिक चुनाव हुए, तो बीएनपी को जीत मिली और खालिदा देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। 1991 से 1996 और फिर 2001 से 2006 तक वे दो कार्यकालों के लिए प्रधानमंत्री रहीं।
उनका राजनीतिक जीवन संघर्ष और टकराव से भरा रहा। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान उन्हें पाकिस्तानी सेना ने नजरबंद किया और कई महीनों तक कैद में रखा। बाद के वर्षों में भी आंदोलनों, हमलों और राजनीतिक टकराव ने उनकी राजनीति को घेरा रखा। 2015 में ढाका में मेयर चुनाव प्रचार के दौरान उनके काफिले पर गोलीबारी और पत्थरबाजी हुई, जिसमें वे बाल-बाल बचीं।
भारत के साथ रिश्तों पर उनका रुख
भारत के प्रति खालिदा जिया का रुख कई बार आलोचनात्मक और टकरावपूर्ण रहा। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने भारत को बांग्लादेश की जमीन से होकर पूर्वोत्तर तक सीधा रास्ता देने का विरोध किया, यह तर्क देते हुए कि इससे बांग्लादेश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। उन्होंने 1972 की भारत-बांग्लादेश मैत्री संधि को आगे बढ़ाने का भी विरोध किया और कहा कि यह बांग्लादेश को कमजोर करती है।
वे अक्सर कहती थीं कि बीएनपी बांग्लादेश को बाहरी दबदबे से बचाने के लिए काम कर रही है और 2018 की एक रैली में उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश को किसी दूसरे देश का राज्य नहीं बनने दिया जाएगा। इसके बावजूद, भारत ने उनके निधन पर संवेदना प्रकट करते हुए उनकी विरासत को दोनों देशों के संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया है।
‘बैटल ऑफ बेगम्स’ और बांग्लादेश की राजनीति
बांग्लादेश की राजनीति दशकों तक दो नेताओं—अवामी लीग की शेख हसीना और बीएनपी की खालिदा जिया—के इर्द-गिर्द घूमती रही। 1980 के दशक में सैन्य शासन के खिलाफ दोनों ने मिलकर आंदोलन किया, लेकिन 1990 में सैन्य शासक इरशाद के हटने और लोकतंत्र लौटने के बाद इनके बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा गहरी दुश्मनी में बदल गई।
1990 के बाद हुए लगभग हर राष्ट्रीय चुनाव में सत्ता बारी-बारी से इन्हीं दो दलों के हाथ में गई। मीडिया ने इसे ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ का नाम दिया, जो बांग्लादेश की राजनीतिक ध्रुवीकरण की पहचान बन गया। इस पृष्ठभूमि में, खालिदा जिया का निधन बांग्लादेश की समकालीन राजनीतिक इतिहास के एक बड़े अध्याय का अंत माना जा रहा है।
निष्कर्ष: कूटनीति और इतिहास के संगम पर विदाई
खालिदा जिया का अंतिम सफर सिर्फ एक लोकप्रिय नेता की विदाई नहीं, बल्कि बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास के एक दौर का समापन भी है। विशाल जनसमूह की मौजूदगी ने उनके जनाधार और प्रभाव को रेखांकित किया, वहीं भारत और पाकिस्तान के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की एक ही मंच पर मौजूदगी ने इस घटना को क्षेत्रीय कूटनीति के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण बना दिया।
भारत की ओर से उच्चस्तरीय भागीदारी और पाकिस्तान के स्पीकर की मौजूदगी यह संकेत देती है कि दक्षिण एशिया की राजनीति में खालिदा जिया जैसी शख्सियतें अपनी मृत्यु के बाद भी देशों के रिश्तों और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करती रहेंगी।
Faraz Khan