(कर्नाटक से निकला “ढाई-ढाई साल” का संदेश , क्या एमपी में जीतू - उमंग और कांग्रेस को करेगा मजबूत.!) सवाल दर सवाल..(राकेश अग्निहोत्री)

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(कर्नाटक से निकला “ढाई-ढाई साल” का संदेश , क्या एमपी में जीतू - उमंग  और   कांग्रेस को करेगा मजबूत.!) सवाल दर सवाल..(राकेश अग्निहोत्री)

( राहुल गांधी की बनाई इस जोड़ी की स्वीकार्यता और मजबूती पर खड़े हो चुके सवाल का निकलेगा समाधान ) इंट्रो मध्य प्रदेश कांग्रेस में इन दिनों एक दिलचस्प राजनीतिक संयोग दिखाई दे रहा है.. एक तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी अपने राजनीतिक जीवन के शायद सबसे चर्चित दौर में हैं, दूसरी तरफ कर्नाटक में हुए सत्ता परिवर्तन और डी.के. शिवकुमार की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी ने कांग्रेस की भविष्य की नेतृत्व राजनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है.. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा जीतू पटवारी को "दो कौड़ी का नेता" बताए जाने के बाद जिस तरह पूरी कांग्रेस उनके समर्थन में खड़ी दिखाई दी, उसने प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता और संगठनात्मक महत्व दोनों को बढ़ाया है.. दिलचस्प यह भी है कि आमतौर पर आक्रामक और मुखर दिखाई देने वाले जीतू पटवारी ने इस पूरे विवाद में टकराव के बजाय संयम, भावनात्मक अपील और गांधीगिरी की शैली को चुना.. राजनीतिक तौर पर देखें तो यह विधानसभा चुनाव हार चुके जीतू के लिए सहानुभूति और समर्थन जुटाने का एक सफल प्रयोग भी साबित हुआ.. वह बात और है कि जीतू का इमोशनल कार्ड के साथ बैक फुट पर जाना चर्चा का विषय बना हुआ है..लेकिन इसी घटनाक्रम के समानांतर कांग्रेस के भीतर एक बड़ा सवाल आकार ले रहा है.. क्या जीतू पटवारी प्रदेश अध्यक्ष के रूप में स्वयं को भविष्य का स्वाभाविक मुख्यमंत्री चेहरा मानकर आगे बढ़ेंगे, या फिर कर्नाटक से निकले राजनीतिक संदेश को समझते हुए नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के साथ साझा नेतृत्व और समन्वय की नई राजनीति का रास्ता चुनेंगे.. क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस जिस तरह संगठन और सत्ता के बीच संतुलन, ओबीसी और आदिवासी नेतृत्व के बीच साझेदारी तथा चुनावी योगदान के आधार पर राजनीतिक सम्मान का नया मॉडल विकसित करती दिखाई दे रही है, उसमें मध्य प्रदेश की जीतू-उमंग जोड़ी भी स्वाभाविक रूप से चर्चा के केंद्र में आ गई है.. आने वाले समय में यह बहस और गहरी हो सकती है.. कमलनाथ की सक्रिय भूमिका, दिग्विजय सिंह का अनुभव और मार्गदर्शक प्रभाव, जयवर्धन सिंह सहित नई पीढ़ी के अन्य नेताओं की महत्वाकांक्षाएं तथा सामाजिक समीकरणों की अनिवार्यता कांग्रेस की राह को आसान नहीं बनातीं.. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी द्वारा तैयार की गई ओबीसी प्रदेश अध्यक्ष और आदिवासी नेता प्रतिपक्ष की यह जोड़ी केवल संगठनात्मक व्यवस्था है या फिर भविष्य की सत्ता राजनीति का कोई संकेत भी अपने भीतर छिपाए हुए है.. और यदि कर्नाटक मॉडल वास्तव में कांग्रेस की नई रणनीति का हिस्सा है तो क्या मध्य प्रदेश में जीतू पटवारी और उमंग सिंघार मिलकर ऐसा भरोसा पैदा कर पाएंगे, जो कार्यकर्ताओं, नेताओं और हाईकमान को एक साथ आश्वस्त कर सके.. यही वह राजनीतिक प्रश्न है जिसने प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है..। ✅✅✅ कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद पर सिद्धारमैया के बाद डी.