भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर में आयोजित मोदी सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष मीडिया संवाद केवल उपलब्धियों का सरकारी ब्योरा भर नहीं था.. यह भाजपा की राजनीतिक शैली, संगठनात्मक आत्मविश्वास, नेतृत्व की केमिस्ट्री और मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की विकसित होती राजनीतिक पहचान का भी प्रदर्शन था.. मंच पर केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, प्रदेश महामंत्री राहुल कोठारी और मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल मौजूद थे, लेकिन कार्यक्रम के केंद्र में यदि कोई चेहरा था तो वह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का था..यह आयोजन कई मायनों में अलग था..एक तरफ मोदी सरकार के 12 वर्षों की उपलब्धियों का लेखा-जोखा था, दूसरी तरफ उस उपलब्धि यात्रा को अपने शब्दों और अपने अंदाज में प्रस्तुत करते मुख्यमंत्री मोहन यादव थे.. सामान्यतः ऐसे आयोजनों में नेता उपलब्धियों की सूची पढ़ते हैं और औपचारिक बातें कर कार्यक्रम पूरा कर देते हैं..लेकिन यहां तस्वीर कुछ अलग थी.. मोहन यादव केवल मुख्यमंत्री की भूमिका में नहीं दिखे.. वे कहीं शिक्षक की मुद्रा में थे, कहीं राजनीतिक विश्लेषक की तरह, कहीं भाजपा कार्यकर्ता की प्रतिबद्धता के साथ और कहीं ऐसे व्यक्ति की तरह जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर और शासन मॉडल को गहराई से समझता और स्वीकार करता हो.. उनके सामने कुछ नोट्स थे.. कागज पर दर्ज बिंदुओं को वे केवल पढ़ नहीं रहे थे बल्कि इस विशेष मौके पर हर वर्ष, हर फैसले और हर उपलब्धि का संदर्भ भी जोड़ रहे थे.. दिल और दिमाग के बीच एक अलग समन्वय.. कभी फ्लैशबैक में जाकर उसे बिंदु विशेष का महत्व समझाते.. तो कभी बदलते भारत की पहचान से जोड़कर अपनी बात को रखते हैं.. मोहन का खुद का कार्यकाल ढाई साल का पूरा हुआ लेकिन मोदी पर उनकी लंबी यात्रा की विशेषज्ञ झलक रही थी.. जो डॉक्यूमेंट्री में नहीं था उसे विषय विशेष तक भी मोहन आगे निकलगए... खासतौर से सर्जिकल स्ट्राइक के मुद्दे को एक बड़ी सफलता के तौर पर उन्होंने कुछ अलग तरीके से ही प्रस्तुत किया.. जो छूट रहा था उसको समेट लिया बखूबी मुख्यमंत्री मोहन यादव ने.. मौका 12 साल का तो कई उदाहरण के साथ खासतौर से 12 साल में होने वाले सिंहस्थ की अपनी प्राथमिकता और तैयारी की भी याद दिला दी.. जो अतीत वर्तमान और भविष्य से उन्हें सीख लेने वाला मुख्यमंत्री साबित कर रहा था..2014 से 2026 तक की यात्रा को उन्होंने जिस क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया, वह यह संकेत देने के लिए पर्याप्त था कि केंद्र सरकार की नीतियों और उनके प्रभावों पर उनकी मजबूत पकड़ है.. कार्यक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि मुख्यमंत्री के चेहरे पर किसी तरह का तनाव नहीं था.. न राजनीतिक दबाव का असर, न आंकड़ों का बोझ और न ही मंचीय औपचारिकता का भार.. मंच पर उसके बाद भोजन की टेबल तक उनकी परिचित मुस्कान लगातार बनी रही.. कभी वे गंभीर होकर किसी राष्ट्रीय चुनौती की चर्चा करते, कभी उत्साह के साथ उपलब्धियों का जिक्र करते और कभी भविष्य की संभावनाओं को लेकर आश्वस्त नजर आते.. संदेश एक अध्ययनशील मुख्यमंत्री का होना और केंद्र की अपेक्षाओं को पूरा कर उसे विश्लेषण के साथ मीडिया के गले उतारने यादगार बनाने की उनकी कवायद गौर करने लायक थी, मोदी सरकार के 12 वर्षों की उपलब्धियों को समझाते समय उनका फोकस केवल योजनाओं पर नहीं था.. वे यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 को ध्यान में रखते हुए शासन की सोच को कैसे बदला.. किस तरह कल्याणकारी योजनाओं को जनभागीदारी से जोड़ा गया.. कैसे गरीब, किसान, महिला और युवा को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाया गया..