कंगना रनोट के बयान से आहत किसान महिंदर कौर की संघर्षपूर्ण कानूनी लड़ाई
पंजाब के बठिंडा जिले के गांव महेंद्रगढ़ जंडियां की बुजुर्ग किसान महिला महिंदर कौर खुद को वही महिला बताती हैं, जिसकी तस्वीर अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनोट ने किसान आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर साझा की थी। कंगना ने उन्हें सौ-सौ रुपए लेकर प्रदर्शन में शामिल होने वाली महिला जैसा बताया था, जिसे लेकर महिंदर कौर और पंजाब के कई लोगों में गुस्सा पैदा हुआ।
किसान आंदोलन से मानहानि के केस तक की कहानी
महिंदर कौर का कहना है कि वे लगभग 80-82 वर्ष की हैं और किसान परिवार से संबंध रखती हैं। वे बताती हैं कि वे रुपए के लिए नहीं, बल्कि अपने बेटे और पंजाबियों की जमीन-जायदाद बचाने के लिए किसान आंदोलन में शामिल हुई थीं। कंगना के कथित बयान और उनकी तस्वीर के इस्तेमाल की जानकारी मीडिया के जरिए मिलने के बाद उनके गांव में बैठक हुई और मानहानि का केस दर्ज कराने का फैसला लिया गया। गांव की पंचायत, किसान जत्थेबंदियों और पंजाब के लोगों ने इसे सामूहिक अपमान माना।
महिंदर कौर के अनुसार, किसान संगठनों की जड़ें विदेशों तक फैली हैं और विदेशों में बैठे पंजाबियों की मदद व फोन कॉल के बाद उन्होंने मानहानि का केस दायर किया। उनकी तीन बेटियां हैं, जिन्होंने शुरू में जाने से रोका, लेकिन उन्होंने स्वयं अदालत जाने का निर्णय लिया और लगातार पांच साल से केस लड़ रही हैं।
कर्ज, जमीन बिक्री और आर्थिक संघर्ष
महिंदर कौर बताती हैं कि कंगना के खिलाफ केस लड़ने के कारण उन पर करीब साढ़े सात लाख रुपए का कर्ज हो चुका है। इसके अलावा साहूकार का अलग से 62 हजार रुपए का कर्ज है और बैंक ने भी उन पर केस कर रखा है। उनके पास अपना ट्रैक्टर नहीं है और हर साल किराए पर ट्रैक्टर लेकर खेती का काम किया जाता है।
वे कहती हैं कि कंगना वाले केस और अपनी जमीन के दूसरे विवादों में वकीलों को फीस देने के लिए उन्हें जमीन बेचनी पड़ी और कर्ज भी लेना पड़ा। उनके अनुसार, वकीलों से बात करने तक के भी पैसे देने पड़ते हैं। राजस्थान में उनकी कुछ जमीन रिश्तेदारों द्वारा हड़प लिए जाने का मामला भी अदालत में लंबित है।
कंगना से सीधी मुलाकात और माफी पर सख्त रुख
महिंदर कौर का कहना है कि पांच जनवरी को अदालत में तारीख है, जहां कंगना की पेशी होनी है। वे बताती हैं कि उन्होंने आज तक कंगना को सामने से नहीं देखा और अदालत में उसे देखना चाहती हैं। वे खुद को बूढ़ी, गरीब और किसान परिवार से होने के बावजूद निडर बताती हैं और कहती हैं कि उन्हें न कंगना से डर लगता है, न सरकार से।
महिंदर कौर, कंगना पर आरोप लगाती हैं कि वह किसानों को आतंकवादी और माओवादी कहकर दिखाती हैं और इंदिरा गांधी के दंगों से जुड़े बयान देकर किसानों को कीड़े-मकौड़े जैसा समझती हैं। वे कहती हैं कि कंगना ने अदालत में जज से माफी मांगी होगी, लेकिन उनसे कभी माफी नहीं मांगी। अब वे स्पष्ट शब्दों में कहती हैं कि माफी का समय निकल चुका है और वह नाक रगड़ कर भी माफी मांगे, तब भी वे उसे माफ नहीं करेंगी।
वे यह भी कहती हैं कि कंगना को यह समझना चाहिए कि किसी कौम को इस तरह छेड़ना आसान नहीं होता और उसे अपनी भाषा पर संयम रखना चाहिए। साथ ही वे ये भी जोड़ती हैं कि वे चाहती हैं कि कंगना जीती-जागती रहे, लेकिन अदालत में जरूर आए और अपने शब्दों की जिम्मेदारी स्वीकार करे।
खेती-किसानी, परिवार और व्यक्तिगत दुख