के. शिवकुमार की ताजपोशी को यदि केवल एक राज्य का नेतृत्व परिवर्तन माना जाए तो यह तस्वीर अधूरी होगी.. कांग्रेस के भीतर जिस तरह इस बदलाव को लेकर लंबे समय से चर्चा चल रही थी और अंततः राहुल गांधी की स्वीकृति के साथ सत्ता हस्तांतरण का रास्ता साफ हुआ, उसने पार्टी के अंदर एक बड़े राजनीतिक संदेश को जन्म दिया है.. यह संदेश केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी राज्यों के लिए संकेत माना जा रहा है जहां कांग्रेस सत्ता में है या भविष्य में सत्ता हासिल करने की उम्मीद रखती है.. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अब चुनाव जिताने वाले दो बड़े चेहरों के बीच संतुलन बनाने की रणनीति पर काम कर रही है.. एक ओर संगठन का नेतृत्व करने वाला चेहरा और दूसरी ओर जनाधार वाला नेता.. यदि दोनों चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं तो सत्ता मिलने की स्थिति में दोनों को सम्मानजनक हिस्सेदारी देने का मॉडल तैयार किया जा सकता है.. कर्नाटक में सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार की जोड़ी इसी प्रयोग का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है.. 2023 में कांग्रेस की बड़ी जीत के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार के बीच प्रतिस्पर्धा खुलकर सामने आई थी.. उस समय भी सत्ता साझेदारी की चर्चाएं हुई थीं, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने तत्काल स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाया.. अब यदि कार्यकाल के मध्य में शिवकुमार को जिम्मेदारी सौंपी जाती है तो यह उस राजनीतिक समझौते की परिणति मानी जाएगी जिसमें चुनाव जिताने वाले दोनों नेताओं को बराबर सम्मान देने की कोशिश दिखाई देती है.. यह फैसला राहुल गांधी की उस सोच से भी जुड़ता है जिसमें संगठन और सरकार के बीच टकराव के बजाय साझेदारी को बढ़ावा देने की बात की जाती रही है.. कर्नाटक के समानांतर राहुल गांधी का राजस्थान दौरा भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.. वहां उन्होंने जिला अध्यक्षों, संगठन पदाधिकारियों और जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ जिस तरह संवाद स्थापित किया, वह कांग्रेस की नई कार्यशैली का संकेत देता है.. परिवार सहित प्रशिक्षण, सामूहिक बैठकें, मार्शल आर्ट जैसी गतिविधियों का समावेश और संगठन को नीचे तक सक्रिय करने का प्रयास बताता है कि कांग्रेस केवल चुनावी राजनीति नहीं बल्कि कैडर आधारित ढांचे को मजबूत करने की दिशा में भी काम कर रही है.. राजस्थान में प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष की भूमिका को समानांतर महत्व दिए जाने का संदेश भी सामने आया.. साथ ही जिला अध्यक्षों को टिकट चयन और संगठनात्मक फीडबैक में अधिक भूमिका देने की बात ने यह स्पष्ट किया कि कांग्रेस हाईकमान अब केवल दिल्ली केंद्रित निर्णयों पर निर्भर नहीं रहना चाहती.. राहुल गांधी ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत भी दिया कि परिक्रमा राजनीति, गुटबाजी और केवल व्यक्तिगत संपर्क के आधार पर आगे बढ़ने का दौर बदल रहा है.. दिलचस्प तथ्य यह है कि सत्ता साझेदारी का विचार कांग्रेस के लिए नया नहीं है.. मध्य प्रदेश में 2018 के चुनाव के बाद कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच संतुलन बनाने की चर्चाएं चली थीं.. राजनीतिक गलियारों में यह धारणा भी बनी थी कि पुरानी और नई पीढ़ी के बीच किसी प्रकार की सत्ता साझेदारी का रास्ता निकाला जा सकता है.. हालांकि परिस्थितियां बदलीं, सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी और सरकार गिर गई.. