कांग्रेस में अवांछित बयानों से खामोशी और उपचुनाव की चुनौती—दतिया उपचुनाव से पहले अपने ही चक्रव्यूह में फंसती जा रही कांग्रेस? विवेक सिंह की रिपोर्ट..

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कांग्रेस में अवांछित बयानों से खामोशी और उपचुनाव की चुनौती—दतिया उपचुनाव से पहले अपने ही चक्रव्यूह में फंसती जा रही कांग्रेस? विवेक सिंह की रिपोर्ट..

मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा उपचुनाव का ऐलान हो गया है..यह केवल एक सीट का चुनाव नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के संगठन, नेतृत्व और अनुशासन की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है..एक तरफ भाजपा पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस अपने ही आंतरिक विरोधाभासों से जूझती दिखाई दे रही है..ऐसे समय में जब पार्टी को पूरी ऊर्जा उम्मीदवार चयन, संगठन और जनसंपर्क पर केंद्रित करनी चाहिए, तब 'उज्जैन प्रसंग' घटनाक्रम से उपजे अवांछित बयानों, नेताओं के बीच बढ़ती तल्खी और नेतृत्व की खामोशी ने कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है. पार्टी के भीतर जिस तरह से एक जमीन मामले में वरिष्ठ नेता के प्रति सार्वजनिक रूप से अमर्यादित टिप्पणियां सामने आईं, उसने कांग्रेस की संगठनात्मक संस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं..लेकिन उससे भी अधिक चिंताजनक यह रहा कि इन घटनाओं के बाद संगठन की ओर से कोई स्पष्ट और कठोर संदेश सामने नहीं आया..राजनीति में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन अनुशासनहीनता पर मौन अक्सर असहमति से अधिक नुकसान पहुंचाता है..जब नेतृत्व समय पर हस्तक्षेप नहीं करता, तब कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश जाता है कि संगठनात्मक मर्यादाओं का पालन अब अनिवार्य नहीं रह गया है. दतिया उपचुनाव के संदर्भ में यह स्थिति कांग्रेस के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है..पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रत्याशी चयन की है..पूर्व विधायक राजेंद्र भारती अपने पुत्र अनुज भारती के लिए सक्रिय हैं..दूसरी ओर, 2023 में टिकट छोड़ने वाले अवधेश नायक मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं..पूर्व विधायक घनश्याम सिंह का समर्थक वर्ग भी अपनी दावेदारी को लेकर सक्रिय है..यदि टिकट वितरण में संतुलन नहीं बन पाया, तो चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही असंतोष संगठन की ताकत को कमजोर कर सकता है. स्थिति केवल टिकट तक सीमित नहीं है..दतिया का चुनाव हमेशा सामाजिक और जातीय समीकरणों से प्रभावित रहा है..अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, ब्राह्मण और अन्य प्रभावशाली सामाजिक समूहों के बीच संतुलन साधना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा..इसके साथ ही बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का प्रभाव भी कई क्षेत्रों में चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है..चूंकि समाजवादी पार्टी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है, इसलिए कांग्रेस के सामने गठबंधन सहयोगियों के सम्मान और स्थानीय राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन बनाने की भी चुनौती रहेगी..क्योंकि खबरें तो यहां तक आ रहीं हैं कि यदि राजेंद्र भरती के बेटे को टिकट नहीं मिला तो वे वगावती तेवर अख्तियार कर सकते हैं. दरअसल, कांग्रेस की सबसे बड़ी लड़ाई भाजपा से पहले स्वयं अपने संगठन के भीतर दिखाई दे रही है..पिछले दो दशकों में प्रदेश संगठन ग्राम स्तर तक जिस मजबूती से खड़ा होना चाहिए था, वह नहीं हो सका..केवल आंदोलन, धरना और प्रदर्शन राजनीतिक वातावरण तो बना सकते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के लिए मजबूत बूथ संगठन, स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं का विश्वास कहीं अधिक आवश्यक होता है..अब समय केवल बाहें चढ़ाकर संघर्ष करने का नहीं, बल्कि हाथ जोड़कर कार्यकर्ताओं, सहयोगी दलों और समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने का है..कांग्रेस के लिए यह जरूरी है कि प्रदेश नेतृत्व संवाद को प्राथमिकता दे, अनुशासनहीनता पर स्पष्ट संदेश दे और सामूहिक नेतृत्व की भावना को मजबूत करे.

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