और सबसे महत्वपूर्ण यह कि इन राष्ट्रीय प्रयासों को मध्य प्रदेश में किस प्रकार आगे बढ़ाया जा सकता है.. दरअसल, यह संवाद जितना मोदी सरकार का था, उतना ही मोहन यादव की राजनीतिक परिपक्वता का भी था.. ढाई वर्ष पूरे कर चुके मुख्यमंत्री के रूप में मोहन यादव अब उस चरण में पहुंचते दिख रहे हैं जहां वे केवल प्रदेश के प्रशासक नहीं बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व के विजन को राज्य स्तर पर विस्तार देने वाले प्रतिनिधि के रूप में खुद को स्थापित करना चाहते हैं, कार्यक्रम के दौरान उनकी प्रस्तुति में यही आत्मविश्वास झलकता रहा.. भाजपा की रणनीति भी इस पूरे आयोजन में साफ दिखाई दी.. मंच पर संवाद था, लेकिन सवाल-जवाब नहीं थे, यह पहले ही तय कर दिया गया था, मीडिया को सुनने समझने का अवसर था, लेकिन सार्वजनिक प्रतिप्रश्न की व्यवस्था नहीं थी,इसे भाजपा का नियंत्रित संवाद कहा जा सकता है, फिर भी पार्टी ने यह सुनिश्चित किया कि औपचारिक कार्यक्रम समाप्त होने के बाद आत्मीयता का संदेश बना रहे.. प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने मीडिया संवाद को जरूरी और कुछ दिल की बात अपनी और कुछ सुनने की बात कह कर इसका प्रारूप पहले ही बता दिया था.. यह सब कुछ भोजन की टेबल पर नजर भी आया,भोजन के दौरान मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष स्वयं मीडिया प्रतिनिधियों की टेबल तक पहुंचे, उन्होंने उनकी बातें सुनीं, अनौपचारिक चर्चा की और अपनी बात भी रखी.. हालांकि सब कुछ ऑफ द रिकॉर्ड था, लेकिन राजनीतिक संचार की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण था.. भाजपा शायद यह संदेश देना चाहती थी कि मंच पर भले औपचारिकता हो, लेकिन रिश्तों में दूरी नहीं है.. इस आयोजन के एक और पहलू ने सबका ध्यान खींचा.. केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की मौजूदगी को लेकर पार्टी अतिरिक्त सतर्क दिखाई दी,हाल के दिनों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति और अन्य मुद्दों को लेकर विपक्ष द्वारा उनके खिलाफ चलाए जा रहे राजनीतिक हमलों के बीच भाजपा नहीं चाहती थी कि कार्यक्रम के दौरान कोई अप्रिय स्थिति बने.. इसी वजह से सुरक्षा व्यवस्था सामान्य आयोजनों की तुलना में कहीं अधिक सतर्क दिखाई दी.. कार्यक्रम स्थल के भीतर और बाहर निगरानी का विशेष इंतजाम था, यहां तक कि शनिवार का दिन फिर भी काले कपड़े पहनकर आने वाले लोगों पर भी नजर रखी जा रही थी,यह सतर्कता बताती है कि भाजपा अब केवल राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि उसके आसपास के वातावरण को भी नियंत्रित रखने की रणनीति पर काम कर रही है.. हालांकि इस पूरी सतर्कता के बावजूद कार्यक्रम में तनाव का वातावरण नहीं था.. मंच पर उपलब्धियों का प्रस्तुतीकरण था, प्रोजेक्टर के माध्यम से डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई, पुस्तिकाओं के जरिए उपलब्धियों का दस्तावेज उपलब्ध कराया गया और व्यक्तिगत स्तर पर संवाद का प्रयास भी किया गया.. यही भाजपा की नई राजनीतिक शैली है, संदेश औपचारिक रूप से दिया जाए, लेकिन संबंध अनौपचारिक रूप से बनाए रखें.. इस पूरे आयोजन में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही, उन्होंने पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए भाजपा की राजनीतिक यात्रा और संगठनात्मक विस्तार का संदर्भ रखा..