एम्स डॉक्टर सुसाइड केस: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने लिया स्वतः संज्ञान, 15 दिन में मांगी विस्तृत रिपोर्ट
भोपाल एम्स में एक महिला असिस्टेंट प्रोफेसर की आत्महत्या का मामला अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) तक पहुंच गया है। आयोग ने इस गंभीर प्रकरण का स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य स्तर के अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। आरोप है कि ट्रॉमा एंड इमरजेंसी विभाग के तत्कालीन HOD डॉ. मोहम्मद यूनुस द्वारा लगातार प्रताड़ना और सार्वजनिक अपमान से परेशान होकर चिकित्सक ने अपनी जान दे दी।
आयोग का स्वतः संज्ञान और जांच के निर्देश
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पीठ, जिसकी अध्यक्षता प्रियंक कानूनगो कर रहे हैं, ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वयं की पहल पर संज्ञान लिया। आयोग ने भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव, एम्स भोपाल के निदेशक और भोपाल पुलिस कमिश्नर को नोटिस जारी कर 15 दिनों के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इस रिपोर्ट में संस्थान की आंतरिक शिकायत समिति (POSH कमेटी) द्वारा की गई कार्यवाही का पूरा विवरण, दर्ज एफआईआर की प्रति और पोस्टमार्टम रिपोर्ट अनिवार्य रूप से शामिल करने को कहा गया है। यह मामला आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) पर किए गए एक विस्तृत ट्वीट के माध्यम से सामने आया था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि भोपाल के एम्स में महिला असिस्टेंट प्रोफेसर सृष्टि (नाम परिवर्तित) ने HOD डॉ. परवेज (नाम परिवर्तित) की प्रताड़ना और अपमान से तंग आकर आत्महत्या कर ली।
शिकायत के अनुसार, विभागाध्यक्ष द्वारा कथित तौर पर लगातार मानसिक दबाव बनाया जा रहा था, जिसमें सार्वजनिक अपमान, पेशेवर कामकाज में बाधाएं और अनुचित व्यवहार जैसे आरोप लगाए गए हैं। बताया गया है कि डॉ. रश्मि (नाम परिवर्तित) ने संस्थान की आंतरिक शिकायत प्रणाली के तहत तीन बार शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने कार्रवाई करने के बजाय मामले को दबाने का प्रयास किया।
POSH कमेटी और पुलिस की भूमिका पर सवाल
आयोग ने विशेष रूप से संस्थान की POSH (Prevention of Sexual Harassment) कमेटी की कार्यवाही का ब्यौरा मांगा है, यह देखते हुए कि यदि शिकायत दर्ज होने के बावजूद उचित जांच या कार्रवाई नहीं हुई, तो यह नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आएगा। ऐसे में जिम्मेदारी केवल आरोपित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि संस्थागत तंत्र भी जवाबदेह होगा। भोपाल पुलिस से भी विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है, जिसमें यह देखा जाएगा कि आत्महत्या के लिए उकसाने, मानसिक प्रताड़ना या अन्य संबंधित धाराओं के तहत क्या कदम उठाए गए।
अब सभी की नजरें आयोग को सौंपी जाने वाली 15 दिनों की रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई की दिशा तय करेगी। आयोग ने पीड़ित परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की बात कही है। परिवार ने भी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग की है, उनका मानना है कि यदि समय पर शिकायतों पर ध्यान दिया जाता, तो शायद यह त्रासदी टाली जा सकती थी। इस मामले को लेकर पूर्व में भी कार्यस्थल के वातावरण और शिकायत तंत्र की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए थे।
Ravi Yadav