महिंदर कौर बताती हैं कि उनके पास कुल 12 किले जमीन है और एक बेटा है जो खेती का पूरा काम संभालता है। वे खुद भी अपनी उम्र के बावजूद धान बोने से लेकर घर के काम, चाय और खाना बनाने तक सब कुछ करती हैं। बारिश, आंधी, तूफान, सर्दी और गर्मी जैसी हर परिस्थिति में उनका परिवार खेतों में ही जुटा रहा है।
कुछ समय पहले उनके इकलौते बेटे को खेत में धान बोते समय सांप ने काट लिया था। जहर शरीर में फैल गया और वह चार महीने तक बिस्तर पर पड़ा रहा। अब डॉक्टरों ने खतरा टलने की बात कही है, लेकिन वह अभी भी ठीक होने की प्रक्रिया में है।
किसान आंदोलन के दौरान वे अपनी बहू के साथ दिल्ली के प्रदर्शन स्थल पर गई थीं। उनकी बहू लगभग 200 दिन तक उनके साथ धरने पर बैठी रही। वहीं ठंड और कठिन परिस्थितियों के कारण उसे निमोनिया हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। अब उनका बेटा बिस्तर पर है, बहू नहीं रही और उनके कोई पोते-पोती नहीं हैं। वे बताती हैं कि उनका घर भी अभी पूरी तरह बना नहीं है।
काले कानून, गुरुद्वारे की बैठकें और दिल्ली कूच
महिंदर कौर कहती हैं कि वे अनपढ़ हैं, लेकिन खुद को शेरनी मानती हैं। वे बताती हैं कि जब केंद्र सरकार कृषि कानून लेकर आई, तो उनके गांव के गुरुद्वारे में रोज़ अनाउंसमेंट होने लगे। गांव की पंचायत और किसान जत्थेबंदी के प्रधान ने इन कानूनों का पंजाबी में अनुवाद कर किसानों को समझाया कि इनसे उन पर क्या असर पड़ेगा।
महिंदर कौर के अनुसार, उन्हें बताया गया कि आने वाले समय में उनके बच्चों को जमीनों से बेदखल किया जा सकता है और वही किसान अपनी ही जमीन पर दिहाड़ी मजदूर की तरह काम करने को मजबूर हो सकता है। जब यह बात समझ में आई, तो गांव के किसान, महिलाएं और बुजुर्ग सभी दिल्ली की ओर कूच कर गए। वे कहती हैं कि जब बेटे धरने पर बैठे हों तो मां घर पर नहीं बैठ सकती।
आंदोलन की मुश्किलें और दृढ़ संकल्प
वे याद करती हैं कि किसान आंदोलन के दौरान गर्मी, बारिश, धुंध और कड़ाके की ठंड जैसी हर मुश्किल का सामना किया। बारिश में ट्रालियों में रहना पड़ा, आंधी में टेंट उड़ गए जिन्हें फिर से लगाया गया। वे कहती हैं कि वहां किसी की हवेलियां नहीं थीं, फिर भी महिलाओं ने बार-बार तंबू लगाकर डटे रहना चुना।
उनके अनुसार, सरकार ने बुजुर्ग किसानों पर कठिन समय डाला, लेकिन उन्हें विश्वास है कि भगवान ने साथ दिया। आंदोलन के दौरान उन्होंने कई किसानों की मौतें देखीं और रोती हुई मांओं को भी, जो वे जीवन भर नहीं भूल सकतीं। वे कहती हैं कि वे 200 दिन तक किसान आंदोलन में बैठी रहीं और अब मरते दम तक कंगना के खिलाफ अदालत में लड़ाई जारी रखेंगी।
महिंदर कौर कंगना पर यह आरोप भी लगाती हैं कि जब वे और अन्य किसान कठिनाइयों में थे, तब कंगना सुख-सुविधाओं और पैसे के बीच थीं, जबकि किसान अपने पसीने से अन्न उगाकर खुद भी खाते हैं और देश को भी खिलाते हैं। वे मानती हैं कि कंगना पंजाब का भला नहीं चाहती, जबकि सरकार का दायित्व जनता की खुशहाली का होना चाहिए ताकि वह शासन कर सके।
महिंदर कौर अपने अनुभवों के आधार पर दोहराती हैं कि उन्हें अब पीछे हटना मंजूर नहीं और वे अदालत में जाकर अपनी बात रखती रहेंगी। उनके अनुसार, यह लड़ाई केवल उनकी नहीं, बल्कि पंजाब और किसानों की इज़्जत की लड़ाई है।
ये तमाम बातें और भावनाएं महिंदर कौर ने एक रिपोर्टर के साथ बातचीत में साझा कीं, जिसमें उन्होंने अपने संघर्ष, किसान आंदोलन के अनुभवों और कंगना के खिलाफ चल रहे केस पर खुलकर बात की।
Bhavanesh Soni