महबूबा मुफ्ती ने केंद्र की कश्मीर नीति को फेल बताया

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महबूबा मुफ्ती ने केंद्र की कश्मीर नीति को फेल बताया

महबूबा मुफ्ती ने केंद्र सरकार की कश्मीर नीति पर सवाल उठाए

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर में सरकार की नीति पूरी तरह विफल हो गई है। उन्होंने हाल ही में दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट और उसमें शामिल डॉक्टर की भूमिका को कश्मीर की गहरी समस्या से जोड़ा।

कश्मीर मुद्दा उठाने पर आपत्ति और इज्जत की मांग

श्रीनगर में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान महबूबा मुफ्ती ने कहा कि आज के समय में कश्मीर इश्यू का नाम लेना ही अपराध माना जाने लगा है। उन्होंने सवाल उठाया कि एक पढ़ा-लिखा डॉक्टर अगर खुद को बम से उड़ाकर बेगुनाह लोगों की जान लेता है, तो यह स्थिति देश के लिए खतरे की घंटी है और इसे सामान्य घटना की तरह नहीं देखा जा सकता।

उन्होंने कहा कि कश्मीर ने हमेशा गांधी के देश से जुड़ाव रखा है और कश्मीरी केवल सम्मान के साथ जीने का अधिकार मांग रहे हैं। महबूबा ने स्पष्ट किया कि कश्मीरी यह नहीं कह रहे कि उन्हें पाकिस्तान के हवाले कर दिया जाए, बल्कि वे सिर्फ अपने लिए और अपने पढ़े-लिखे युवाओं के लिए सम्मान और समान अधिकार चाहते हैं।

दिल्ली ब्लास्ट को कश्मीर की परेशानी से जोड़ा

महबूबा मुफ्ती ने पिछले 20 दिनों में दूसरी बार दिल्ली कार ब्लास्ट को कश्मीर की स्थिति से जोड़ा। उन्होंने कहा कि सरकार दुनिया को यह संदेश दे रही है कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य है, जबकि कश्मीर की परेशानी लाल किले के सामने गूंज रही है।

10 नवंबर को दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास कार में धमाका हुआ था, जिसमें पुलवामा के रहने वाले डॉक्टर उमर ने विस्फोटकों के साथ खुद को उड़ा लिया। इस घटना में 13 लोगों की मौत हुई और 20 से अधिक लोग घायल हुए। महबूबा ने इस घटना को कश्मीर में पैदा हो रही निराशा और असंतोष का नतीजा बताया।

सरकार पर लगातार हमले और पुराने बयान

महबूबा मुफ्ती ने इससे पहले भी केंद्र सरकार की नीतियों को असफल बताते हुए कई बयान दिए हैं। 16 नवंबर को उन्होंने कहा था कि सरकार ने जम्मू-कश्मीर को सुरक्षित बनाने का वादा किया था, लेकिन नीतियों की वजह से अब दिल्ली ही असुरक्षित हो गई है। उनके अनुसार हिंदू-मुस्लिम की राजनीति से चुनावी फायदा तो हो सकता है, लेकिन देश के भविष्य के लिए यह खतरनाक है।

उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग मानते हैं कि जितना अधिक सांप्रदायिक विभाजन और हिंसा होगी, उतने अधिक वोट मिलेंगे, लेकिन नेताओं को सोचना चाहिए कि देश किसी भी कुर्सी से बड़ा है।

2 अक्टूबर को दिए गए एक और बयान में महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि भाजपा ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि लोगों को राष्ट्रगान के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने याद किया कि जब वे छात्रा थीं, तब लोग अपनी इच्छा से राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होते थे, लेकिन अब दबाव में ऐसा करवाया जा रहा है, जिसे उन्होंने सरकार की विफलता बताया।

श्रीनगर के टीआरसी फुटबॉल मैदान में राष्ट्रगान के दौरान खड़े न होने पर 15 युवकों को हिरासत में लिए जाने की घटना को भी उन्होंने इसी संदर्भ में जोड़ा और कहा कि डर और दबाव से वफादारी नहीं, बल्कि और दूरी पैदा होती है।

पहलगाम हमले पर भी केंद्र पर निशाना

इससे पहले पहलगाम के बायसरन घाटी में हुए आतंकी हमले के बाद भी महबूबा मुफ्ती ने केंद्र सरकार की नीति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कश्मीरियों के खिलाफ देश में बन रहे माहौल, जांच की दिशा और सुरक्षा नीति को लेकर चिंता जताई थी। उनका कहना है कि यदि कश्मीरियों को लगातार संदेह की नजर से देखा जाएगा और केवल दमन से जवाब दिया जाएगा, तो हालात और बिगड़ सकते हैं।

निष्कर्ष: कश्मीर में सम्मान और संवाद की जरूरत पर जोर

महबूबा मुफ्ती के ताजा बयान और पिछले कुछ हफ्तों के उनके अन्य बयानों का केंद्र इस बात पर है कि कश्मीर को केवल कानून-व्यवस्था के मुद्दे के रूप में न देखा जाए, बल्कि एक राजनीतिक और मानवीय समस्या के रूप में समझा जाए। वे लगातार यह मांग कर रही हैं कि कश्मीरियों को सम्मान दिया जाए, उनकी बात सुनी जाए और युवाओं के लिए भरोसे का माहौल बनाया जाए।

उनके अनुसार, अगर नीतियां केवल कड़ी कार्रवाई, डर और विभाजन पर आधारित रहेंगी, तो दिल्ली से लेकर कश्मीर तक सुरक्षा चुनौतियां बढ़ती रहेंगी। उन्होंने सरकार से अपील की कि वह अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करे और कश्मीर में स्थायी शांति के लिए संवाद और सम्मान को प्राथमिकता दे।

Vivek Singh