वहीं धर्मेंद्र प्रधान ने मोदी सरकार को केवल एक प्रशासनिक कार्यकाल नहीं बल्कि भारत के परिवर्तनकारी दौर के रूप में प्रस्तुत किया.. लेकिन इन सबके बीच जो छवि सबसे अधिक उभरकर सामने आई, वह मोहन यादव की थी.. उनकी बातों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति सम्मान था, लेकिन केवल राजनीतिक निष्ठा नहीं जिम्मेदारी का एहसास भी था.. वे बार-बार यह बताने की कोशिश करते दिखे कि मोदी मॉडल को उन्होंने समझा है और उसी को मध्य प्रदेश में लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं.. ऐसा मौका भी आया जब उन्होंने कांग्रेस को निशाने पर लिया.. उनकी शैली में एक दिलचस्प संतुलन नजर आया,वे न तो अतिनाटकीय थे और न ही अत्यधिक औपचारिक.. वे नारेबाजी से भी बचते दिखे और शुष्क प्रशासनिक भाषा से भी.. यही कारण रहा कि उनका संवाद भाषण कम और व्याख्यान अधिक प्रतीत हुआ.. राजनीति में अक्सर नेता अपनी बात कहते हैं, लेकिन कम ही नेता ऐसे होते हैं जो अपनी बात समझाने की कोशिश करते हैं.. मोहन यादव ने इस मंच पर वही प्रयास किया.. ऐसा भी मौका आया जब वे शिक्षक व्याख्याता की भूमिका में नजर आए.. यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसके जरिए मुख्यमंत्री ने एक संदेश अप्रत्यक्ष रूप से अपनी पार्टी के भीतर भी दिया.. संदेश यह कि वे केवल संगठन द्वारा चुने गए मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि अपनी राजनीतिक शैली, अध्ययन और प्रस्तुति क्षमता के आधार पर भी अलग पहचान बना रहे हैं.. मोदी सरकार के 12 वर्षों का यह कार्यक्रम इसलिए याद रखा जाएगा क्योंकि यहां उपलब्धियों का उल्लेख तो था ही, लेकिन उससे अधिक नेतृत्व की प्रस्तुति थी, भाजपा का अनुशासन था, लेकिन उसके साथ आत्मीयता भी थी.. सतर्कता थी, लेकिन घबराहट नहीं थी.. राजनीतिक संदेश था, लेकिन मानवीय स्पर्श भी था.. और इन सबके बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक बार फिर यह संकेत दिया कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केवल समर्थक नहीं, बल्कि उनके शासन मॉडल के गंभीर विद्यार्थी भी हैं.. शायद यही वजह है कि मंच से लेकर भोजन कक्ष तक, आंकड़ों से लेकर संवाद तक और उपलब्धियों से लेकर भविष्य की संभावनाओं तक, हर जगह एक बात स्पष्ट दिखाई दी.. मोहन यादव मोदी के मुरीद जरूर हैं, लेकिन अब वे अपनी अलग शैली, अपनी अलग भाषा और अपने आत्मीय राजनीतिक व्यवहार के जरिए भाजपा में अपनी अलग पहचान भी गढ़ रहे हैं.. (सत्ता, संगठन और मीडिया: आत्मीय समन्वय का नया प्रयोग) बॉक्स "सीखो जरा, मीडिया से रिश्ता बनाना सीखो" मोदी सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने पर भोपाल में आयोजित भाजपा के विशेष मीडिया संवाद को देखकर कुछ ऐसा ही संदेश उभरकर सामने आया.. यह कार्यक्रम केवल उपलब्धियों का प्रस्तुतीकरण नहीं था, बल्कि सत्ता, संगठन और मीडिया के बीच संबंधों को एक अलग तरीके से परिभाषित करने का प्रयास भी था.. दिलचस्प बात यह रही कि यहां पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसा माहौल नहीं था, भाजपा मीडिया विभाग ने कॉन्सेप्ट ही कुछ अलग बनाया जो किसी चुनौती से काम नहीं था.. ना खबर बनाने दिखाने का आग्रह नहीं इस विशेष मौके पर कोई बड़ीअपेक्षा.. समन्वय बनाकर व्यक्तिगत रिश्तों की प्रगाढ़ता एक उद्देश्य जरूर नजर आ रहा था.. सवाल पूछने की अनुमति नहीं थी, इसलिए आलोचक इसे एकतरफा संवाद कह सकते हैं, लेकिन दूसरी तरफ भाजपा ने इसे संवाद, संपर्क और समन्वय के अवसर में बदलने की कोशिश की.. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और भाजपा संगठन की पूरी टीम ने यह संदेश दिया कि हर संवाद केवल सवाल-जवाब से ही नहीं, बल्कि रिश्तों और विश्वास से भी बनता है, कार्यक्रम की तैयारी से लेकर प्रस्तुति तक सत्ता और संगठन की संयुक्त कार्यशैली साफ दिखाई दी.. जनसंपर्क विभाग की फिक्र कहे या जिम्मेदारी सरकार की ओर से आत्मीय स्वागत और संवाद का वातावरण बनाया, तो भाजपा मीडिया सेल और प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल की टीम पूरे आयोजन को व्यवस्थित और प्रभावी बनाने में सक्रिय दिखी.. प्रोजेक्टर प्रस्तुति, उपलब्धियों का दस्तावेज, बैठने की व्यवस्था और भोजन तक हर पहलू में एक सुनियोजित सोच नजर आई.. सबसे महत्वपूर्ण दृश्य भोजन के दौरान देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष स्वयं मीडिया प्रतिनिधियों के बीच पहुंचे, बातचीत हुई, हालचाल पूछा गया, विचार साझा हुए.. सब कुछ ऑफ द रिकॉर्ड था, लेकिन राजनीतिक संचार की दृष्टि से यह ऑन रिकॉर्ड संदेश था कि भाजपा मीडिया से केवल खबरों का नहीं, संबंधों का भी संवाद चाहती है.. हालांकि एक चर्चा लगातार बनी रही—"आज सवाल क्यों नहीं?" लेकिन इसके बावजूद अधिकांश उपस्थित लोगों ने व्यवस्था, सम्मान और आत्मीयता को महसूस किया.. कुल मिलाकर यह आयोजन बताता है कि भाजपा अब मीडिया प्रबंधन से आगे बढ़कर मीडिया संबंधों की राजनीति पर भी काम कर रही है, जहां सत्ता और संगठन दोनों मिलकर संवाद का ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं, जिसमें औपचारिकता कम और आत्मीय समन्वय अधिक दिखाई दे.. Box (मेजबान मोहन: सत्ता का चेहरा नहीं, अपनत्व का व्यवहार) राजनीतिक कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री का मंच से संबोधन देना सामान्य बात है, लेकिन मोदी सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित मीडिया संवाद में डॉ. मोहन यादव की एक अलग तस्वीर देखने को मिली.. यह तस्वीर मुख्यमंत्री की नहीं, बल्कि मेजबान की थी.. मंच का मकसद और कार्यक्रम के औपचारिक हिस्से के बाद जब भोजन का समय आया, तब मोहन यादव केवल वीआईपी अतिथि या मुख्य वक्ता की भूमिका में नहीं रहे.. वे लगातार विभिन्न टेबलों तक पहुंचे, पत्रकारों से मिले, उनका हालचाल पूछा, भोजन के लिए आग्रह किया और कई जगह तो स्वयं आगे बढ़कर प्लेट परोसने जैसी आत्मीयता भी दिखाई.. दिखावा नहीं बल्कि वक्त का तकाजा और मेजबानी की भूमिका यह व्यवहार औपचारिक राजनीतिक शिष्टाचार से आगे का था.. आधा कार्यकाल पूरा कर चुके मुख्यमंत्री का यही अंदाज अब उनकी राजनीतिक कार्यशैली की पहचान बनता जा रहा है, चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कान, बातचीत में सहजता और किसी तरह की औपचारिक दूरी का अभाव.. न भाषण वाली गंभीरता, विरोधियों को खरी खोटी सुनाने वाले आक्रामक तेवर की कोई झलक जो अहंकार से उन्हें दूर रख रही थी, न पद का बोझ, न सुरक्षा घेरे की कठोरता.. भोजन की टेबल पर मोहन यादव पूरी तरह खुले, सहज और संवेदनशील और संवादशील दिखाई दिए.. राजनीति में कई बार संदेश भाषणों से कम और व्यवहार