मध्य प्रदेश मानव अधिकार आयोग की नियुक्तियों पर विवाद
मध्य प्रदेश में मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मुख्यमंत्री के आवास पर आज शाम को इस मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। लेकिन इससे पहले, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने नियुक्तियों की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
नेता प्रतिपक्ष ने उठाए सवाल
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि मध्य प्रदेश मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों को लेकर राज्य सरकार की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों का पालन नहीं किया जा रहा है। सिंघार के अनुसार, सरकार ने चुनाव से पहले हलफनामा दिया था कि तीन महीने के भीतर नियुक्तियां की जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
तीन साल से लंबित हैं नियुक्तियां
सिंघार ने कहा कि मानव अधिकार आयोग के एक्ट के तहत कार्यकाल पूरा होने के तीन महीने के भीतर नई नियुक्तियां होनी चाहिए। लेकिन पिछले तीन सालों से यह प्रक्रिया लंबित है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जिन सदस्यों का नॉमिनेशन किया गया है, उनकी योग्यता क्या है।
न्यायिक पद का नाम बदलने का आरोप
नेता प्रतिपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि विशेष व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने के लिए न्यायिक सदस्य के पद का नाम बदलकर प्रशासनिक सदस्य कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि आवेदन प्रक्रिया में भी पारदर्शिता नहीं है और केवल समाज के चुनिंदा वर्गों को ही आवेदन की जानकारी दी गई।
एक व्यक्ति को बार-बार प्रभार देने पर आपत्ति
सिंघार ने यह भी सवाल उठाया कि एक ही व्यक्ति को बार-बार आयोग का अध्यक्ष क्यों नियुक्त किया जा रहा है। उन्होंने इसे मानव अधिकार आयोग एक्ट का उल्लंघन बताया।
आयोग में आवेदनकर्ताओं की स्थिति
मध्य प्रदेश मानव अधिकार आयोग में न्यायिक सदस्य के लिए कई नाम सामने आए हैं। इनमें मनोहर ममतानी, रमेश कुमार सोनी और शोभा पोरवाल जैसे पूर्व न्यायिक अधिकारियों के नाम शामिल हैं। विधानसभा के प्रमुख सचिव एपी सिंह ने भी प्रशासनिक सदस्य के पद के लिए आवेदन किया है।
निष्कर्ष
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि मानव अधिकार आयोग न्याय का मंदिर है और इसकी नींव संवैधानिक मूल्यों पर आधारित है। उन्होंने मुख्यमंत्री से अपील की कि नियुक्तियों में पारदर्शिता रखते हुए राज्य की जनता के अधिकारों की रक्षा की जाए।