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टी.एस. सिंहदेव के बीच भी ढाई-ढाई साल के फार्मूले की चर्चा लंबे समय तक होती रही.. राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच भी यही विवाद बार-बार सामने आया.. इन तीनों राज्यों में कांग्रेस अंततः आंतरिक विवादों से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकी और बाद के चुनावों में उसे राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा.. यही कारण है कि कर्नाटक का मॉडल कांग्रेस के लिए केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं बल्कि पुराने अनुभवों से निकला हुआ राजनीतिक सबक भी माना जा रहा है.. लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी की स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत और निर्विवाद दिखाई देती है.. पार्टी के अधिकांश बड़े निर्णयों में उनकी राय निर्णायक मानी जा रही है.. कर्नाटक का नेतृत्व परिवर्तन, राजस्थान में संगठनात्मक सक्रियता, उत्तराखंड जैसे विपक्षी राज्यों में लगातार संवाद और कांग्रेस शासित राज्यों में नेतृत्व संतुलन की कोशिशें इस बात का संकेत देती हैं कि राहुल गांधी अब केवल चुनाव प्रचारक नहीं बल्कि संगठनात्मक संरचना तय करने वाले नेता की भूमिका में भी दिखाई दे रहे हैं.. उनकी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि चुनाव लड़ने वाले नेताओं को परिणाम के बाद भी सम्मानजनक राजनीतिक स्थान मिले.. इससे चुनाव पूर्व नेतृत्व संघर्ष को नियंत्रित करने और चुनाव बाद असंतोष को कम करने में मदद मिल सकती है.. कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी यही रही है कि कई राज्यों में नेतृत्व विवाद चुनावी लाभ को नुकसान में बदल देता है.. कर्नाटक के घटनाक्रम का सबसे अधिक राजनीतिक प्रभाव यदि किसी विपक्षी राज्य पर पड़ सकता है तो वह मध्य प्रदेश माना जा रहा है.. यहां कांग्रेस ने हार के बाद जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष और उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष बनाया.. दोनों अपेक्षाकृत युवा चेहरे हैं और पार्टी ने उन्हें भविष्य के नेतृत्व के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है.. हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा जीतू पटवारी को लेकर दिए गए बयान के बाद जिस तरह पूरी कांग्रेस उनके समर्थन में खड़ी दिखाई दी, उसने भी यह संकेत दिया कि संगठन फिलहाल अपने अध्यक्ष के पीछे एकजुट रहने का संदेश देना चाहता है.. ऐसे में राजनीतिक सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि भविष्य में कांग्रेस मध्य प्रदेश में सत्ता के करीब पहुंचती है या बहुमत हासिल करती है तो क्या जीतू पटवारी और उमंग सिंघार की जोड़ी को भी कर्नाटक मॉडल की तरह देखा जाएगा.. राजनीतिक दृष्टि से देखें तो जीतू पटवारी और उमंग सिंघार दोनों अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय आधार का प्रतिनिधित्व करते हैं.. पटवारी संगठन और आक्रामक राजनीति के चेहरे के रूप में उभरे हैं, जबकि उमंग सिंघार विधानसभा में विपक्ष की आवाज और आदिवासी नेतृत्व के प्रमुख प्रतिनिधि माने जाते हैं.. यदि कांग्रेस भविष्य में सत्ता के करीब पहुंचती है तो दोनों को साथ लेकर चलना पार्टी की रणनीतिक आवश्यकता बन सकती है.. हालांकि अभी से किसी सत्ता साझेदारी मॉडल की घोषणा करना जल्दबाजी होगी, लेकिन कर्नाटक के बाद इस संभावना पर चर्चा अवश्य बढ़ सकती है.. सवाल यह भी है कि यदि ऐसा कोई फार्मूला बनता है तो दिग्विजय सिंह जिनका राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो गया लेकिन सक्रियता मध्य प्रदेश में बढ़ गई, कमलनाथ जो वर्तमान में विधायक लेकिन राज्यसभा की तीसरी सीट के सबसे बड़े दावेदार बनकर अपनी पोजिशनिंग मजबूत कर रहे.. नई पीढ़ी का नेतृत्व और जिन्हें राजनीतिक विरासत में मिली और समर्थन हर जिले में मौजूद स्वभाव से सरल सहज और अहंकार से दूर रहने वाले दिग्विजय पुत्र जयवर्धन सिंह, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पूर्वक केंद्रीय मंत्री कमलनाथ सरकार में रहते जिन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ा अरुण यादव, पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह जिन्हें पिता स्वर्गीय अर्जुन सिंह के समर्थक आज भी उनसे जुड़े हैं, और आरक्षण पर कांग्रेस की नई लाइन के बीच आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला महिला नेतृत्व और अंत में राहुल गांधी की नजर जी बड़े वोट बैंक पर है उस अनुसूचित जाति वर्ग के नेताओं की भूमिका क्या होगी.. कांग्रेस नेतृत्व को यह सुनिश्चित करना होगा कि नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका कमतर न दिखाई दे.. कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए कर्नाटक का मॉडल एक महत्वपूर्ण संदेश देता है.. पहला, चुनाव जिताने वाले नेताओं को सम्मान मिल सकता है.. दूसरा, संगठन में काम करने वालों की भूमिका केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहेगी.. तीसरा, प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष जैसे पद केवल औपचारिक नहीं बल्कि भविष्य के नेतृत्व निर्माण की प्रयोगशाला बन सकते हैं.. यह संदेश उन राज्यों में विशेष महत्व रखता है जहां कांग्रेस लंबे समय से विपक्ष में है और कार्यकर्ताओं को भविष्य की स्पष्ट राजनीतिक दिशा की तलाश रहती है.. कांग्रेस हाईकमान की रणनीति को देखें तो तीन प्रमुख बिंदु उभरते हैं.. संगठन और सरकार के बीच संतुलन.. पुरानी और नई पीढ़ी का समन्वय.. चुनाव जिताने वाले चेहरों को राजनीतिक सम्मान.. कर्नाटक में डी.के. शिवकुमार की ताजपोशी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा दिखाई देती है.. सबसे बड़ा राजनीतिक निष्कर्ष यही है कि कर्नाटक में सिद्धारमैया से डी.के. शिवकुमार को सत्ता हस्तांतरण केवल मुख्यमंत्री बदलने की घटना नहीं है.. यह कांग्रेस के भीतर विकसित हो रहे एक नए नेतृत्व मॉडल का संकेत भी माना जा सकता है.. ऐसा मॉडल जिसमें संगठन और सरकार, पुरानी और नई पीढ़ी तथा जनाधार और संगठनात्मक क्षमता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई देती है.. मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और अन्य विपक्षी राज्यों में कांग्रेस के नेता अब कर्नाटक के इस प्रयोग को ध्यान से देखेंगे.. सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या राहुल गांधी भविष्य में उन राज्यों में भी इसी तरह का फार्मूला लागू करने की दिशा में बढ़ेंगे जहां कांग्रेस सत्ता की दावेदार है.. फिलहाल इतना स्पष्ट है कि कर्नाटक से निकला संदेश केवल बेंगलुरु तक सीमित नहीं है.. इसकी राजनीतिक गूंज भोपाल, जयपुर, देहरादून और दिल्ली तक सुनाई दे रही है.. कांग्रेस के लिए यह नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि नेतृत्व प्रबंधन की नई राजनीतिक प्रयोगशाला बन सकता है.. और यदि यह प्रयोग सफल रहा तो आने वाले वर्षों में विपक्षी राज्यों में कांग्रेस की रणनीति, नेतृत्व चयन और मुख्यमंत्री चेहरे की राजनीति पर इसका सीधा प्रभाव दिखाई दे सकता है..।

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