से अधिक जाते हैं, मौका अपने नेता मोदी के ब्रांडिंग का लेकिन मोहन यादव ने शायद यही कोशिश की और परफेक्ट मेच्योर पॉलिटिशियन नजर आए.. मीडिया से संवाद का यह तरीका बताता है कि वे संबंधों को केवल पेशेवर दायरे में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आत्मीयता के साथ भी आगे बढ़ाना चाहते हैं.. दिलचस्प बात यह रही कि जहां मंच पर संवाद एकतरफा था, वहीं भोजन की टेबल पर माहौल बिल्कुल अलग था.. वहां कोई औपचारिक संबोधन नहीं था, बल्कि सहज बातचीत, मुस्कुराहट और अपनत्व का वातावरण था.. कुल मिलाकर, इस आयोजन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का मेजबान वाला अंदाज कई लोगों को आकर्षित करता दिखा.. यह केवल आतिथ्य नहीं था, बल्कि रिश्तों को सहजता से मजबूत करने की वह शैली थी, जो उनकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है.. यह सब कुछ अलग नजर आया तो उसके दो कारण थे एक मोदी के चेहरे को यादगार बना उन्हें स्थापितकरना.. दूसरा हाल ही में राज्यसभा चुनाव से उपजे विवाद को पीछे छोड़ देना या उसे डायवर्ट कर देना .. बॉक्स (मध्य प्रदेश से धर्मेंद्र प्रधान का संदेश: विवादों के बीच विकास, विश्वास और विकसित भारत का विमर्श) मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने पर भोपाल में आयोजित मीडिया संवाद केवल उपलब्धियों का प्रस्तुतीकरण नहीं था, बल्कि केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के लिए भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अवसर था..ऐसे समय में जब देशभर में शिक्षा, नीट और विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है, तब धर्मेंद्र प्रधान ने मध्य प्रदेश की धरती से टकराव की राजनीति के बजाय विकास, विश्वास और भविष्य के भारत का संदेश देने का प्रयास किया.. प्रधान के पूरे संबोधन में एक बात स्पष्ट दिखाई दी कि वे तत्काल राजनीतिक विवादों में उलझने के बजाय मोदी सरकार के 12 वर्षों को एक बड़े राष्ट्रीय परिवर्तन के रूप में स्थापित करना चाहते थे.. उन्होंने आजादी के बाद के नेतृत्व, 90 के दशक की राजनीतिक अस्थिरता और फिर भाजपा को मिले जनआशीर्वाद का उल्लेख करते हुए यह संदेश दिया कि नरेंद्र मोदी का नेतृत्व केवल चुनावी सफलता का परिणाम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का विस्तार है। धर्मेंद्र प्रधान ने "आशीर्वाद से विश्वास और विश्वास से विकास" की जो अवधारणा रखी, वह दरअसल भाजपा के वर्तमान राजनीतिक नैरेटिव का केंद्र है। उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में भी जनता का भरोसा केवल प्रचार से नहीं, बल्कि परिणामों से बनता है। इसलिए उन्होंने बार-बार प्रधानमंत्री मोदी की "तपस्या", "इच्छाशक्ति" और "संकल्प" का उल्लेख किया.. उनके भाषण का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष युवाओं और नए भारत की तस्वीर थी, 2014 में लगभग 350 स्टार्टअप से बढ़कर 2.5 लाख से अधिक स्टार्टअप तक पहुंचने का उदाहरण देकर उन्होंने यह संदेश दिया कि मोदी सरकार केवल योजनाओं की सरकार नहीं, बल्कि अवसरों की सरकार है। यह आंकड़ा केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं बल्कि युवा भारत की बदलती आकांक्षाओं का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया.. दिलचस्प बात यह रही कि कृषि के मुद्दे पर उन्होंने मध्य प्रदेश का विशेष उल्लेख किया,यह केवल प्रदेश सरकार की प्रशंसा नहीं थी, बल्कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में यह संकेत भी था कि केंद्र जिन विकास मॉडलों की बात कर रहा है, उनमें मध्य प्रदेश को एक सफल उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है.. विपक्ष पर बोलते हुए भी धर्मेंद्र प्रधान ने अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाया, उन्होंने स्वीकार किया कि लोकतंत्र में वाद-विवाद और आलोचना आवश्यक हैं। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है क्योंकि वर्तमान राजनीतिक माहौल में अक्सर आरोप-प्रत्यारोप अधिक दिखाई देते हैं, प्रधान ने आलोचना को व्यवस्था सुधार का माध्यम बताकर संवाद आधारित लोकतंत्र की बात रखी। नीति आयोग की बैठक का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक और महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल अलग हो सकते हैं, लेकिन सभी मुख्यमंत्रियों का लक्ष्य देश का विकास है। यह कथन केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगात्मक संघवाद की उस अवधारणा को मजबूत करता है, जिसे मोदी सरकार लगातार रेखांकित करती रही है। कुल मिलाकर, भोपाल के मंच से धर्मेंद्र प्रधान से न कोई सवाल पूछा गया.. न इजाजत .. धर्मेंद्र प्रधान की मौजूदगी मंत्री के काम मोदी सरकार के प्रतिनिधित्व का संदेश जरूर दे रही थी.. उन्होंने विकास, स्टार्टअप, कृषि, वैश्विक प्रतिष्ठा और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को केंद्र में रखकर यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा आने वाले वर्षों की राजनीति को उपलब्धियों और भविष्य की संभावनाओं के आधार पर परिभाषित करना चाहती है। मध्य प्रदेश से दिया गया उनका संदेश साफ था..सतर्कता, संयम और विकास का नैरेटिव ही भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। बॉक्स (दिल्ली की तर्ज पर भोपाल में भी भाजपा का मीडिया संवाद) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दिल्ली में आयोजित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संवाद की तर्ज पर भोपाल में भी जिस तरह का संवाद कार्यक्रम सामने आया, उसे केवल उपलब्धियों के प्रचार तक सीमित नहीं माना जा सकता। यह भाजपा और सरकार की उस नई संचार रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है, जिसमें मीडिया के साथ औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस से आगे बढ़कर व्यक्तिगत संवाद और रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। भोपाल में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सहित वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी, पत्रकारों से सीधी बातचीत, साथ बैठकर भोजन और व्यक्तिगत अनुभव साझा करने की शैली ने कार्यक्रम को अधिक आत्मीय स्वरूप दिया। इसका संदेश स्पष्ट है कि सरकार अपनी योजनाओं और उपलब्धियों को केवल आंकड़ों के माध्यम से नहीं, बल्कि संवाद और विश्वास के जरिए भी स्थापित करना चाहती है। राजनीतिक दृष्टि से यह एक ऐसा प्रयोग माना जा सकता है, जिसमें सरकार मीडिया को केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि जनसंपर्क और जनविश्वास की व्यापक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण साझेदार बनाने की कोशिश करती नजर आती है।
मोदी के मुरीद मोहन का मस्त बेबाक आत्मीय अंदाज.. दिल्ली की तर्ज पर भोपाल में भाजपा मीडिया का संवाद.. नरेंद्र मोदी के 12 साल की उपलब्धियां को रखा सामने.. राकेश अग्निहोत्री ( सवाल दरसवाल)