जबलपुर में रोज़ 99 लाख लीटर सीवेज, हाईकोर्ट सख्त

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जबलपुर में रोज़ 99 लाख लीटर सीवेज, हाईकोर्ट सख्त

जबलपुर में नालों में मिल रहा सीवेज, हाईकोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी

जबलपुर में नालों के दूषित पानी से सब्जी उगाने और शहर के सीवेज प्रबंधन को लेकर दायर जनहित याचिका पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान हालात की गंभीर तस्वीर सामने आई। प्रदूषण नियंत्रण मंडल की ताजा जांच रिपोर्ट ने साफ बताया कि शहर में बड़ी मात्रा में अनुपचारित सीवेज सीधे नालों में डाला जा रहा है, जिससे पानी अत्यधिक प्रदूषित हो चुका है और गंभीर स्वास्थ्य संकट की आशंका है।

प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट से खुली भारी लापरवाही

प्रदूषण नियंत्रण मंडल की रिपोर्ट के अनुसार जबलपुर शहर में प्रतिदिन लगभग 174 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है। शहर में मौजूद 12 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट मिलकर केवल करीब 75.14 मिलियन लीटर सीवेज का ही उपचार कर पा रहे हैं और वे भी निर्धारित क्षमता से कम पर काम कर रहे हैं।

रिपोर्ट में बताया गया कि उपचार की अपर्याप्त व्यवस्था के कारण प्रतिदिन लगभग 98.86 मिलियन लीटर यानी करीब 99 मिलियन लीटर अनुपचारित और दूषित पानी सीधे या परोक्ष रूप से नालों में पहुंच रहा है। नवंबर 2025 में ओमती नाला, मोती नाला, खूनी नाला सहित प्रमुख नालों से लिए गए नमूनों में बीओडी, टोटल कॉलीफॉर्म और फीकल कॉलीफॉर्म की मात्रा मानकों से कहीं अधिक पाई गई, जिससे यह पानी पीने, नहाने, सिंचाई या किसी भी तरह के उपयोग के लिए अनुपयोगी घोषित किया गया।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देश

जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने सरकार और जिम्मेदार एजेंसियों पर कड़े सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण मंडल द्वारा दिए गए सभी सुझावों पर तुरंत अमल किया जाए और अनुपालन की विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश की जाए। अगली सुनवाई की तारीख 2 फरवरी तय की गई है।

रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई कि यदि नालों का यह दूषित पानी किसी भी तरह से पेयजल पाइपलाइन में मिल गया तो शहर में गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा हो सकता है। इस संदर्भ में हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए कि घरों से निकलने वाले सीवेज को सीधे नालों में जाने से तत्काल रोका जाए और नालों के पानी का किसी भी प्रकार से उपयोग करने पर प्रतिबंध लगाया जाए।

नगर निगम पर पर्यावरणीय दंड, फिर भी सुधार नहीं

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देश पर मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने जबलपुर नगर निगम पर 17.80 करोड़ रुपये का पर्यावरणीय दंड लगाया था। यह दंड जुलाई 2020 से 31 मार्च 2025 के बीच घरों से निकलने वाले सीवेज और प्रदूषित पानी को सीधे नदियों और नालों में छोड़ने के कारण लगाया गया था।

इसके बावजूद नगर निगम ने अब तक यह राशि जमा नहीं की है। दंड की वसूली की जिम्मेदारी जबलपुर जिला कलेक्टर पर है, जिस पर अमल न होने को लेकर हाईकोर्ट ने स्पष्टीकरण तलब किया है और जवाब मांगते हुए प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल उठाए हैं।

स्वास्थ्य और पर्यावरण पर संभावित खतरा

विशेषज्ञों के मुताबिक नालों के इतने प्रदूषित पानी से सब्जी की सिंचाई होने पर मिट्टी और फसलों में हानिकारक जीवाणुओं और रसायनों की मात्रा बढ़ने की आशंका रहती है, जो खाद्य श्रृंखला के माध्यम से आमजन के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। साथ ही, अनुपचारित सीवेज से नदियों और भूजल का प्रदूषण भी तेजी से बढ़ने की आशंका है।

निष्कर्ष: त्वरित कार्रवाई की मांग करती चिंताजनक स्थिति

जबलपुर में सीवेज प्रबंधन की मौजूदा स्थिति पर्यावरण और जनस्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है। प्रतिदिन लगभग 99 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज का नालों में पहुंचना व्यवस्था की विफलता को दिखाता है। हाईकोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद अब सरकार, नगर निगम और प्रशासन पर यह जिम्मेदारी है कि वे सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता बढ़ाने, अवैध डिस्चार्ज रोकने, लगाए गए दंड की वसूली और नालों के पानी के किसी भी उपयोग पर प्रभावी रोक लगाने के ठोस कदम तुरंत उठाएं, ताकि संभावित स्वास्थ्य संकट और पर्यावरणीय नुकसान को रोका जा सके।

Ravi Yadav